‘ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते’ के तहत पिछले सात वर्षों में 84,119 बच्चों को बचाया गया: रेलवे
Operation Nanhe Farishtey: रेलवे सुरक्षा बल ने पिछले सात वर्षों के दौरान 84,119 बच्चों को बचाया है, जो स्टेशनों और ट्रेनों में खतरे में थे, ताकि वे गलत हाथों में पड़ने से बच सकें।
रेल मंत्रालय के एक प्रेस बयान में कहा गया है कि मंत्रालय के अनुसार, रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) पिछले सात वर्षों से "नन्हे फरिश्ते" नामक एक अभियान में सबसे आगे रहा है - यह मिशन विभिन्न भारतीय रेलवे जोनों में देखभाल और सुरक्षा की जरूरत वाले बच्चों को बचाने के लिए समर्पित है।

मंत्रालय ने कहा, "नन्हे फरिश्ते सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं है, यह उन हजारों बच्चों के लिए जीवन रेखा है प्रत्येक बचाव समाज के सबसे कमजोर सदस्यों की सुरक्षा के लिए आरपीएफ की प्रतिबद्धता का प्रमाण है।'' वर्षवार आंकड़े देते हुए मंत्रालय ने कहा कि वर्ष 2018 'ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते' के लिए एक महत्वपूर्ण शुरुआत थी और इस वर्ष आरपीएफ ने कुल 17,112 बच्चों को बचाया, जिनमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे।
बचाए गए 17,112 बच्चों में से 13,187 की पहचान घर से भागे हुए बच्चों के रूप में की गई, तो वहीं 400 बच्चे बेसहारा, 87 अपहृत, 78 मानसिक रूप से विकलांग और 131 सड़क पर रहने वाले बच्चे थे। इस वर्ष 2018 ने ऑपरेशन के लिए एक मजबूत नींव रखी, जिससे इस तरह की पहल की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया।
आरपीएफ की सराहना करते हुए मंत्रालय ने कहा कि "इस साल बड़ी संख्या में भगोड़े और लापता बच्चों को ढूंढा गया और उन्हें आवश्यक देखभाल और सुरक्षा दी गई। 14,603 बच्चों की पहचान भगोड़े के रूप में, 1156 लापता, 1035 बिछड़े हुए, 384 बेसहारा, 161 अपहृत, 86 मानसिक रूप से विकलांग और 212 सड़क पर रहने वाले बच्चों के रूप में की गई।
"अपने प्रयासों के माध्यम से, आरपीएफ ने न केवल बच्चों को बचाया है, बल्कि भगोड़े और लापता बच्चों की दुर्दशा के बारे में जागरूकता भी बढ़ाई है। यह अभियान निरंतर विकसित हो रहा है, भारत का विशाल रेलवे नेटवर्क में बच्चों के लिए एक सुरक्षित वातावरण बनाने का प्रयास कर रहा है।" भारतीय रेलवे की पहलों की जानकारी देते हुए मंत्रालय ने कहा, "ट्रैक चाइल्ड पोर्टल में पीड़ित बच्चों के बारे में विस्तृत जानकारी है। भारतीय रेलवे ने 135 से अधिक रेलवे स्टेशनों पर बाल सहायता डेस्क स्थापित किए हैं। जब रेलवे सुरक्षा बल (RPF) द्वारा किसी बच्चे को बचाया जाता है, तो उसे जिला बाल कल्याण समिति को सौंप दिया जाता है, जो बच्चे को उसके माता-पिता को सौंप देती है।"
( खबर PTI की है...)












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