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अमित शाह भी नहीं भेद सके दक्षिण का किला? क्या नए बीजेपी अध्यक्ष लिखेंगे नई इबारत!

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बेंगलुरू। भारतीय राजनीति में बीजेपी नेता अमित शाह का किरदार एक ऐसे राजनीतिक के रूप में हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है, जिन्होंने एक दक्षिणपंथी पार्टी भाजपा को देश के उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम सभी दिशाओं में फैलाने में काफी हद तक सफल रहे। वर्ष 2014 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए अमित शाह को चुनावी प्रबंधन की पाठशाला कहा जाए तो अतिशियोक्ति नहीं होगी।

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अमित शाह के नेतृत्व में वर्ष 2014 लोकसभा चुनाव से बीजेपी पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी पूर्ण बहुमत सरकार स्थापित हुई। 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान यूपी में बीजेपी के प्रभारी नियुक्त किए गए अमित शाह ने उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा सीटों में से 71 सीटों विजयी दिलाकर अपने सुनहरे राजनीतिक कैरियर की शुरूआत की, जो वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव तक अनवरत गति से चलता रहा।

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वर्ष 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत के सूत्रधार कहे जाने वाले अमित शाह को चाणक्य की उपाधि मिली। बूथ से लेकर चुनाव मैदान तक प्रबंधन और प्रचार की सधी हुई बिसात बिछाने में माहिर अमित शाह के आगे अच्छे से अच्छे राजनीतिक खिलाड़ी मात खा गए। पंचायत से लेकर संसद तक भाजपा को पहुंचाने के सपने को साकार करने वाले शाह ने जुलाई 2014 में भाजपा अध्यक्ष का पदभार संभाला था।

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भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष का पदभार संभालते ही शाह पार्टी के विस्तार के लिए पूरे देश का दौरा किया था और पार्टी कार्यकर्ताओं एकजुट किया। इसके लिए उन्होंने 'साथ आएं, देश बनाएं' नारे के साथ पार्टी की सदस्यता का कार्यक्रम लॉन्च किया। इसके साथ ही शाह ने पार्टी के नए सदस्यों को संगठन और इसकी विचारधारा से रूबरू कराने के लिए 'महा संपर्क अभियान' चलाया।

गौरतलब है शाह ने पहली बार वर्ष 1991 में लोकसभा चुनाव में गांधीनगर में वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी का चुनाव प्रबंधन संभाला था, उनके बूथ प्रबंधन का करिश्मा 1995 के उपचुनाव में नजर आया, जब साबरमती विधानसभा सीट पर तत्कालीन उप मुख्यमंत्री नरहरि अमीन के खिलाफ चुनाव लड़ रहे अधिवक्ता यतिन ओझा का चुनाव प्रबंधन शाह को सौंपा गया।

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अमित शाह के कुशल रणनीति और प्रबंधन का नतीजा था कि नरहरि अमीन बुरी तरह चुनाव हार गए। यतीन खुद अमित शाह की चुनावी प्रबंधन का लोहा मानते हैं। यतीन के शब्दों में शाह को राजनीति के सिवा और कुछ नहीं दिखता है। दिलचस्प यह है कि नरहिर अमीन अभी बीजेपी सदस्य हैं। उन्होंने वर्ष 2012 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी की सदस्यता ले ली थी।

वर्ष 1997 में हुए विधानसभा उपचुनाव में शाह ने सरखेज से पहली बार चुनाव लड़े और वर्ष 2012 तक रिकॉर्ड पांचवी बार जीतकर शाह विधानसभा पहुंचे। कहा जाता है कि उपचुनाव में सरखेज की जीत ने उन्हें गुजरात में युवा और तेजतर्रार नेता के रूप में स्थापित किया और वह आगे बढ़ते गए। नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद शाह और अधिक मजबूती से उभरे।

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वर्ष 2003 से 2010 तक गुजरात सरकार की कैबिनेट में उन्होंने गृह मंत्रालय जैसा बड़ा मंत्रालय का जिम्मा संभाला। जब नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर आए तो उनके सबसे करीबी माने जाने वाले अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए और उनकी ही निगेहबानी में पूरे देश में भाजपा के प्रचार प्रसार हुआ।

