जब 16 साल की लड़की पर टूटा जुल्मों का पहाड़ तो सहारा बनी अंग्रेजी

Shabnam Ramaswamy: वह देश के मशहूर स्कूल 'ला मार्टिनियर, कोलकाता’ में पढ़ती थी। गांव में रहने वाली उसकी दादी का सपना था कि पोती फर्राटे से अंग्रेजी बोले। ऐसा ही हुआ। लड़की जब नफासत से अंग्रेजी बोलती तो उसकी दादी का चेहरा खुशी से दमकने लगता। वह दूसरे विषयों में भी होशियार थी। 16 साल की उम्र में जब उसने हाई स्कूल की परीक्षा पास की तो बेहतर भविष्य के सपने बुनने लगी। लेकिन जब गांव पहुंची तो उसे सपनों का महल भरभरा कर गिर गया। घर वालों ने 16 साल की लड़की की शादी 34 साल के उम्रदराज से कर दी। पति बेरहम निकला। एक दिन उसने मारपीट कर बीवी को घर से निकाल दिया। उसने रेलवे स्टेशन पर रात गुजारी। इस बुरे वक्त में अंग्रेजी के ज्ञान ने ही उसे लिए सहारा दिया। अंग्रेजी की बदौलत उसे पहली नौकरी मिली। फिर उसने खुद को खड़ा किया। जीतोड़ मेहनत की। आज वह देश की सफल उद्यमी है। चर्चित स्कूल चला रही है। सैकड़ों गरीब औरतों को आत्मनिर्भर बना रही है।

आफताब के बीच चमकती शबनम
शबनम रामास्वामी अब 65 साल की हो चुकी हैं। उनकी जिंदगी उस दीये की तरह है जो तूफान के थपेड़े के बीच भी दमखम से जलता रहा। वह ऐसी शबनम थीं जो आफताब की रोशनी में भी चमकती रहीं। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के काटना गांव में उनका जन्म हुआ। मूल नाम था शबनम अहमद। काटना पश्चिम बंगाल का बहुत ही पिछड़ा गांव है। बाढ़ से तबाही यहां की किस्मत है। शबनम के पिता इलाके के पहले डॉक्टर थे। उनके डॉक्टर बनने के बाद परिवार तरक्की की राह पर चल पड़ा। फिर उन्हें सेना में नौकरी मिल गयी। यहां-वहां तबादले से शबनन की पढ़ाई हर्ज हो रही थी। शबनम की दादी की ख्वाइश थी कि उनकी पोती अंग्रेजी बोलने वाले स्कूल में पढ़े। जब शबनम 9 साल की थी तब उनके पिता ने उनका दाखिला कोलकाता के प्रसिद्ध ‘ला मार्टिनियर' स्कूल में करा दिया। 186 साल पुराने इस स्कूल में पढ़ना बहुत ही गौरव की बात थी। उन्होंने मन लगा कर पढ़ाई की।

जब टूट गया सपनों का महल
16 साल की उम्र में हाईस्कूल की परीक्षा पास कर शबनम गांव पहुंची। उनके पिता डॉक्टर जरूर थे लेकिन उनका पूरा परिवार बहुत ही रुढ़ीवादी था। उन्होंने शबनम की शादी का फैसला कर लिया। शादी के नाम से ही शबनम घबरा गयी। उन्होंने मिन्नतें की, अपने सपनों का वास्ता दिया, रोयी-गिड़गिड़ायीं। लेकिन सब बेकार। उन्होंने अपने परिवार से पूछा, फिर इतने बड़े स्कूल में पढ़ाने का क्या फायदा ? इन सवालों से किसी को फर्क नहीं पड़ा। शबनम की शादी 34 साल के शख्स से कर दी गयी। उसकी उम्र पर सवाल उठा तो कह दिया गया कि वह आर्किटेक्ट है और बहुत पैसे वाला है। कॉन्वेंट में पढ़ी-लिखी शबनम जब ससुराल आयी तो उसे इल्म हुआ कि वह बेरहम लोगों के बीच घिर गयी है। इसी को तकदीर मान कर वह रिश्ते निभाने लगी।

