1971 भारत-पाक जंग: भारत का लक्ष्य ढाका पर क़ब्ज़ा करना था ही नहीं

1971 के बांग्लादेश अभियान की सबसे निराली बात थी कि भारतीय सेना के सामने पूर्वी पाकिस्तान की राजधानी ढाका पर क़ब्ज़ा करने का लक्ष्य रखा ही नहीं गया था.

भारत की रणनीति थी कि पूर्वी पाकिस्तान की अधिक से अधिक ज़मीन पर कब्ज़ा करके वहाँ पर बांग्लादेश की सरकार स्थापित की जाए ताकि भारत आए एक करोड़ शर्णार्थियों को वहाँ वापस भेजा जा सके.

मिलिट्री ऑपरेशन के महानिदेशक मेजर जनरल केके सिंह ने युद्ध की जो योजना बनाई थी, उसके तीन बिंदु थे.

श्रीनाथ राघवन अपनी किताब '1971 अ ग्लोबल हिस्ट्री ऑफ़ द क्रिएशन ऑफ़ बांग्लादेश' में लिखते हैं, "योजना का पहला उद्देश्य था पूर्वी पाकिस्तान के दो बड़े बंदरगाहों चटगाँव और खुलना पर कब्ज़ा करना ताकि और पाकिस्तानी सैनिक वहाँ न उतर सकें, दूसरा लक्ष्य था उन जगहों पर कब्ज़ा करना जहाँ से पाकिस्तानी बल एक जगह से दूसरी जगह पर न जा सकें."

वो आगे लिखते हैं, "तीसरा उद्देश्य था पूर्वी पाकिस्तान को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट देना ताकि भारतीय सैनिक एक-एक कर उन्हें अपने नियंत्रण में ले सकें. ढाका पर कब्ज़ा करने की बात सोची ज़रूर गई थी लेकिन उसे ज़रूरत से ज़्यादा महत्वाकांक्षी मानकर छोड़ दिया गया था."

यह मानकर चला जा रहा था कि इस पूरे अभियान में भारतीय सेना को तीन सप्ताह लगेंगे.

सन् 1965 के युद्ध में भारत का अनुभव था कि युद्धविराम के अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण इस अभियान को और लंबा नहीं किया जा सकता था.

सैम मानेक शॉ ने जुलाई, 1971 में अपनी योजना पूर्वी कमान के कमांडर लेफ़्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा को बता दी थी.

अरोड़ा इस योजना से सहमत थे लेकिन उनके चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ जनरल जैकब ने इस पर अपना विरोध जताया था.

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जैकब और मानेक शॉ में मतभेद

जैकब का मानना था कि ढाका पर कब्ज़ा करना भारतीय सेना का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए था.

जैकब अपनी किताब 'सरेंडर एट ढाका' में लिखते हैं, "लड़ाई से कुछ महीनों पहले मैंने पाकिस्तानी ठिकानों को बाईपास कर सीधे ढाका कूच करने की योजना को अंतिम रूप दिया था लेकिन जब मानेक शॉ और केके सिंह पूर्वी कमान के मुख्यालय पर आए थे तो हमारे मतभेद खुलकर सामने आ गए थे."

वो आगे लिखते हैं, "जब केके सिंह ने अपना प्लान सामने रखा तो मैंने कहा कि ढाका पूर्वी पाकिस्तान का 'जियो-पोलिटिकल हार्ट' है. हम पूर्वी पाकिस्तान पर कब्ज़े की बात ढाका पर कब्ज़ा किए बिना नहीं सोच सकते."

जैकब के मुताबिक, तब मानेक शॉ ने हस्तक्षेप करते हुए कहा था, "आपको नहीं लगता कि अगर हम चटगाँव और खुलना ले लेते हैं तो ढाका अपने-आप गिर जाएगा? मैंने कहा मैं इससे सहमत नहीं हूँ. मैंने फिर दोहराया कि हमारा मुख्य उद्देश्य ढाका पर कब्ज़ा होना चाहिए."

"इस पर मानेक शॉ ने कहा कि ढाका हमारी प्राथमिकता नहीं है. मैं इस पर कब्ज़ा करने के लिए अतिरिक्त सैनिक नहीं दूँगा. इस पर जनरल अरोड़ा ने अपनी रज़ामंदी दिखाई थी."

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बाद में एयर चीफ़ मार्शल पीसी लाल ने अपनी आत्मकथा 'माई इयर्स विद आईएएफ़' में लिखा था-

"हम ये मानकर नहीं चल रहे थे कि हम पाकिस्तानी सेना को पूरी तरह हराकर ढाका पर कब्ज़ा कर पाएँगे. शुरू में लगा भी कि कुछ ऐसा ही होने जा रहा है."

