OI Explained: AAP सांसदों के आने से राज्यसभा में दो तिहाई के करीब BJP, फिर भी कमजोर कैसे? समझें गणित
OI Explained: आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसदों के शुक्रवार को दल-बदल कर NDA में शामिल होने के बाद, राज्यसभा का पूरा गणित बदलता नजर आ रहा है। यह सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि पावर बैलेंस बदलने वाला बड़ा कदम है। इस बदलाव के बाद NDA अब दो-तिहाई बहुमत के काफी करीब पहुंच गया है, जो संवैधानिक संशोधन जैसे बड़े फैसलों के लिए बेहद जरूरी होता है। साफ तौर पर कहें तो NDA की स्थिति पहले से मजबूत हुई है लेकिन क्या इतनी मजबूत हो पाएगी कि दोनों सदनों से संवैधानिक संशोधन बिल पास हो सके? जानिए क्या कहता है गणित।
राज्यसभा में अभी भी 17 सीट दूर है NDA
हालांकि, इस बड़े बदलाव के बावजूद NDA अभी भी उस जादुई आंकड़े से 17 सीट दूर है। इस समय NDA के पास राज्यसभा में कुल 145 सांसदों का समर्थन है। वहीं 244 सदस्यीय सदन में दो-तिहाई बहुमत के लिए 163 सांसदों की जरूरत होती है। यानी लक्ष्य अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है, भले ही सात सांसद मिल गए लेकिन 17 की दूरी अभी लंबी है।

बीजेपी की स्थिति- सिंपल मेजॉरिटी भी नहीं हाथ में
अगर सिर्फ बीजेपी की बात करें, तो पार्टी को अभी भी राज्यसभा में साधारण बहुमत (Simple Majority) के लिए भी 10 सीटों की कमी है। राज्यसभा अध्यक्ष सीपी राधाकृष्णन द्वारा AAP संसदीय दल के भाजपा में विलय को मंजूरी मिलने के बाद बीजेपी के पास अब 113 सांसद हो जाएंगे, जबकि पहले यह संख्या 106 थी। बढ़त जरूर मिली है, लेकिन स्थिति पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

दल-बदल कानून के तहत राहत संभव
इन सात AAP सांसदों को दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। इसकी वजह यह है कि ये सांसद AAP के राज्यसभा संसदीय दल के दो-तिहाई से अधिक सदस्य हैं। वहीं नियम कहता है कि, यदि किसी दल के दो-तिहाई सांसद एक साथ पार्टी बदलते हैं, तो इसे वैध माना जाता है। इसलिए यह बदलाव कानूनी रूप से भी मजबूत स्थिति में है और बीजेपी के पक्ष में भी।
NDA को मिल सकता है अतिरिक्त समर्थन
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि बीजेपी को सात मनोनीत और दो स्वतंत्र सांसदों का समर्थन मिल सकता है। अगर ऐसा होता है, तो NDA समर्थकों की संख्या बढ़कर 122 तक पहुंच जाएगी, जो कि सदन का लगभग आधा है। इससे सामान्य विधेयकों को पास कराना आसान हो सकता है। लेकिन संवैधानिक संशोधन पर गरारी अटकी ही रहेगी।
दो-तिहाई बहुमत का महत्व
दो-तिहाई बहुमत का महत्व इसलिए है क्योंकि इससे सरकार संवैधानिक संशोधन वाले बड़े विधेयकों को आसानी से पारित कर सकती है। अगर NDA इस आंकड़े तक पहुंच जाता है, तो उसके लिए बड़े नीति निर्णय और सुधार लागू करना काफी आसान हो जाएगा।
सिर्फ राज्यसभा ही नहीं लोकसभा में भी चुनौती
सिर्फ राज्यसभा ही नहीं, लोकसभा में भी NDA के पास फिलहाल केवल साधारण बहुमत है। दो-तिहाई बहुमत के लिए उसे 363 सांसदों की जरूरत है। लेकिन अभी NDA के पास लोकसभा में सिर्फ 291 सांसदों का सहरा है जो संवैधानिक संशोधन वाले बिल पास कराने के लिए काफी नहीं है। हाल ही में इसका असर तब देखने को मिला जब महिलाओं के 33% आरक्षण और लोकसभा सीटों को 816 करने से जुड़ा संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 17 अप्रैल को पास नहीं हो सका।
पहली बार संख्या बल की कमी से झटका
यह मौजूदा NDA सरकार के कार्यकाल में पहली बार था जब कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक संख्या की कमी के कारण लोकसभा में पारित नहीं हो सका। बीजेपी को लगे इस झटके ने साफ कर दिया कि संसद में संख्या बल कितना महत्वपूर्ण और जरूरी होता है।
7 सासंदों से बीजेपी को कितनी राहत?
AAP सांसदों का NDA में शामिल होना एक बड़ा राजनीतिक बदलाव है, जिसने सत्ता संतुलन को प्रभावित किया है। हालांकि, अभी भी NDA को अपने बड़े एजेंडे को पूरा करने के लिए आवश्यक संख्या हासिल करनी होगी। राजनीति में रणनीति के साथ-साथ संख्या ही असली ताकत होती है।
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