सजा बन गयी शादी
शबनम का पति उस पर तरह-तरह के जुल्म ढाने लगा। पति उसे बच्चा पैदा करने की मशीन समझने लगा। 24 की उमर होते होते वह छह बार गर्भवती हुई। दो ही बच्चे जिंदा रहे। मारपीट रोजमर्रा की बात हो गयी। उसकी जिंदगी नर्क से बदतर हो गयी। एक रात शबनम के पति ने उसे मारपीट कर घर से बाहर निकाल दिया। उसकी गोद में तीन साल का बेटा भी था। अपमान और अत्याचार से शबनम टूट चुकी थी। नर्क में फिर लौटना मुनासिब नहीं समझा। पति की खुशामद करने की बजाय उसने नयी जिंदगी शुरू करने का फैसला किया। वह इतने जुल्म सह चुकी थी कि रात की अंधेरी गलियों में भी उसे डर न लगा। वह अपने छोटे बच्चे के साथ सियासदह स्टेशन पर पहुंची। प्लेटफॉर्म पर रात गुजारी।

पिता ने नहीं दिया सहारा
सुबह हुई तो स्टेशन के गुशलखाने में ही तैयार हुई। फिर अपने पति के एक पुराने मुलाजिम से सम्पर्क किया। उससे कुछ दिनों के लिए छिपने की जगह मांगी। नगद पैसे थे नहीं सो पहने हुए सोने के कंगन और हार बेच बेच दिये। उसके पिता पुणे के आर्मी अस्पताल में तैनात थे। वह पिता के पास यह सोच कर पहुंची कि पनाह मिल जाएगी। लेकिन उन्होंने रखने से इंकार कर दिया। पिता को अंदेशा था कि उसके रहने से दूसरे भाई-बहनों पर गलत असर पड़ेगा। शबनम जैसे नींद से जागी। उसका सोया आत्मसम्मान जाग उठा। वह फिर सियालदह लौटी। रेलवे प्लेटफॉर्म को ही आशियान बना लिया। स्टेशन पर बुरे लोगों की कोई कमी नहीं थी। 24 साल की एक अकेली औरत और साथ में बच्चा भी। इस डरावने माहौल में वह दो महीने तक रेलवे फ्लेटफॉर्म पर ही रही। यहीं रह कर उसने नौकरी की तलाश शुरू की।

बुरे वक्त में काम आयी अंग्रेजी
दो महीने तक धूल पांकने के बाद एक लेडी डॉक्टर उसकी फर्राटेदार अंग्रेजी से प्रभावित हो गयीं। शबनम देखने में भी प्रभावशाली थीं। उसे रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिल गयी। तनख्वाह तय हुई बारह सौ रुपये महीना। जीने का एक सहारा मिला। वह कभी-कभी बच्चे को कमरे में बंद कर के बाहर निकलती। उसके पुराने सपने फिर कुलबुलाने लगे। उसने सोचा कि इस बारह सौ की नौकरी से वह अपना गुजारा नहीं कर सकती। कुछ बड़ा करने के लिए उसे और पढ़ना होगा। उसने आगे की पढ़ाई के लिए नाइट कॉलेज में नाम लिखा लिया। होम साइंस से ग्रेजुएशन किया। फिर उसने इंटीरियर डिजाइन का कोर्स किया। उसके पति भवन निर्माण व्यवसाय से जुड़े थे। उनके पास काम के लिए कई इंटीरियर डिजाइनर भी अक्सर आते रहते थे। शबनम ने अपने पति के पुराने मुलाजिमों से कमिशन के आधार पर इंटीरियर का काम दिलाने की पेशकश की। उन्हें काम मिलने लगा। वह काम के बदले अच्छा कमिशन देती। ईमानदारी और मेहनत से काम किया तो वह जल्द ही मशहूर हो गयी। फिर उन्होंने इंटीरियर डिजाइन का अपना फर्म शुरू कर दिया। अच्छा पैसा कमाया। जब अपने पैरों पर खड़ा हो गयीं तो अपने पति से तलाक लिया और बच्चों की कस्टडी हासिल की।