वर्ष 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी की पूर्ण बहुमत सरकार बनी। केंद्र में पहली बार पूर्ण बहुमत की बनी गैर कांग्रेसी सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी भूमिका भले ही थी, लेकिन मोदी के पक्ष में बने माहौल को भुनाने और बूथ को मैनेज करने में बड़ी भूमिका अमित शाह की ही थी, जिससे माहौल को वोटों में परिवर्तित कराया जा सका।

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शाह की रणनीतिक महज एक तुक्का नहीं था, जिसकी झलक वर्ष 2014 विधानसभा चुनाव के बाद 7 से 21 राज्यों में बनी बीजेपी सरकारों से लगाया जा सकता है। जीत की इतनी लंबी यात्रा के बाद भी शाह के सिर पर कभी गुमान नहीं चढ़ा, जिसकी परिणित ही कहेंगे कि बीजेपी वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव में 2014 से बेहतर प्रदर्शन किया।

उल्लेखनीय है बीजेपी महासचिव राम माधव ने एक इंटरव्यू में बाकायदा बयान दिया था कि बीजेपी 2019 लोकसभा चुनाव में 272 सीटों पर सिमट सकती है। सुब्रमण्यम स्वामी ने भी बीजेपी के 270-275 सीटों पर सिमटने की आशंका जताई थी, लेकिन अमित शाह की चुनावी रणनीति के आगे सारे कयास धाराशाई हो गए और जब नतीजे आए तो विपक्ष के हाथ बहाने के लिए सिर्फ ईवीएम मशीन लगा और अटकलों को शाह को लोहा मानना पड़ गया।

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बताते हैं कि अमित शाह ने 2019 लोकसभा में बीजेपी की जीत वृहद बनाने के लिए देश में करीब 500 चुनाव समितियों का गठन किया और करीब 7000 नेताओं को तैनात किया। उन्होंने पार्टी के 2019 लोकसभा के चुनावी अभियान के दौरान ऐसी 120 सीटों पर खास ध्यान दिया, जहां भाजपा पहले चुनाव नहीं जीत पाई थी, जिसका नतीजा था कि बीजेपी के खाते में 303 सीट आए।

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कहा जाता है कि अमित शाह दक्षिणी और पूर्वोत्तर राज्यों में असफल रहे। 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे इसके गवाह है कि अमित शाह दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्य खासकर पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में अंदर से अंदर से काम कर रहे थे। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जोरदार जीत और लोकसभा चुनाव 2019 में पश्चिम बंगाल में बीजेपी 18 सीट जीतकर इतिहास रच दिया। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी केवल 2 लोकसभा सीट पश्चिम बंगाल में जीत पाई थी, लेकिन इस बार उसने टीएमसी चीफ ममता बनर्जी के गढ़ में बड़ी सेंधबाजी की।

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अमित शाह ने दक्षिणी और पूर्वोत्तर राज्यों में ज़मीनी स्तर पर बहुत काम किया है, ये वो राज्य है जहां अभी तक बीजेपी का कोई भविष्य दिखाई नहीं देता है। वो बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिए नए राजनीतिक मोर्चे खोले और उन्हें यहां लड़ने के लिए तैयार किया।हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी प्रचंड 'मोदी लहर' के बावजूद बीजेपी दक्षिण के 'दुर्ग' को नहीं तोड़ पाई।

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दक्षिणी राज्य कर्नाटक के सिवाय बीजेपी दक्षिण के किसी अन्य सभी राज्यों में बीजेपी को सफलता नहीं मिली। दक्षिण के कई राज्यों में बीजेपी के खाते भी नहीं खोल सकी। यानी लाख कोशिशों के बावजूद बीजेपी देश के इस हिस्से में पांव पसारने में सफल नहीं हो पाई है।

2019 लोकसभा चुनाव के आंकड़े पर गौर करे तो पाएंगे कि कर्नाटक को छोड़कर बीजेपी की अन्य किसी दक्षिण भारतीय राज्यों में अभी तक कोई पैठ नहीं बना पाई है। इसका उदाहरण है कि तमिलनाडु में पिछले चुनाव की तुलना में बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ने की बजाय कम हुआ है।

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2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई है। वर्ष 2014 में बीजेपी का वोट प्रतिशथ 5.56 था, लेकिन 2019 में घटकर 3.66 प्रतिशत रह गया है। तमिलनाडु में ऐसा क्या है जो प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ओर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का जादू वहां नहीं चल पाया? तमिलनाडु की राजनीति के दो दिग्गजों करुणानिधि और जयललिता की मृत्यु के बाद भी बीजेपी प्रदेश में पैर न जमा सकी?

