भगवान गुरु गोरक्षनाथ कौन हैं और गोरखधंधा शब्द सर्वथा अनुचित क्यों है?

Written By: विश्व प्रताप गर्ग
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नई दिल्ली। वर्तमान परिदृश्य में कई लोग गोरखधंधा शब्द का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन ऐसा करना सर्वथा अनुचित है। इसकी वजह ये है कि इस शब्द का इस्तेमाल नकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों द्वारा धार्मिक लोगों को छलने में होने लगा। जिसके कारण समय के साथ-साथ यह शब्द और नकारात्मक होता चला गया। जिस तरह से इस शब्द का प्रयोग किया जा रहा है ये सर्वथा गलत है। गोरखधंधा शब्द का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, इसकी जगह दूसरे शब्दों का इस्तेमाल किया जा सकता है। आखिर गोरखधंधा शब्द सर्वथा अनुचित क्यों है ये जानने के लिये आप को भगवान गुरु गोरक्षनाथ कौन हैं ये समझना महत्वपूर्ण है।

कौन हैं भगवान गुरु गोरक्षनाथ

अनन्त कोटि ब्रह्मांड नायक भगवान सदाशिव अर्थात भगवान शिव गुरु स्वरुप में गुरु गोरक्षनाथ के नाम से जाने जाते हैं। आप उन्हें भगवान शिव के योग स्वरुप भी कह सकते हैं। गुरु गोरक्षनाथ कोई अवतार नहीं हैं, वे भगवान शिव ही हैं जो धरती पर योग ज्ञान को लुप्त होने से बचाते हैं। वे हर युग में धरती पर ही रहते हैं और युगों-युगों में किसी के गुरु भी बनते हैं और योग ज्ञान की दीक्षा भी देते हैं। आज श्री गुरु गोरक्षनाथ गुरु गोरखनाथ के नाम से प्रचलित हैं।

गुरु गोरक्षनाथ कौन हैं, गोरखधंधा शब्द सर्वथा अनुचित क्यों है

जब भगवान शिव माता पार्वती को सरोवर के किनारे योग की शिक्षा दे रहे थे तब सरोवर में मछली के गर्भ में जो बालक पल रहा था उसने वह सारा योग ज्ञान सीख लिया। अब वो बालक ब्रह्म ज्ञानी बन चुका था। भगवान शिव को अपनी त्रिकाल दृष्टि से समझ आया कि मछली के गर्भ में जो बालक है वो ब्रह्म ज्ञानी बन गया है। जब वो बालक जन्म लेता है तो भगवान शिव उसे अपना शिष्य बना लेते हैं। वही बालक आगे चलकर गुरु मछिंद्रनाथजी के नाम से जाना जाता है। यह सब भगवान शिव की लीला ही है।

भगवान शिव गुरु मछिंद्रनाथजी को आदेश देते हैं कि जो योग ज्ञान उनके पास है वो संसार में बंटे ताकि जगत के समस्त मनुष्यगण जन्म-मरण के बंधनों से छूटकर मुक्ति का मार्ग पा सकें। जब गुरु मछिंद्रनाथजी संसार में गए तो बहुत पाप देखा। स्वार्थ, ईर्ष्या, लालच के वशीभूत मनुष्य बुरे कर्म करते पाया। इसीलिए गुरु मछिंद्रनाथ भगवान शिव को पुकारते हैं। तब भगवान शिव ने अपने शिष्य के लिये स्वयं पृथ्वी पर जाने का निर्णय किया।

इधर जब गुरु मछिंद्रनाथ एक गांव में भ्रमण कर रहे थे तब एक स्त्री संतान प्राप्ति की इच्छा से उनसे मिली। गुरु मछिंद्रनाथजी उसे विभूति देते हैं और पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद भी देते हैं। जब वह स्त्री घर पर जाकर अपने पति को सब बताती हैं तो उसके पति कहते हैं ऐसे बाबाओं पर भरोसा मत करो और विभूती गोशाला में फेंक देते हैं। 12 वर्ष पश्चात जब गुरु मछिंद्रनाथ जी उसी गांव में आते हैं तो वही स्त्री उनसे मिलने आती है। जब वे उस स्त्री से पुत्र के बारे में पूछते हैं। "माई पुत्र कैसा है" तो वो स्त्री सब बतला देती है। तब गुरु मछिंद्रनाथ जी उस स्त्री को गोशाला ले जाने के लिए कहते हैं जहां दंपत्ति ने विभूति अविश्वासपूर्वक फेंक दी थी।

गुरु मछिंद्रनाथ फिर उसी स्थान पर पहुंच कर आवाज लगाते हैं !!! अलख निरंजन!!! और वहां से आवाज आती है "आदेश गुरू का"। ऐसा कई बार होता है और आखिरकार एक 12 वर्ष का बालक प्रकट होता है। यह सब देखकर स्त्री पश्चातापपूर्वक रोने लगी और कहने लगी मेरा बालक मुझे दे दीजिए। गुरु मछिंद्रनाथ उसे कहते हैं माई! जब इसने तुम्हारे गर्भ से जन्म ही नहीं लिया तो तुम्हारा पुत्र कैसा! यह तो अजन्मा है। यह तो भगवान शिव ही हैं जो मेरे लिये और योग ज्ञान के लिये धरती पर प्रकट हुए हैं। अब क्योंकि यह गौशाला में प्रकट हुए हैं इसीलिए इस बालक का नाम गोरक्षनाथ रखता हूं! जिस स्थान पर सदाशिव भगवान श्रीगुरू गोरक्षनाथजी प्रकट हुए उसे आज गोरखपुर के नाम से जाना जाता है।