ऊंची उड़ान
जब शबनम ने कुछ पैसे कमा लिये तो उनके मन में गरीब और लाचार लोगों के लिए कुछ करने का ख्याल आया। उन्होंने रेलवे स्टेशन पर भटकते छोटे-छोटे लावारिस बच्चों की गुरबत देखी थी। कुछ और बड़ा करने के लिए वह 1990 में दिल्ली आ गयीं। वे दिल्ली में सलाम बालक ट्रस्ट से जुड़ीं। सलाम बालक ट्रस्ट की शुरुआत चर्चित फिल्मकार मीरा नायर ने की थी। यह ट्रस्ट लावारिस बच्चों के रहने, खाने और पढ़ने की सुविधा मुहैया कराता है। शबनम ट्रस्ट से जुड़ीं तो यहां उनकी मुलाकात पत्रकार जुगनू रामास्वामी से हुई। वे बेसहरा बच्चों पर यूनिसेफ के लिए डॉक्यूमेंट्री बना रहे थे। उस समय शबनम करीब 34-35 साल की थीं। आत्मनिर्भर थीं। जुगनू भी उन्ही की तरह बेसहरा बच्चों के लिए कुछ करना चाहते थे। दोनों में दोस्ती हो गयी। फिर उन्होंने शादी कर ली। अब वे शबनम रामास्वामी हो गयीं। शबनम और जुगनू ने स्ट्रीट सरवाइवर्स इंडिया के नाम से एक एनजीओ शुरू किया। दिल्ली के स्लम इलाकों में काम किया। दोनों आठ साल दिल्ली में रहे।

शानदार स्कूल का निर्माण
फिर शबनम को अपना गांव याद आया। वहां की गरीबी उन्हें याद थी। 1999 में वे जुगनू के साथ मुर्शिदाबाद के काटना पहुंची। गांव में कट्टरपंथियों की जमात ने उनकी शादी को लेकर हिन्दू -मुसलमान का सवाल उठाया। लेकिन शबनम ने किसी परवाह नहीं की। उन्होंने गांव में एक स्कूल खोलने की योजना बनायी। जुगनू ने शबनम के सपने के लिए अपने दिल्ली वाले घर को बेच दिया। जितने पैसा जमा किये थे सब स्कूल में लगा दिया। स्कूल के लिए जमीन खरीदी गयी। जब स्कूल के दो फ्लोर बने तब शबनम को डराने के लिए गुंडों ने बमबारी कर दी। शबनम फिर भी नहीं डरीं। इसी बीच 2005 में उनके पति जुगनू रामास्वामी की मौत हो गयी। वे हिम्मत नहीं हारीं। उन्होंने अपने जागृति पब्लिक स्कूल की भव्य इमारत बनायी। पहले बंगाली माध्यम में पढ़ाई शुरू की। फिर उन्होंने अंग्रेजी माध्यम का स्कूल बना दिया। अब स्कूल में करीब साढ़े छह सौ बच्चे हैं जिनसे बहुत मामूली फीस ली जाती है। इस स्कूल को लगातार तीन बार ‘स्कूल दैट केयर्स' का पुरस्कार मिल चुका है। गांव का यह स्कूल आज किसी बड़े मिशनरी स्कूल को टक्कर दे रहा है।

औरतों का सहारा
शबनम ने लाचारी और गरीबी के दिन देखे थे। औरत होने का दर्द झेला था। फिर उन्होंने गरीब और विधवा औरतों को सहारा देने के लिए ‘नारी शक्ति' के नाम से एक कंपनी बनायी। ‘कांथा' बंगाल की प्राचीनतम कढ़ाई कला है। शबनम ने कांथा कढ़ाई वाली साडियों के व्यापार के लिए कढ़ाई-बुनायी केन्द्र खोला। आज इसमें करीब पंद्रह सौ ओरतें काम करती हैं। नारी शक्ति कंपनी का सालाना टर्नओवर एक करोड़ रुपये से भी अधिक है। झंझावातों से जूझ कर शबनम ने पहले अपनी जिंदगी संवारी और अब वह दूसरों के जीने का सहारा हैं।












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