Kargil Chronicles: 'हमारे बीच एक खास रिश्ता था', मेजर हरमिंदर मुल्तानी ने साथी कैप्टन विक्रम बत्रा को किया याद
25 Years of Kargil: देश का बच्चा-बच्चा कारगिल युद्ध से वाकिफ है। कैसे हिमालय की चोटियों पर भारत के जांबाज सैनिकों ने कारगिल युद्ध लड़ा। 1999 में तीन महीने की लड़ाई के बाद पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ा और जीत हासिल की।
इस जंग को जीतने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले कैप्टन विक्रम बत्रा किसी परिचय के मुहताज नहीं है। ऐसे में कारगिल युद्ध की 25वीं वर्षगांठ पर मेजर मुल्तानी ने कैप्टन बत्रा के साथ बिताए पलों को एक बार फिर याद करते हुए ताजा कर दिया।

मेजर हरमिंदर मुल्तानी ने अपने साथी शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की दिल को छू लेने वाली यादें साझा की हैं। पिछले 25 वर्षों को याद करते हुए मेजर मुल्तानी कैप्टन बत्रा के साथ बिताए पलों को याद किया, जिसमें उनकी असाधारण बहादुरी और प्रभाव को बताया है।
मेजर हरमिंदर मुल्तानी ने किया याद
मालूम हो कि कैप्टन बत्रा ने अपने साहस और बलिदान से ना केवल अपने साथियों को बल्कि पूरे देश को प्रेरित किया है। ऐसे में उन्होंने कहा कि हमें यह नंबर पाने का सौभाग्य मिला, यह किस्मत से ही होता है। हर आने वाले कोर्स में एक नंबर जोड़ा जाता है। जब हम IIMA में शामिल हुए तो हमें 101 नंबर मिला।
उन्होंने कहा, "1999 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में कारगिल ऑपरेशन में करीब 28 सेना पदक, एक कीर्ति चक्र और तीन शौर्य चक्र शामिल थे। यह अपने आप में बहुत कुछ कहता है। जब हमें वापस बुलाया गया तो हम सभी छुट्टी पर थे। हमें कारगिल सेक्टर में युद्ध जैसी स्थिति के बारे में पता चला।"
उन्होंने आगे कहा, "अगली सुबह मैं अपने ऑपरेशन एरिया में था और मुझे पाकिस्तान से भारत में आने वाली एक महत्वपूर्ण सड़क की रक्षा करने की अहम जिम्मेदारी दी गई थी। विक्रम बत्रा मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे। अकादमी में हम एक ही कंपनी में थे और दूसरे कार्यकाल के अधिकांश समय हम पड़ोसी थे। हम एक-दूसरे के बगल में केबिन में रहते थे।"
"IIMA में एक साथ बिताए एक साल के दौरान हमारे बीच एक खास रिश्ता बन गया। उनके शहादत के बारे में जानना एक झटका था। आजकल एक दिन भी ऐसा नहीं जाता जब हम इसके बारे में ना सोचें। कई लोगों की जान चली गई। हम इन महान लोगों के बलिदान को हमेशा याद रखेंगे, जिन्होंने हमारे देश के लिए अपनी जान दे दी।'
प्वाइंट 5140 पर किया कब्जा
कारगिल युद्ध में कैप्टन बत्रा की भूमिका अहम थी। जून 1999 में 13 जेएके आरआईएफ बटालियन के साथ द्रास पहुंचने पर, वे टोलोलिंग पर्वत पर हमले के दौरान शुरू में रिजर्व थे। लेफ्टिनेंट कर्नल योगेश कुमार जोशी के नेतृत्व में कैप्टन बत्रा की डी कंपनी को बी कंपनी के साथ मिलकर प्वाइंट 5140 पर कब्जा करने का काम सौंपा गया था। अस्वस्थ होने के बावजूद कैप्टन बत्रा ने 19 जून, 1999 को एक साहसी हमले में अपने सैनिकों का नेतृत्व किया और अगली सुबह तक चोटी को सुरक्षित कर लिया। उसके बाद उन्हें कैप्टन के पद पर पदोन्नत किया गया।
गोलियां लगने के बाद भी नहीं रुके
इसके बाद बटालियन अपने अगले लक्ष्य प्वाइंट 4875 की तैयारी के लिए मुश्कोह घाटी चली गई। 4 जुलाई, 1999 को कैप्टन बत्रा ने अपने सैनिकों का नेतृत्व दुश्मनों की लगातार गोलीबारी के बीच किया। 7 जुलाई, 1999 को एक हमले के दौरान गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने नेतृत्व करना जारी रखा और घातक रूप से गोली लगने से पहले कई दुश्मन सैनिकों को घुटनों पर ला दिया।












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