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'खामेनेई की हत्या पर मोदी की चुप्पी क्यों? हमले से 48 घंटे पहले इजराइल से लौटे', सोनिया गांधी का सरकार पर हमला

Sonia Gandhi on Ali Khamenei Death: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई (Ali Khamenei) की टारगेट किलिंग के बाद भारत सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर सियासत गरमा गई है। कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर सीधा प्रहार करते हुए कहा है कि केंद्र सरकार की चुप्पी हैरान करने वाली है। उनके शब्दों में, यह तटस्थता नहीं बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा कदम है।

सोनिया गांधी ने इंडियन एक्प्रेस अखबार में लिखे अपने लेख में ईरान पर इजरायल और अमेरिका द्वारा किए गए हमले की निंदा की है। सोनिया गांधी ने अपने लेख में लिखा कि 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या एक दिन पहले अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले में की गई। उन्होंने कहा कि जब कूटनीतिक बातचीत जारी हो और उसी दौरान किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष को निशाना बनाया जाए, तो यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर दरार का संकेत है।

Sonia Gandhi on Ali Khamenei Death

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का हवाला देते हुए कहा कि किसी देश की संप्रभुता और राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग या धमकी देना नियमों के खिलाफ है। अगर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी इस पर स्पष्ट आपत्ति दर्ज नहीं करता, तो अंतरराष्ट्रीय मानदंड कमजोर पड़ सकते हैं। आइए जानें सोनिया गांधी के लेख की 5 बड़ी बातें?

1. मोदी सरकार के स्टैंड पर सवाल (Sonia Gandhi on Govt Silence)

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि भारत सरकार ने न तो इस हत्या की निंदा की और न ही ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर स्पष्ट रुख लिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने शुरुआत में केवल ईरान की यूएई पर जवाबी कार्रवाई की आलोचना की, जबकि अमेरिका-इजराइल हमले को अनदेखा किया। बाद में 'गहरी चिंता' और 'संवाद' की बात जरूर कही गई, लेकिन वह भी तब जब हमला हो चुका था। उनके मुताबिक, ऐसी चुप्पी तटस्थता नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून के सवाल पर असहज दूरी है।

2. इजराइल दौरे पर भी सोनिया गांधी ने कसा तंज

सोनिया गांधी ने यह भी जिक्र किया कि अयातुल्ला अली खामेनेई हत्या से महज 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री मोदी इजराइल यात्रा से लौटे थे, जहां उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू सरकार के समर्थन की बात दोहराई थी। उन्होंने कहा कि गाजा संघर्ष में बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत पर वैश्विक नाराजगी के बीच यह समर्थन अलग संदेश देता है।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि ग्लोबल साउथ के कई देश और ब्रिक्स साझेदार रूस व चीन ने इस मामले में दूरी बनाए रखी है। ऐसे में भारत का स्पष्ट नैतिक रुख न लेना चिंताजनक है।

3. कांग्रेस का रुख और संवेदना

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ईरान की जमीन पर बमबारी और टारगेट किलिंग की साफ निंदा की है। सोनिया गांधी ने कहा कि यह कदम क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता के लिए खतरनाक है। उन्होंने ईरान की जनता और दुनिया भर के शिया समुदाय के प्रति संवेदना भी व्यक्त की।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 51 का जिक्र करते हुए कहा कि भारत की विदेश नीति का आधार हमेशा विवादों का शांतिपूर्ण समाधान, संप्रभु समानता और गैर-हस्तक्षेप रहा है। मौजूदा चुप्पी इन सिद्धांतों से मेल नहीं खाती।

4. सोनिया गांधी ने भारत-ईरान रिश्तों की दिलाई याद (India-Iran Relations)

सोनिया गांधी ने 1994 की घटना का जिक्र किया जब OIC के कुछ देशों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी और ईरान ने अहम भूमिका निभाकर उसे रुकवाया। उन्होंने ज़ाहेदान में भारत की कूटनीतिक मौजूदगी और रणनीतिक महत्व का भी उल्लेख किया। साथ ही 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी के तेहरान दौरे को याद दिलाते हुए दोनों देशों के गहरे रिश्तों पर जोर दिया।

5. सोनिया ने उठाए विश्वसनीयता और रणनीतिक स्वायत्तता का सवाल

सोनिया ने कहा कि भारत-इजराइल संबंध रक्षा, कृषि और तकनीक के क्षेत्र में बढ़े हैं, लेकिन भारत के तेहरान और तेल अवीव दोनों से संबंध होने के कारण उसके पास संयम की अपील करने का अवसर है। यह तभी संभव है जब भारत सिद्धांत आधारित रुख अपनाए।

उन्होंने यह भी कहा कि खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं और पिछले संकटों में भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा इसलिए कर पाया क्योंकि उसे निष्पक्ष और स्वतंत्र देश माना जाता था।

संसद में बहस की मांग (Parliament Debate)

सोनिया गांधी ने मांग की कि संसद के अगले सत्र में इस पूरे मुद्दे पर खुली बहस होनी चाहिए। उनके अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता, अंतरराष्ट्रीय नियमों का क्षरण और भारत की विदेश नीति की दिशा पर स्पष्टता जरूरी है। उन्होंने कहा कि 'वसुधैव कुटुंबकम्' केवल नारा नहीं बल्कि न्याय, संयम और संवाद की प्रतिबद्धता है। ऐसे समय में चुप रहना जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा है।

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