"भारतीय सेना ने जैसोर पर तो 7 दिसंबर को कब्ज़ा कर लिया था लेकिन खुलना पर उसका कब्ज़ा ढाका में पाकिस्तानी सेना के हथियार डालने के बाद ही हो सका."

जब भारत ने किया युद्ध करने का फ़ैसला

1971 की लड़ाई के 50 वर्ष पूरे होने के बाद भी बहुत से पश्चिमी लेखक भारत की निर्णायक कूटनीति और मुक्ति बाहिनी को प्रशिक्षित करने का श्रेय भारत को नहीं देते, लेकिन उनमें इस बारे में एक राय है कि इस मौके पर भारत के राजनीतिक दलों के आपसी मतभेद होने के बावजूद पूरा देश एकजुट था.

अर्जुन सुब्रमण्यम अपनी किताब 'इंडियाज़ वॉर्स 1947-1971' में लिखते हैं, "शुरू में इंदिरा गाँधी ने सोचा था कि मुक्ति बाहिनी को जिस तरह की मदद और प्रशिक्षण भारत दे रहा था, वो अकेले ही अपने बूते पर पाकिस्तान की सेना को हरा पाने में सक्षम होगी."

वो आगे लिखते हैं, "लेकिन उन्होंने इस बात का अंदाज़ा नहीं लगाया था कि पाकिस्तान की सेना की निर्दयता बढ़ती चली जाएगी और भारत में आने वाले शरणार्थियों की संख्या बढ़ती चली जाएगी."

"जब नवंबर आते-आते भारत में पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की संख्या एक करोड़ पार कर गई और पूरी दुनिया ने इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की तो भारत के पास पाकिस्तान से पूर्वी सीमा पर युद्ध करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा."

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बांग्लादेश शरणार्थी
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बांग्लादेश शरणार्थी

इस लड़ाई में पाकिस्तान के सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश के रूप में नए राष्ट्र का जन्म हुआ.

कई पाकिस्तानी युद्धबंदियों ने भी स्वीकार किया कि उनके साथ भारत में अच्छा व्यवहार किया गया था. सेना मुख्यालय का आदेश था कि पाकिस्तानी सैनिकों के साथ जेनेवा समझौते के अनुसार व्यवहार किया जाए.

लेफ़्टिनेंट जनरल टॉमस मैथ्यू याद करते हैं, "आगरा में उनकी पैरा यूनिट को अपने बैरक ख़ाली कर देने के बाद टेंट में रहना पड़ा ताकि पाकिस्तानी युद्धबंदियों को वहाँ रखा जा सके. इस आदेश के बावजूद कि पाकिस्तानी युद्धबंदियों से कम-से-कम घुला-मिला जाए, मैंने युद्धबंदी कैंप का निरीक्षण करने का फ़ैसला किया."

वो बताते हैं, "मैं हाथ में एक बेंत लेकर अपने दो सैनिकों के साथ कैंप में घुसा. मुझे देख कर अधिकतर पाकिस्तानी सैनिक अपनी पलंग के बग़ल में सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए, लेकिन पाकिस्तानी स्पेशल फ़ोर्स के कुछ सैनिक मुझे देखकर बैठे रहे."

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निक्सन और इंदिरा गाँधी के बीच तनातनी

जब जनरल मैथ्यू ने इसकी वजह पूछी तो वे चुप रहे लेकिन एक सैनिक ने हिम्मत जुटाकर कहा, "मैं क्यों सावधान की मुद्रा में खड़ा होऊँ जब मुझे पता नहीं है कि मेरी पत्नी और बच्चे पाकिस्तान में किस हाल में रह रहे हैं?"

जनरल मैथ्यू कहते हैं, "मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि मैं पता लगाकर उनकी जानकारी आपको दूँगा. मैंने उस सैनिक का विवरण लेकर दिल्ली में मिलिट्री ऑपरेशन के महानिदेशक को भेजा. कुछ दिनों बाद जब मैंने उस पाकिस्तानी सैनिक को बताया कि उसका परिवार सकुशल है तो उसके चेहरे पर मुस्कान वापस आ गई."

जैसे-जैसे संकट बढ़ा राष्ट्रपति निक्सन और उनके सलाहकार किसिंजर दोनों इंदिरा गांधी की अमेरिका की बात न मानने की नीति से काफ़ी परेशान हुए.

सातवें बेड़े के भेजे जाने का उन पर कोई असर न होना भी अमेरिकी नेतृत्व को बहुत खला.

तत्काली अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और इंदिरा गांधी
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तत्काली अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी की व्यवहारिक राजनीति पर पकड़ के साथ-साथ उनकी पूर्वी पाकिस्तान के लोगों की पीड़ा से पूरी सहानुभूति ने उन्हें सही फ़ैसले लेने के लिए प्रेरित किया जिसकी वजह से ये लड़ाई एक न्यायसंगत लड़ाई में बदल गई.