यह गुरु गोरक्षनाथजी ही हैं जिन्होंने नाथ पंथ का सबसे ज्यादा प्रचार किया और नव नाथों में इनका सर्वोच्च स्थान है। लोगों की यह मान्यता है कि गुरु गोरक्षनाथजी ग्यारहवीं शताब्दी के योगी हैं यह सर्वथा गलत है क्योंकि राजा भर्तृहरी पहली सदी के उज्जयनी नगरी के राजा थे और उनके गुरु, श्रीगुरू गोरक्षनाथ जी ही थे। अगर आज से 5100 वर्ष पहले द्वापर युग की बात करें तो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रचित "श्री गोरक्ष स्तवन" की स्तुति व उल्लेख भी मिलता है। यहां तक की स्कन्द पुराण, ब्रह्म पुराण और शिव पुराण में भी भगवान शिव के गुरु स्वरूप श्री गुरु गोरक्षनाथजी का उल्लेख है। यह सत्यापित करता है कि भगवान शिव गुरू गोरक्षनाथ के रुप में हर युग में विद्यमान रहे हैं जिनको समय के किसी भी काल में बांधना अनुचित है।

गोरक्ष तो अत्यन्त पवित्र नाम है। "गौ-रक्ष" या "गोरख" जिसका अर्थ है "गौमाता के रक्षक" या धर्म के रक्षक। हिन्दू पुराणों में "गौ" को 33 कोटि का निवास माना गया है। संक्षेप में "गुरु स्वरुप" महायोगी भगवान शिव "गुरु गोरक्षनाथ" जी के रुप में 33 कोटि देवी-देवताओं की रक्षा करते हैं। यह ऐसे है जैसे वट वृक्ष पर पत्ते तो अनेक है पर उनका संरक्षण व पालन जड़ में स्थित प्राण ऊर्जा से किया जा रहा हो। इन पत्तों की सजीवता और सुंदरता तो केवल वट वृक्ष के जड़ की प्राण ऊर्जा के क्रियाशील होने से ही संभव है।

ये शब्द किस तरह से प्रयोग में आया

भारत की सारी संत-परंपरा सदाशिव भगवान श्री गुरू गोरक्षनाथजी की ऋणी है। जैसे पतंजलि के बिना भारत में योग की कोई संभावना न रह जायेगी। जैसे बुद्ध के बिना ध्यान की आधारशिला उखड़ जायेगी। जैसे कृष्ण के बिना प्रेम की अभिव्यक्ति को मार्ग न मिलेगा-ऐसे गुरु गोरख के बिना उस परम सत्य को पाने के लिये विधियों की जो तलाश शुरू हुई, साधना की जो व्यवस्था बनी, वह न बन सकेगी। गुरु गोरख ने जितना आविष्कार किया मनुष्य के भीतर अंतर-खोज के लिये, उतना शायद किसी ने भी नहीं किया है। उन्होंने इतनी विधियां दीं कि अगर विधियों के हिसाब से सोचा जाये तो सदाशिव भगवान श्री गुरु गोरख सबसे बड़े आविष्कारक हैं। इतने द्वार तोड़े मनुष्य के अंतर्आत्मा में जाकर उस परम ब्रह्म परम सत्य परमपिता परमेश्वर से एकाकार करने के लिए , इतने द्वार तोड़े कि लोग द्वारों में ही उलझ गये। यह उलझाव इस सीमा तक जा पहुंचा कि लोग हताश होने लगे तथा गोरख-धंधा शब्द प्रचलन में आ गया। जो समझ में ना आ सके वो गोरख-धंधा है।

कालांतर में इन विधियों का दुरुपयोग नकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों द्वारा धार्मिक लोगों को छलने में भी होने लगा जिसके कारण समय के साथ साथ यह शब्द और नकारात्मक होता चला गया। दुर्भाग्यवश सभी न्यूज चैनल और हिंदी प्रेस पत्रकारिता से जुड़े सज्जन इस शब्द का प्रयोग नकारात्मक या बुरे कामों के लिये करते हैं। अज्ञानतावश ही सही पर बिना ये जाने कि सदाशिव भगवान श्री गुरू गोरखनाथजी कौन हैं और गोरख-धंधा शब्द किस तरह प्रचलन में आ गया।

कलियुग के इस दौर में रुपया-पैसा एकत्रित करने की दौड़ में किसी भी प्रकार के अनैतिक कार्य करने के मकड़जाल नेटवर्क को आज हम बार-बार "गोरखधंधा" कहकर अनजाने में न केवल भक्तों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं अपितु भगवान शिव की गरिमा का भी अपमान कर रहे हैं जो सर्वथा अनुचित ही है। भगवान् सदाशिव स्वरुप भगवान शिवगोरक्षनाथ की क्या लीला है यह कोई नहीं जानता। पर उस परम ब्रह्म परम सत्य परमपिता परमेश्वर की लीला को "धंधा" नाम देना अत्यंत निम्न कोटि की संज्ञा है।

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English summary
An Introduction on Lord Guru Gorakshnath

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