I.N.D.I.A. के चक्कर में अंदर ही अंदर क्यों सुलग रही है कांग्रेस?
इस साल जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें से राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लिए बहुत ही अहम हैं। दो राज्यों में तो उसकी सरकारें हैं और एमपी में भी पिछली बार वही जीती थी। लेकिन, मौजूदा राजनीतिक हालातों ने इन सभी राज्यों को लेकर कांग्रेस के अंदर ही एक तरह की आग भड़की हुई है।
कई कांग्रेस नेताओं को लग रहा है कि बीजेपी-विरोधी इंडिया गठबंधन के चक्कर में पार्टी हाई कमान कुछ ज्यादा ही समझौतावादी मूड में है। मूल आपत्ति आम आदमी पार्टी को लेकर है। कांग्रेस नेतृत्व पंजाब और दिल्ली यूनिट की भावनाओं को नजरअंदाज करके दिल्ली सेवा बिल पर उसका साथ दे चुका है।

कांग्रेस के अंदर ही उठ रहे हैं सवाल
अब कांग्रेस नेताओं में अंदर ही अंदर इस बात की नाराजगी बढ़ती जा रही है कि पार्टी हाई कमान ने तो आम आदमी पार्टी का साथ दिया, फिर भी वह छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान विधानसभा चुनावों की योजना बना रही है। पार्टी नेताओं को इस बात की आशंका है कि अगर ऐसा हुआ तो इन राज्यों में भी कांग्रेस-बीजेपी में सीधा मुकाबला होने के बजाए त्रिकोणीय चुनाव होंगे और फायदा बीजेपी को मिलेगा।
दिल्ली-पंजाब यूनिट के विरोध के बावजूद दिया साथ
आम आदमी पार्टी इससे पहले उत्तराखंड, गुजरात और गोवा में भी मुकाबले को त्रिकोणीय बना चुकी है और कांग्रेस को उसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। कांग्रेस नेताओं के मन में सवाल उठ रहे हैं कि इंडिया गठबंधन में आम आदमी पार्टी को बनाए रखने के लिए उसकी शर्तें मानने की आखिर कांग्रेस नेतृत्व की क्या मजबूरी है। जब से पार्टी हाई कमान ने दिल्ली और पंजाब यूनिट के विरोध के बावजूद आम आदमी पार्टी की शर्तें मानी हैं, कई वरिष्ठ नेताओं ने इन मसलों पर पूरी तरह से हाथ खड़े करने वाली रणनीति अपना ली है।
कांग्रेस नेताओं को पार्टी का जनाधार खिसकने का डर
दिल्ली और पंजाब के अलावा उत्तराखंड और गोवा की प्रदेश कांग्रेस समितियों ने भी आम आदमी पार्टी के साथ किसी तरह के गठबंधन पर ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी से अपना विरोध दर्ज कराया था, जिन्हें लगता है कि यह पार्टी कांग्रेस के जनाधार पर ही अपना विस्तार कर रही है।
आलाकमान के प्रति बढ़ रही है कांग्रेस नेताओं में नाराजगी
ईडी की एक रिपोर्ट के अनुसार सीडब्ल्यूसी के एक वरिष्ठ सदस्य ने नाम नहीं जाहिर होने देने की शर्त पर कहा, 'आम आदमी पार्टी की छत्तीसगढ़, एमपी और राजस्थान चुनावों के लिए जो योजना है, उसमें चौंकाने वाला कुछ भी नहीं है। लेकिन, कांग्रेस आलाकमान इंडिया के नाम पर आम आदमी पार्टी को खुश करने के लिए पीछे की ओर मुड़ रहा है। हम यह भी जानते हैं कि केजरीवाल कांग्रेस नेताओं की ओर से आम आदमी पार्टी की आलोचना का हवाला देंगे, ताकि हमारे आलाकमान को नखरे दिखा सकें। इसलिए, उन्हें ही इससे निपटने दें।'
कांग्रेस नेतृत्व के फैसलों को लेकर उठ रहे हैं सवाल
दिल्ली के पूर्व कांग्रेस सांसद संदीप दीक्षित आम आदमी पार्टी की आलोचनाओं से कभी पीछे नहीं हटे हैं। लेकिन, ज्यादातर कांग्रेसी सार्वजनिक तौर पर ऐसा कहने की जगह अंदर ही अंदर अपने भाव जाहिर कर रहे हैं। कई का तो यह कहना है कि उनके आलाकमान का रवैया बहुत ही सामान्य है। इनका कहना है कि जब बेंगलुरु में इंडिया गठबंधन में शामिल होने के लिए आम आदमी पार्टी पूर्व शर्त लगा सकती थी, तो बिल का विरोध करने के लिए आलाकमान ने कोई शर्त क्यों नहीं लगाया।
अलका लांबा मामले को लेकर भी दिख रही है नाराजगी
इन नेताओं में यह नाराजगी भी है कि जब दिल्ली में कांग्रेस प्रवक्ता अलका लांबा ने राजधानी की सातों लोकसभा सीटों पर संगठनात्मक तौर पर चुनाव के लिए तैयार रहने की बात की तो प्रदेश के प्रभारी को माफीनामे जैसा स्पष्टीकरण देने को क्यों मजबूर होना पड़ा। इसके बाद ही आम आदमी पार्टी की ओर से मुंबई में इसी महीने के आखिर और सितंबर के शुरू में होने वाली इंडिया गठबंधन की तीसरी बैठक में शामिल होने की बात कही गई।
वहीं जब कांग्रेस की ओर से अलका लांबा के बयान से उठे विवाद को संभालने की कोशिश की गई, उसके अगले ही दिन दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी ने छत्तीसगढ़ में चुनावी गारंटियों की घोषणा की और वहां की कांग्रेस सरकार की आलोचना करने से भी परहेज नहीं किया। फिर एमपी में भी पार्टी ने बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस को भी निशाने पर लिया, तब भी कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व चुप रह गया।
कांग्रेस के एक और नेता ने सवाल किया है कि 'केजरीवाल ऐसा बर्ताव कर रहे हैं, जैसे कि इंडिया गठबंधन आम आदमी पार्टी के लिए सौदेबाजी करने और गठबंधन के नाम पर कांग्रेस से ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटें छीनने के लिए बनाया गया है। आखिर आलाकमान कब एक सीमा तय करेगा।'












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