गुजरात दंगों से जुड़े 5 भ्रम जो अब टूट चुके हैं

1. तीन दिन बाद बुलायी गई सेना
तमाम लोग सोचते हैं कि दंगों को नियंत्रित करने के लिये मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन दिन बाद जाकर सेना बहुलाई। जबकि यह बात पूरी तरह गलत है। एसआईटी की रिपोर्ट के अनुसार 28 फरवरी को ही मोदी ने सेना बुलाने का फैसला ले लिया था। सेना को तुरंत सूचना भी दी गई, लेकिन उस दौरान सेना बॉर्डर पर तैनात थी, लिहाजा 1 मार्च के पहले सेना खुद ही पहुंच नहीं सकती थी।
यह भी कहा गया कि मोदी ने दंगे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। जबकि सच तो यह है कि दंगे के शुरु होते ही मोदी ने अपने पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान से पुलिस फोर्स मांगी। सिर्फ महाराष्ट्र ने दो कंपनी फोर्स भेजी। वहीं मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने फोर्स भेजने से मना कर दिया। वो दिग्विजय जो सेक्युलरिज्म का पाठ पढ़ाते रहते हैं।
2. मोदी कभी दंगा प्रभावित इलाकों में नहीं गये
एह वो भ्रम है, जिसे जमकर प्रसारित किया गया, जबकि एसआईटी की रिपोर्ट के मुताबिक नरेंद्र मोदी, तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के साथ 3 मार्च 2002 को ही दंगा प्रभावित इलाकों में गये। उसके अगले दिन मोदी और आडवाणी ने सौराष्ट्र ओर भावनगर में दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। मोदी के ही प्रयासों के चलते एक मदरसा में कैद 500 छात्रों को जिंदा बचा लिया गया। अहमदाबाद के इलाकों का दौरान 5 मार्च को किया।
3. राहत शिविरों के लिये कुछ खास नहीं किया
हाल ही में मुलायम सिंह यादव ने कहा कि मुजफ्फरनगर दंगे के लिये लगाये गये राहत शिविरों में दंगा पीड़ित नहीं बल्कि विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग हैं। सभी ने इस बात पर यकीन भी कर लिया, लेकिन नरेंद्र मोदी ने राहत शिविरों में क्या किया था- मोदी ने एक-एक शिविर में राहत सामग्री पहुंचाने के लिये खुद से प्रयास किये। यहां तक इसकी देखरेख करने के लिये जो कमेटी बनायी गई, उसका अध्यक्ष राज्यपाल को बनाया गया। उस कमेटी में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष व पूव्र मुख्यमंत्री अमर सिंह चौधरी, नेता विपक्ष नरेश पटेल, पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल, सेवा संस्था की ईलाबेन भट्ट, साबरमती आश्रम के पद्मश्री ईश्वरभाई पटेल को शामिल किया।
4. मीटिंग में मोदी ने कहा हिन्दुओं को अपना गुस्सा निकालने दो
यह एक बहुत बड़ा झूठ है, जिसे भुनाने की कोशिश मोदी के तमाम विरोधियों ने की। एसआईटी के अनुसार मीटिंग 27 फरवरी 2002 को गुजरात की समीक्षा के लिये हुई थी। मीटिंग में मौजूद तमाम अधिकारियों समेत सभी ने कहा कि ऐसा कुछ भी मुख्यमंत्री ने नहीं कहा था। जबकि मोदी ने तो अधिकारियों को सख्त निर्देश दिये थे कि वो जल्द से जल्द शांति बहाल करने के लिये सभी जरूरी कदम उठायें। इस मीटिंग में एक भी राजनीतिक व्यक्ति मौजूद नहीं था।
5. संजीव भट्ट न्याय के लिये एक ईमानदारी से लड़ रहे हैं
तमाम लोग सोचते हैं कि संजीव भट्ट एक इ्रमानदार ऑफीसर हैं और न्याय के लिये लड़ रहे हैं। अब उनके सारे आरोप खुद-ब-खुद खारिज हो गये हैं। चूंकि ज्यादातर आरोप संजीव भट्ट द्वारा लगाये गये थे, लिहाजा एसआईटी की रिपोर्ट के बाद उनकी ईमानदारी पर चर्चा करना भी बेईमानी होगा। संजीव भट्ट ने कहा कि उस मीटिंग में उनके साथ-साथ डीजीपी के चक्रवर्ती मौजूद थे, जबकि चक्रवर्ती का कहना है कि वो मीटिंग में भट्ट के साथ नहीं थे।

अर्जी खारिज कर दी
एक स्थानीय अदालत ने गुरुवार को गुजरात दंगों के दौरान मारे गए कांग्रेस के एक नेता की विधवा की अर्जी खारिज कर दी। महिला ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एवं 58 अन्य को 2002 के गुजरात दंगों में भूमिका के मामले में क्लीन चिट देने वाली विशेष जांच टीम (एसआईटी) की क्लोजर रिपोर्ट को चुनौती दी थी।

गोधरा की घटना
याची जाकिया ई. जाफरी के पति और कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी गोधरा की घटना के बाद हुए दंगे के दौरान 28 फरवरी 2002 को गुलबर्गा सोसायटी में मारे गए 69 लोगों में शामिल थे। जाकिया ने उल्लेख किया कि मोदी एवं अन्य के खिलाफ भी राज्यव्यापी दंगों की साजिश में भूमिका के लिए मामला चलाया जाना चाहिए।

अदालत में चुनौती
महानगर दंडाधिकारी बी. जे. गनतरा के फैसले से असंतुष्ट जाकिया जाफरी और सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ सहित उनके समर्थकों ने कहा कि वे इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे।

एसआईटी
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर गठित एसआईटी ने जाकिया के आरोपों की जांच की और 8 फरवरी 2012 को अपनी क्लोजर रिपोर्ट सौंप दी। एसआईटी ने कहा था कि मोदी व अन्य के खिलाफ मामला चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।

एसआईटी
जाकिया ने अपनी अर्जी में आरोप लगाया था कि एसआईटी ने पुलिस अधिकारियों के बयान एवं अन्य उपलब्ध सबूतों को नजरअंदाज कर मोदी एवं अन्य को बचाने का काम किया है।
उन्होंने एसआईटी पर अपूर्ण और हल्की जांच करने और उपलब्ध सबूतों को नजरअंदाज कर सत्य को अदालत से छिपाने का आरोप लगाया।

सबूत नहीं
एसआईटी ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में कहा था कि मोदी व अन्य के खिलाफ मामला चलाने के लायक सबूत नहीं है और यह घटना (गुलबर्गा सोसायटी) उसके जांच के दायरे से बाहर है।
जांच एजेंसी ने भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों आर. बी. श्रीकुमार, संजीव भट्ट और राहुल शर्मा को गवाह के रूप में स्वीकार करने या उनके बयान को 'सुनीसुनाई' करार देते हुए सबूत मानने से इनकार कर दिया।

2002 के दंगों के दौरान
वर्ष 2006 में जाफरी ने 2002 के दंगों के दौरान मोदी एवं 62 अन्य के खिलाफ साजिश की शिकायत दर्ज किए जाने की मांग की।
गुजरात पुलिस के मना करने पर उन्होंने गुजरात उच्च न्यायालय में मामला दर्ज कराया जिसने दंडाधिकारी की अदालत जाने का निर्देश दिया। उन्होंने हालांकि सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का फैसला लिया।












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