आप के अरविंद केजरीवाल सीख लेने से कतराते हैं, आरोप मढ़ते हैं

arvind
नई दिल्‍ली। कनक-कनक तै सौ गुनी मादकता अधिकाय, जो खाए बौराय जो ना खाए वौ बौराए...कहावत आप पार्टी के संयोजक और दिल्‍ली के पूर्व मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत पूरी पार्टी के सदस्‍यों और नेताओं पर सटीक बैठती है। लोक सभा चुनाव 2014 के एक्जिट पोल बता रहे हैं कि नई दिल्‍ली में भी आप का खाता नहीं खुलेगा और अगर खुला भी तो 1 या फिर 2 पर ही सिमटेगा।

चुनावी विशेषज्ञों का कहना है कि अरविंद केजरीवाल एक अच्‍छे नेता भी नहीं हैं और न ही एक अच्‍छे स्‍टूडेंट। अरविंद को इस बात का पता था कि वो वाराणसी से अगर नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे तो निश्चित ही चुनाव हारेंगे। इस बात पर पक्‍की मुहर नामांकन के दिन वारराणसी में उमड़ी भीड़ ने ही लगा दिया था लेकिन केजरीवाल के बढ़े हुए कदम पीछे नहीं हटे। केजरीवाल ने भीड़ देखकर अपना बारिया-बिस्‍तर वाराणसी में ही जमाने का फैसला ले लिया। यहीं थी एक स्‍टूडेंट की पहली गलती। दूसरी गलती अरविंद की इससे भी बड़ी थी...जो उन्‍होंने बिना सोचे-समझे अपने उम्‍मीदवार तय किए। इस गलती को एक्जिट पोल आने के बाद स्‍वयं अरविंद समेत आप के नेता योगेंद्र यादव आैर कुमार विश्‍वास ने भी स्‍वीकार की।

अरविंद केजरीवाल से जब मीडिया ने यह सवाल पूछा कि भारतीय जनता पार्टी की इस उपलब्धि का श्रेय वो किसे देना चाहेंगे तो भी उन्‍होंने कुछ कहने से पहले आरोप लगाने से ही उत्‍तर देने की शुरुआत की। इतिहास कहता है कि अपने दुश्‍मन की कभी भी बुराई मत करो इससे उसके हौसले और भी ज्‍यादा बुलंद होते हैं लेकिन कमजोर स्‍टूडेंट केजरीवाल को भला ये कौन समझाए?

फंड नहीं था तो 422 सीटों पर क्‍यों लड़ी आप:

लोग कहते हैं कि जितनी बड़ी चादर हो उतना ही पैर फैलाना चाहिए...लेकिन अरविंद केजरीवाल ने ऐसा नहीं किया। इस बात से तो सभी भली-भांति परिचित हैं कि दिल्‍ली में 49 दिन की सरकार चलाने के बाद जब केजरीवाल ने इस्‍तीफा दिया था तो आप पार्टी के पास फंड में कमी आ गई थी। फंड की कमी दिनोंदिन बढ़ती ही गई और दूसरी ओर केजरीवाल की खुन्‍नस भी अन्‍य नेताओं के प्रति बढ़ती गई। इसी खुन्‍नस के चलते केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया और यही नहीं कुल 422 सीटों पर आप के उम्‍मीदवार उतारे। फंड न होने की वजह से कई उम्‍मीदवारों को तो लोग जान भी नहीं पाए चुनाव जीतने की बात तो बहुत दूर की है।

अब भी नहीं मान रहें है केजरीवाल अपनी गलती:

एक्जिट पोल देखने के बाद अरविंद केजरीवाल भी जान गए हैं कि वो चुनाव हार रहे हैं लेकिन उनके आरोपों का सिलसिला अभी भी नहीं थम रहा है।केजरीवाल से जब पूछा गया कि उन्‍होंने वाराणसी से क्‍यों चुनाव लड़ा तो उनका जवाब था 'मुझे नरेंद्र मोदी को हराना है।' केजरीवाल ये भी नहीं समझ पाए कि भला किसीविशेष व्‍यक्ति को हराकर कैसे जीता जा सकता है? भ्रष्‍टाचार के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले अरविंद ने चुनाव के आखिरी दौर में अपना हिसाब बराबर करने के लिए सिर्फ विशेष व्‍यक्ति से ही चुनाव लड़ा।

अंतत: यही कहकर विराम देना चाहता हूं कि 16 मई को चुनावी नतीजे अरविंद केजरीवाल को एक बार फिर से उनकी गलतियों का एहसास कराएंगे। राजनीति की दौड़ बहुत लंबी है अगर इशारा समझ गए तो केजरीवाल एक बड़ी पार्टी बन सकते हैं क्‍योंकि दिल्‍ली की जनता ने एक बार अपना भरोसा उन्‍हें सौंपा था लेकिन अगर नहीं समझे तो कांग्रेस अपना इतिहास दोहराने को तैयार है।

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