हालांकि केरल, कर्नाटक, तेलंगाना समेत अन्य दक्षिणी प्रदेशों में बीजेपी ने 2019 लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रही थी। केरल में बीजेपी को 2014 में 10.45 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2019 में बढ़कर 12.93 प्रतिशत हो गए हैं।

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कर्नाटक में बीजेपी के वोट 2014 के 43.37 प्रतिशत से बढ़कर 51.40 प्रतिशत हो गए हैं। तेलंगाना का गठन 2014 आम चुनाव के बाद हुआ था फिर भी राज्य विधान सभा में बीजेपी का वोट प्रतिशत 11.2 से बढ़कर 2019 में 19.8 प्रतिशत हुआ है।

माना जाता है तमिलनाडु में बीजेपी का प्रदर्शन 2014 के मुकाबले गिरने के पीछे कारण था बीजेपी के कट्टर हिंदुत्व की राजनीतिक मिजाज है, जो द्रविड़ आंदोलन के विपरीत है। उग्र हिंदुत्व की राजनीति तमिल गौरव को चिढ़ाती प्रतीत होती है। ऐसे समुदाय कम हैं, जिनको अपनी भाषा और संस्कृति पर इतना गर्व और प्रेम हो, लेकन एक तमिलभाषी व्यक्ति के लिए भाषा जाति और धर्म के बंधन से ऊपर है। वह भाषा को अपनी सबसे बड़ी पहचान मानता है।

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तमिलनाडु में बीजेपी के खराब प्रदर्शन के पीछे राजनीतिक वजह भी है। पहली वजह कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी का मुद्दा है, जिसमें केंद्र सरकार कर्नाटक चुनाव (2018) के चलते तमिलनाडु के हितों के खिलाफ खड़ी दिखाई दी थी। दूसरा, वर्ष 2016 में जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध था।

तीसरा कारण, श्रीलंकाई नौसेना द्वारा तमिल मछुआरों पर लगातार हो रहा हमला है। माना जाता है इन सबसे तमिलनाडु के लोग केंद्र सरकार से बिल्कुल खुश नहीं थे, लेकिन, तमिलनाडु में बीजेपी के ख़राब प्रदर्शन का सबसे अहम पहलू है वहां राष्ट्रीय पार्टियों का हाशिए पर होना।

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केरल के बाद तमिलनाडु देश का दूसरा प्रदेश है, जहां की दशकों से राष्ट्रीय पार्टी की सरकार नहीं बन पाई है। तमिलनाडु में राजनीति हमेशा डीएमके और एआईएडीएमके के बीच घूमती रहती है और केरल में भी यूडीएफ और एलडीएफ के बीच सत्ता का परिवर्तन होता रहता है। चुनाव चाहे राज्य विधान सभा के हों या लोक सभा, राष्ट्रीय पार्टियों को इन्हीं दोनों में से एक के साथ गठबंधन करना पड़ता है, क्योंकि दोनों प्रदेशों की जनता क्षेत्रिय दलों को ही अपना मत देती आ रही हैं।

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अब देखना यह है कि नवनियुक्त बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा दक्षिण में पार्टी के विस्तार के लिए क्या रणनीति अपनाते हैं। हालांकि आंध्र प्रदेश में फिल्म अभिनेता पवन कल्याण की पार्टी के साथ बीजेपी का हालिया गठबंधन से कुछ सुगबुगाहट तेज हुई है। हालांकि जेपी नड्डा के लिए पहली परीक्षा दिल्ली विधानसभा चुनाव है, जिसमें बीजेपी की वापसी से तय होगा कि बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष कितनी लंबी उड़ान भरेंगे।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी को आम आदमी पार्टी से सीधा मुकाबला है और अपनी साख बचाने के लिए दिल्ली विधानसभ चुनाव को भी बीजेपी को मोदी बनाम केजरीवाल बना दिया है। शायद इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने मुख्यमंत्री केजरीवाल के आगे एक कमजोर कैंडीडेट को टिकट दिया है।

