आम आदमी की जंग अब भाजपा के संग

AAP Vs BJP
नई दिल्ली। नरेंद्र मोदी को अब अरविंद केजरीवाल के लिए गंभीरता से चिंतन की ज़रूरत है। पिछले कर्इ महीनों से मोदी कांग्रेस और उसके नेताओं को कोसते आ रहे हैं। पर लगता है बीजेपी इन विधानसभा चुनावों से सीख लेने में चूक गर्इ है। कांग्रेस अंधेरे में जा चुकी है और मोदी का मिशन कामयाब होता दिख रहा है। उन्हें अब पुराना रवैया छोड़ नर्इ चुनौती के बारे में सोचने की जरूरत है। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की शानदार जीत ने अरविंद को देश की नर्इ उम्मीद के रूप में ला खड़ा किया है। ये वही उम्मीद है, जहां कुछ सप्ताह पहले मोदी नाम का गुणगान चल रहा था।

एक सवाल जो हर किसी के ज़हन में है क्या कांग्रेस के बाद सिर्फ मोदी ही एकमात्र विकल्प हैं? विधानसभा चुनावों के पहले आप सिर्फ उत्सुकता का विषय थी। आप के समर्थकों को छोड़कर किसी को नहीं लगता था कि दिल्ली की सत्ता का सेहरा इस नवोदित पार्टी के सिर बंधेगा। पर अब हकीक़त सबके सामने है। लोग आश्चर्य कर रहे हैं। वे सोच रहे हैं कि अगर दिल्ली में ऐसा उलटफेर हो सकता है फिर पूरे देश में क्यों नहीं?

केजरीवाल अब सिर्फ नेता या मुख्यमंत्री तक सीमित नहीं रह गए हैं। वे देश के एक बड़े वर्ग में नैतिक व समझदार व्यकितत्व बन कर उभरे हैं। मोदी एक जननेता, कुशल प्रशासक, नीति-निर्माता व बेहतरीन वक्ता हो सकते हैं पर यदि बात देश की आम जनता की नब्ज़ पकड़ने की हो, तो वे केजरीवाल के मुकाबले बहुत पीछे हैं।

अन्य राज्यों में मौजूदगी दर्ज करवाने के लिए सिर्फ तीन महीने का वक्त

मोदी के साथ समस्या यह है कि वे केजरीवाल की तरह हो सकते। केजरीवाल के पास मौका है कि वे जैसे चाहें मोदी का विरोध कर सकते हैं। मोदी पर दंगों के दाग, उन्हें हाल में मिली क्लीनचिट उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरी है। केजरीवाल की साफ-सुथरी छवि उनकी सबसे बड़ी मजबूती है। दोनों का अपना-अपना अंदाज़ है। मोदी अपनी हर बात में पिछली बातों को नज़रंदाज़ करते चलते हैं और केजरीवाल शान से अपनी वर्तमान विजय का उदघोष देते चल रहे हैं। साथ ही अपनी पिछली बातें हर रोज जनता को याद दिलाते हैं।

मोदी को लेकर अगली समस्या है कि मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग उनसे नजदीकी बनाने में अब भी कतराता है। 2002 के दंगों को लेकर कितनी भी अदालतें मोदी को क्लीन चिट ना दे दें, या वे स्वयं अरबों शब्दों में अपनी सफार्इ पेश कर दें, पर एक वर्ग है, जो फिर भी मोदी का वोटर नहीं बनेगा। इसकी दूसरी तस्वीर यह है कि केजरीवाल सर्वमान्य नेता के सांचे में आसानी से ढल सकते हैं। नरेंद्र मोदी की छवि को लेकर कहीं भी शत-प्रतिशत सकारात्मकता व नकारात्मकता नहीं है। वे कहीं ना कहीं भ्रामक छवि के जननेता हैं।

यदि आम आदमी पार्टी अपना साम्राज्य देश भर में फैलाने का निश्चय करती है तो यह बीजेपी के लिए चिंता का एक विषय बन सकता है। देश के उत्तरी राज्यों में आप कांग्रेस का सफाया कर बेहतर विकल्प साबित हो सकती है। चुनाव पूर्व ही आप के इस उलट-फेर पर यकीन किया जा सकता है।

यदि ऐसा होता है तो मुख्य जंग भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच होगी। मोदी का कांग्रेस के खिलाफ ज़हर उगलना तब किसी काम का नहीं रह जाएगा। कांग्रेस से नाराज़ मतदाता मोदी के लिए नर्इ राजनैतिक ज़मीन तैयार करने में जुट गया है। कुछ समय तक इस मतदाता के पास कांग्रेस के खिलाफ मोदी के अलावा कोर्इ और विकल्प नहीं था। देखना दिलचस्प रहेगा मोदी और केजरीवाल के बीच चुनावी जंग में किसका उगता है सूरज और किसकी डूबती है नैया?

इसका यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि अगले आम चुनाव दिल्ली के परिपाटी पर ही होने जा रहे हैं। राष्ट्रीय राजधानी के बाहर केजरीवाल और उनकी पार्टी का असितत्व ही नहीं है। मर्इ तक राजनैतिक ज़मीन तैयार करने का उनके पास बेहद कम वक्त है। दिल्ली में आप को खड़ा होने में पूरा एक साल लगा था। अब तो अन्य राज्यों में मौजूदगी दर्ज करवाने के लिए सिर्फ तीन महीने का ही वक्त बचा है। पर इस चुनौती को असंभव नहीं कहा जा सकता!

यदि आप दिल्ली में एक नया इतिहास रच सकती है तो इसे देशभर में दोहराना असंभव बिल्कुल नहीं है। यदि आप की सरकार, नीतियां दिल्ली में कारगर साबित होती हैं, केजरीवाल अपने वादों को सिलसिलेवार ढंग से पूरा करना शुरु करते हैं, यदि वे र्इमानदारी, नैतिकता, सामाजिकता के पायदान पर अब की तरह डटे रहते हैं, और आप देश को एक नए बदलाव के लिए तैयार करती है तो किसी भी दल के लिए केजरीवाल को राकना वाकर्इ मुशिकल होगा।

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