क्या टूट रही है बीजेपी की सबसे मजबूत कड़ी? लोगों का सामना करने से क्यों डर रहे हैं कार्यकर्ता?
नई दिल्ली। बीजेपी संगठन पर बनी पार्टी है और यही उसकी ताकत भी है। पार्टी के कार्यकर्ता निचले स्तर पर मेहनत करते हैं और उसका परिणाम पार्टी के पक्ष में चुनावों के नतीजों के तौर पर दिखता है। 2014 में जहां पार्टी को अपने कैडर की मेहनत और कांग्रेस की यूपीए सरकार के खिलाफ जनता के रोष का फायदा मिला था वहीं इस बार स्थिति कुछ बदली हुई है। सरकार के प्रति कई मामलों को लेकर लोगों में नाराजगी भी है और कांग्रेस भी अब ज्यदा तैयारी के साथ मैदान में उतर रही है। लेकिन इसके बावजूद बीजेपी को लोकसभा चुनाव 2019 में जीत का भरोसा है और उसने जमीनी स्तर पर काम करना शुरु कर दिया है। बीजेपी अपने कैडर का इस्तेमाल कर अपने मतदाताओं तक पहुंचने की योजना बना रही है और इसके लिए वो बूथ मैनेजमेंट की रणनीति पर काम करेगी। लेकिन पार्टी की ये निचली लेकिन मजबूत कड़ी कमजोर होती दिख रही है। निचले स्तर पर पार्टी के कार्यकर्ता पार्टी के काम में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं और शांत बैठे हैं।

बूथ लेवल पर पार्टी के कार्यकर्ताओं की शिथिलता बीजेपी के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है। खबर है कि बीजेपी को बूथ सत्यापन और मतदाता सूची का पुनरीक्षण कराना मुश्किल हो रहा है क्योंकि उसे इस काम के लिए पर्याप्त कार्यकर्ता नहीं मिल रहे हैं। जो लोग काम कर भी रहे हैं उनमें पार्टी के काम को लेकर उत्साह की कमी है।

उपेक्षा से नाराज कार्यकर्ता
एक बीजेपी नेता का कहा है कि पार्टी कार्यकर्ताओं के खुद को उपेक्षित और अलग-थलग महसूस कर रहे हैं और इस वजह से 2014 की तरह काम नहीं हो पा रहा है। बूथ सत्यापन और मतदाता सूची पुनर्मूल्यांकन योजना के तहत नए मतदाताओं को सूची में जोड़ना होता है और यदि कोई अतिरिक्त नाम वोटर लिस्ट में है तो उसे हटाने का काम किया जाता है। इस काम को करने की ज्यादातर ज़िम्मेदारी जिला उपाध्यक्ष और महासचिव को दी गई है। सूत्रों का कहना है कि बीजेपी कार्यकर्ता काम में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं और राज्य नेतृत्व को भेजे गई किसी भी रिपोर्ट में 70 फीसदी तक गड़बड़ी की आशंका है क्योंकि डेटा को सत्यापित नहीं किया गया है।
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कार्यकर्ताओं में बैठा डर
कैडर की इस निराशा के पीछे कई कारण हैं। कार्यकर्ता अपने आप को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं और पार्टा ने उनके सही काम भी नहीं किए हैं। इसके अलावा एससी/एसटी अधिनियम भी इसका एक बड़ा कारण है। कार्यकर्ताओं से सवाल हो रहे हैं कि अगर सरकार धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार कर सकती है तो एससी/एसटी एक्ट पर दिए कोर्ट के फैसले को सरकार ने क्यों बदला।सरकार राम मंदिर और अनुच्छेद 370 पर कोई सक्रियता क्यों नहीं दिखा रही है। लोगों में इन मुद्दों को लेकर गुस्सा है, जमीन पर इसका नतीजा दिखने लगा और पार्टी कार्यकर्ता इन सवालों का सामना करने से डरने लगे हैं। लोग अब कहने लगे हैं कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत मामले दर्ज होने लगे हैं। बीजेपी कार्यकर्ता ऐसे लोगों को नहीं समझा पा रहे हैं जो एक्ट के तहत मामलों का सामना कर रहे हैं। पार्टी कैसे लोगों के बीच इस धारणा को दूर करेगी जब खुद पार्टी के लोग इससे खुश नहीं हैं।

पार्टी के काम पर दिख रहा असर
ये स्थिति पार्टी के काम को प्रभावित कर रही है। मतदाता पुनर्मूल्यांकन के अलावा जो नए बूथ बनाए गए हैं वहां पर नई बूथ समिति का गठन करना होता है। वहां सभी नए और पुराने बूथ के कार्यकर्ताओं का सत्यापन होता है। हर एक बूथ में एक बीएलए बनाया जाता है जो सरकार की योजनाओं के बारे में लोगों को बताता है, एक आदमी को पार्टी के छह कार्यक्रमों को देखने का जिम्मा सौंपा जाता है। लेकिन अभी हालात ऐसे हो गए हैं कि कोई कार्यकर्ता आगे नहीं आ रहा है। बीजेपी कार्यकर्ताओं की शिकायत ये है कि उनकी अपनी ही सरकार में उपेक्षा हो रही है। उत्तर प्रदेश के मामले में कहा जा रहा है कि वहां योगी सरकार को पार्टी कार्यकर्ताओं की तुलना में नौकरशाही पर अधिक विश्वास है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि नौकरशाही की भाजपा कार्यकर्ताओं और लोगों के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं है लेकिन पार्टी के नेताओं की है। अभी हालात ऐसे हो गए हैं कि कोई भी कार्यकर्ता पार्टी के पदाधिकारी के साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है।
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