मोदी के गुजरात में अब सबकुछ पहले जैसा नहीं है
गुजरात की राजनीति से नरेंद्र मोदी के बाहर होने के बाद काफी कुछ बदल गया है गुजरात में, नेतृत्व की कमी झेल रही है भाजपा
नई दिल्ली। गुजरात में भाजपा की तकरीबन पिछले दो दशक से सरकार है, जहां अधिकतर समय तक नरेंद्र मोदी ने प्रदेश की कमान संभाली थी, लेकिन नरेद्र मोदी के देश की कमान संभालने के बाद यहां पहले आनंदीबेन पटेल और अब विजय रूपानी प्रदेश की कमान संभाल रहे हैं। लेकिन जिस तरह से नरेंद्र मोदी प्रशासनिक तंत्र पर अपनी पकड़ रखने के लिए जाने जाते थे, उसके बाद अन्य मुख्यमंत्री प्रदेश के प्रशासन को नरेंद्र मोदी की तर्ज पर संभालने में विफल रहे हैं।

कई पॉवर सेंटर बने
गुजरात में 2015 में जब पाटीदार आंदोलन हुआ था तो प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने लाठी भाजी थी, जिसके बाद मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने पुलिस अधिकारी से पूछा था कि यह कैसे हुआ मैंने, मैंने कभी भी पुलिस को ऐसा करने को नहीं कहा था। इस वक्त आनंदीबेन के पास प्रदेश का गृह मंत्रालय भी था। नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में ऐसा कम ही देखने को मिला जब सीएम कार्यालय के निर्देश के बिना कोई कदम उठाया गया हो। लेकिन जिस तरह से अन्य मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में अन्य नेता और मंत्री मजबूत हुए उसने मुख्यमंत्री की ताकत को कम किया।

हर अधिकारी को जानते थे नरेंद्र मोदी
नरेंद्र मोदी की गुजरात में किस तरह की लोकप्रियता है इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके गुजरात से जाने के बाद भी गुजरात की राजनीति में उनका प्रभाव मौजूद है, प्रदेश के सभी नेता और आला अधिकारी उनसे निर्देश लेते हैं। नरेंद्र मोदी की योजनाओं को अभी भी आगे बढ़ाया जा रहा है। मोदी की कार्यकाल के दौरान एक काम कर रहे एक आला अधिकारी का कहना है कि मोदी तकरीबन हर अधिकारी को जानते थे, उन्हें पता था कि कौन कहा हैं, उन्हें यह पता था कि किससे कैसे काम लेना है।

मोदी का अपना नेटवर्क था
नरेंद्र मोदी के पास अधिकारियों की जानकारी हासिल करने का अपना नेटवर्क था। केशूभाई पटेल, शंकर सिंह वाघेला और नरेंद्र मोदी ऐसे नेता हैं जिन्हें 10 हजार गावों के लोगों के नाम तक पता हैं। यही अहम वजहें है कि नरेंद्र मोदी की प्रशासन पर काफी मजबूत पकड़ है। यहां यह भी समझना होगा कि नरेंद्र मोदी के पास जबरदस्त राजनीतिक समझ है। इन्ही खूबियों के चलते नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रदेश में प्रशासन काफी बेहतर था, लेकिन पिछले तीन सालों में यह सबकुछ कम ही देखने को मिल रहा है।

आनंदीबेन मीडिया मैनेज करने में विफल रही
आनंदीबेन पटेल के साथ काम करने वाले अधिकारियों का कहना है कि वह बेहतर प्रशासनिक थी, उन्हें तकनीकी जानकारी थी, लेकिन उनके पास बेहतर राजनीतिक समझ नहीं थी। उनका पार्टी के साथ बेहतर कॉऑर्डिनेशन नहीं था, उन्हें यह नहीं पता था कि मीडिया को कैसे मैनेज किया जाए। पटेल आंदोलन इस बात को साफ करता है कि वह पूरी तरह से फेल रही हैं, मोदी के कार्यकाल में ऐसा नहीं हुआ होता। इन्ही तमाम वजहों के चलते आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री के पद से हटाया गया था और उनकी जगह पर विजय रूपानी को प्रदेश की कमान सौंपी गई थी।

काफी मतभेद हैं
मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी का कहना है कि विजय रूपानी के पास प्रशासनिक अनुभव की कमी है, उनके अंदर विशेष क्षमता नहीं है। उनके कार्यकाल में प्रशासनिक अधिकारी ज्यादा ताकतवर हो गए हैं ये लोग फैसलों को कहीं अधिक प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन ऐसा मोदी सरकार में संभव नहीं थे। इसके अलावा एक और बड़ा अंतर यह है कि मोदी लोगों के सीधा संपर्क स्थापित करते थे और प्राइवेट मीटिंग में वह काफी सेलेक्टिव थे। लेकिन नए मुख्यमंत्री के कार्यकाल में यह सब कुछ देखने को नहीं मिलता है।

काफी कुछ बदल गया है
नरेंद्र मोदी के केंद्र में जाने के बाद एक बात जो मजाक में यहां के अधिकारी कहते हैं कि यहां ढाई मुख्यमंत्री हैं, अमित शाह, विजय रुपानी और उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल। कांग्रेस के प्रवक्ता शक्तिसिंह गोहिल का कहना है कि जब हम सरकारी योजनाओं का प्रचार करने की योजना बनाते हैं तो मुख्यमंत्री हमसे उपमुख्यमंत्री की तस्वीर को हटाने को कहते हैं, जबकि उपमुख्यमंत्री कहते हैं कि मेरी तस्वीर को लगाओ। मोदी के जाने के बाद यह सारे विवाद अब खुलकर सामने आ रहे हैं, इससे पहले भाजपा के विधायक हमसे बात करने में डरते थे, लेकिन अब ऐसा कुछ भी नहीं है।












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