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अमित शाह के कार्यकाल 7 से 21 राज्यों में बनी बीजेपी की सरकार

अमित शाह के कार्यकाल 7 से 21 राज्यों में बनी बीजेपी की सरकार

अमित शाह के बीजेपी अध्यक्ष बनने के वक्त 7 राज्य ऐसे थे, जहां या तो बीजेपी की सरकार थी या फिर वह सरकार का हिस्सा थी. शाह के नेतृत्व में ऐसे राज्यों की संख्या 21 तक पहुंच गई थी। हालांकि बीजेपी के हाथ से 6 राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़, पंजाब, महाराष्ट्र और झारखंड) की सरकार निकल गई। इस तरह फिलहाल 16 ऐसे राज्य हैं, जहां या तो बीजेपी की सरकार है या फिर वह सरकार का हिस्सा है, लेकिन शाह की अध्यक्षता में ही पार्टी ने 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन सभी में शानदार प्रदर्शन किया, जहां भाजपा पहले कभी नहीं कर पाई थी। इनमें उड़ीसा और पश्चिम बंगाल का नाम लिया जा सकता है।

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का किया ऐतिहासिक फैसला

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का किया ऐतिहासिक फैसला

मोदी सरकार के द्वितीय कार्यकाल में गृहमंत्री के पद पर रहते हुए अमित शाह ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 को हटाने का बड़ा फैसला लिया जिससे उनके अडिग और निर्भय स्वभाव का पता चलता है। शाह के कार्यकाल में देश में ट्रिपल तलाक, नागरिकता संशोधन एक्ट जैसे कानून बने।

पिता के प्लास्टिक के पाइप का कारोबार संभाल रहे थे अमित शाह

पिता के प्लास्टिक के पाइप का कारोबार संभाल रहे थे अमित शाह

अमित शाह ने उस समय बीजेपी अध्यक्ष की कमान संभाली है, जब से पार्टी ने कई मुकाम हासिल किए। हालांकि उनको राजनीति विरासत में नहीं मिली है। अहमदाबाद से बॉयोकेमिस्ट्री में बीएससी करने के बाद अमित शाह ने अपने पिता के प्लास्टिक के पाइप का कारोबार संभालने लगे थे। इसके बाद उन्होंने स्टॉक मार्केट में कदम रखा और शेयर ब्रोकर के रूप में काम किया। जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा, तो फिर पीछे मुड़कर नही देखा।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री बने शाह

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री बने शाह

अमित शाह की क्षमता को देखते हुए बीजेपी के के राष्ट्रीय नेतृत्व ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले उनको राष्ट्रीय महासचिव बनाकर 80 सांसदों वाले उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया। इसके बाद साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 71 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी।

2016 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दोबारा चुना गया

2016 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दोबारा चुना गया

जुलाई 2014 में अमित शाह को पहली बार बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। वो पार्टी के सबसे युवा अध्यक्ष हैं। उनको 24 जनवरी 2016 को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दोबारा चुना गया और वो अभी तक इस पद पर बने हुए हैं। दूसरी बार जब मोदी सरकार लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र की सत्ता में आई, तो अमित शाह को केंद्रीय गृहमंत्री बनाया गया। इसके बाद उन्होंने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने जैसे कई ऐतिहासिक कदम उठाए।

16 साल की उम्र में RSS से जुड़ गए थे अमित शाह

16 साल की उम्र में RSS से जुड़ गए थे अमित शाह

अमित शाह ने साल 1980 में 16 वर्ष की आयु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए थे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP) के कार्यकर्ता बन गए थे। शाह अपनी कार्यकुशलता और सक्रियता के दम पर महज दो वर्ष बाद यानी 1982 में एबीवीपी की गुजरात इकाई के संयुक्त सचिव बन गए। उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 1986 में मुलाकात हुई थी और यह मुलाकात दोस्ती में बदल गई थी।

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English summary
Amit Shah, who is said to be the mastermind of the BJP's overwhelming victory in the 2014 Lok Sabha elections, got the title of Chanakya. From the booth to the election ground, the best political players were defeated in front of Amit Shah, who specializes in laying a tight board of management and publicity. Shah took over as BJP president in July 2014, realizing the dream of taking the BJP from panchayat to Parliament.
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