87% भारतीय पत्नी के बारे में इस बात पर पूरी तरह से एकमत हैं- Pew study
नई दिल्ली, 3 मार्च: अधिकतर भारतीय इस मुद्दे पर पूर्ण रूस से या ज्यादातर सहमत हैं कि 'एक पत्नी को हमेशा पति का कहा मानना चाहिए।' एक अमेरिकी थिंक टैंक के हालिया सर्वे में भारत में परंपरागत लैंगिक भूमिकाओं का काफी हद तक समर्थन पाया गया है। लेकिन, साथ ही साथ इस बात पर भी सहमति दिखी है कि महिलाओं को भी समाज में वही अधिकार प्राप्त हैं, जो मर्दों को हैं। प्यू रिसर्च सेंटर की ओर से बुधवार को जारी की नई रिपोर्ट में इस बात पर गौर किया गया है कि भारतीय घरों और समाज में लैंगिक भूमिकाओं को लोग आमतौर पर किस नजरिए से देखते हैं। इसके अलावा भारतीय राजनीति में महिला नेताओं की भूमिका, विभिन्न धर्मों में परिवार के महिला और पुरुष सदस्यों के रोल को लेकर नजरिए में अंतर पर भी विचार किया गया है और कई नतीजें चौंकाने वाले आए हैं।

परिवार में महिला और पुरुषों के रोल पर पियू सर्वे
पियू का यह सर्वे कोविड महामारी से पहले 2019 के आखिरी से लेकर 2020 की शुरुआत में 29,999 भारतीय व्यस्कों के साथ आमने-सामने की बातचीत पर आधारित है। यह सर्वे 2021 में भारत में धर्म पर रिपोर्ट का भी आधार है, जिसे स्थानीय साक्षारकर्ताओं ने 17 भाषाओं में जुटाया है और जिसमें भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कवर किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 'भारतीय वयस्क लगभग हर तरह से कहते हैं कि महिलाओं के लिए भी पुरुषों के समान अधिकार होना महत्वपूर्ण है, जिसमें दस में से आठ वे भी शामिल हैं जो कहते हैं कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। लेकिन, ऐसी परिस्थितियां भी देखने को मिलती हैं, जब भारतीयों को लगता है कि मर्दों को तरजीह मिलनी ही चाहिए।'

एक पत्नी को हमेशा पति का कहा मानना चाहिए- सर्वे (87%)
इस शोध में पाया गया है कि 80 प्रतिशत लोग इस बात से सहमत हैं कि जब, 'जब कुछ ही नौकरियां हों, तो महिलाओं की तुलना में मर्दों को नौकरी पर ज्यादा अधिकार होने चाहिए।' करीब 10 में से 9 (87%) पूरी तरह से या अधिकतर सहमत हैं कि 'एक पत्नी को हमेशा पति का कहा मानना चाहिए।' इनमें से ज्यादातर यानि 64% वैसे भारतीय हैं, जो इस विचार को लेकर पूर्ण रूप से सहमत हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 'मर्दों की तुलना में महिलाओं के यह कहने की संभावना कम है कि पत्नियों को हर स्थितियों में अपने पति की बात माननी चाहिए लेकिन, ज्यादातर भारतीय महिलाएं इस विचार के साथ पूर्ण सहमति व्यक्त करती हैं (पुरुषों में 61% बनाम 67%)। '

बेटे को लेकर भारतीय परिवारों में ज्यादातर एकमत
सर्वे में यह भी बताया गया है कि हालांकि ज्यादातर भारतीय कहते हैं कि परिवार की कुछ जिम्मेदारियां महिलाएं और पुरुषों दोनों को साझा करनी चाहिए, लेकिन कई लोग अभी भी ऐसे हैं, जो पारंपरिक जेंडर भूमिका का ही समर्थन करते हैं। जब बात बच्चों की आती है तो इस मामले में भारतीय लगभग एक मत हैं कि परिवार में कम से कम एक बेटा हो (94%) और अलग से एक बेटी (90%) भी हो। अगर धर्मों के आधार पर देखें तो भारत में मुसलमानों में आज भी पारंपरिक जेंडर भूमिका का ज्यादा समर्थन पाया गया है, जबकि सिखों में यह सबसे कम है। मतलब, सिख इस मामले में पुरुषों को ज्यादा प्रधानता देने के समर्थन में नहीं हैं।

बेटा और बेटी की जिम्मेदारी
जहां तक अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाने की बात है तो अधिकतर (63%) भारतीय मानते हैं कि माता-पिता बेटे की पहली प्राथमिकता होने चाहिए। हालांकि, धार्मिक आधार पर इस विचार में काफी अंतर भी पाया गया है। मसलन, मुस्लिम (74%), जैन (67%) और हिंदुओं (63%) का कहना है कि अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी बेटे को ही निभानी चाहिए। लेकिन, सिख (29%), क्रिश्चियन (44%) और बौद्ध (46%) ही यह जिम्मेदारी पूरी तरह से बेटे को देने से सहमत हैं, जबकि, ज्यादातर का कहना है कि माता-पिता के अंतिम संस्कार में बेटा और बेटी दोनों की एक समान जिम्मेदारी होनी चाहिए।

महिला राजनेताओं पर सर्वे का नतीजा
लेकिन, जब भारतीय राजनीति की प्रमुख महिला चेहरों का जिक्र हुआ, जिसमें कि पूर्व पीएम इंदिरा गांधी, तमिलनाडु की पूर्व सीएम जे जयललिता, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जैसे नाम शामिल हैं, तो इस रिपोर्ट के मुताबिक मोटे तौर भारतीय महिलाओं को राजनेताओं के तौर पर स्वीकार करते हैं। मतलब ये कि अधिकतर व्यस्क मानते हैं कि महिला और पुरुष दोनों समान रूप से अच्छे राजनेता (55% ) होते हैं या महिलाएं सामान्य तौर पर पुरुषों(14%) से अच्छी नेता बनती हैं। सिर्फ चौथाई व्यस्क ही ऐसे हैं, जिन्हें रिपोर्ट के मुताबिक लगता है कि पुरुष महिलाओं से ज्यादा अच्छे नेता बनते हैं।












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