1971 की सफलता का सबसे बड़ा श्रेय युद्ध-योजना को दिया जाता है लेकिन इस योजना पर अमल लेफ़्टिनेंट जनरल सगत सिंह, कैप्टेन स्वराज प्रकाश, ग्रुप कैप्टेन वोलेन और ग्रुप कैप्टेन चंदन सिंह के योगदान के बिना नहीं हो सकता था.

अर्जुन सुब्रमण्यम लिखते हैं, "अगर सगत सिंह ने अखौरा, भैरब बाज़ार और सिल्हट को बाईपास नहीं किया होता या चंदन सिंह ने एमआई हेलिकॉप्टरों के ज़रिए सैनिकों, हथियारों और तोपों को मेघना नदी के पार नहीं पहुँचाया होता या ग्रुप कैप्टेन वोलेन ने अपने पायलटों को तेजगाँव हवाई ठिकाने पर डाइव लगा कर हमला करने के लिए नहीं कहा होता या स्वराज प्रकाश और मेजर जनरल ऊबान ने करीब-करीब आधी डिवीजन भारतीय सेना को चटगाँव सेक्टर में नहीं लगाया होता तो ढाका 16 दिसंबर तक तो नहीं गिर पाता."

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ख़ुफ़िया जानकारी काम आई

भारत की जीत का दूसरा बड़ा कारण था मुक्ति बाहिनी का पूरा सहयोग.

लेफ़्टिनेंट जनरल शमशेर सिंह मेहता कहते हैं, "मुक्ति बाहिनी का सबसे बड़ा योगदान था भारतीय सेना तक ख़ुफ़िया जानकारी पहुँचाना."

वो बताते हैं, "अगर हम बांग्लादेश में बिना किसी खुफ़िया जानकारी के गए होते तो पश्चिमी सेक्टर की तरह वहाँ भी हम गतिरोध में उलझ जाते."

वो कहते हैं, "लड़ाई के शुरू के चरण में मुक्ति बाहिनी की वजह से ही हमें पता होता था कि दुश्मन कहाँ है. अगर हमें वो जानकारी नहीं भी होती थी तो हम मुक्ति बाहिनी की सूचना के आधार पर उनके अगले कदम का अंदाज़ा लगा सकते थे."

मुक्ति बाहिनी
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मुक्ति बाहिनी

1971 की पूरी लड़ाई में पाकिस्तान का रुख़ प्रतिक्रियाओं से भरा था.

जब जनरल पिंटो से पूछा गया कि क्या आपको इस बात से आश्चर्य हुआ कि पाकिस्तान ने अपनी अतिरिक्त 6 आर्मर्ड डिवीजन का इस्तेमाल उनकी 57 डिवीजन के ख़िलाफ़ नहीं किया तो उन्होंने कहा कि 'अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो संभवत: मैं आपके सामने इस तरह बात नहीं कर रहा होता.'

इस अभियान की एक और ख़ास बात रही कि ऑपरेशन शुरू होने से छह महीने पहले भारतीय सेना ने सभी प्रशिक्षण और मूलभूत ज़रूरतों का अंदाज़ा लगा लिया था.

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान की युद्ध की तैयारी संतोषजनक नहीं थी और वो अपनी पूरी ताक़त पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष को कुचलने में लगा रहे थे.

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भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान का मनोबल तोड़ा

तैयारी के लिए मिले समय में भारतीय वायुसेना ने कुछ नए हवाई ठिकाने बनाए और अपनी वायु सुरक्षा को और मज़बूत किया.

दूसरी तरफ़ 1965 की लड़ाई में ठीक-ठाक प्रदर्शन करने वाली पाकिस्तानी वायुसेना ने अपनी तैयारी में ढील बरत दी और एयर मार्शल नूर ख़ाँ के प्रयासों के बावजूद अपनी सफलता को नई ऊँचाइयों तक नहीं ले जा पाए.

एयर चीफ़ मार्शल पीसी लाल अपनी आत्मकथा 'माई इयर्स विद आईएएफ़ में लिखते हैं, "पश्चिमी मोर्चे पर भारत और पाकिस्तानी वायु सेना की ताक़त लगभग बराबर होने के बावजूद भारतीय वायु सेना ने कुल 7500 उड़ाने भरीं जबकि 1965 में 23 दिनों की लड़ाई में उसने कुल 4000 उड़ानें भरी थीं."

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कराची पर नौसेना का हमला

भारतीय वायु सेना ने हाजीपीर में पाकिस्तानी आर्टलिरी ब्रिगेड और चंगामंगा जंगल में पाकिस्तानी हथियारों के भंडार पर हमला कर पाकिस्तानी वायुसेना का मनोबल तोड़ दिया.

कराची बंदरगाह के पास कियामारी तेलशोधक कारख़ाने, सिंध में सुई गैस प्लांट, मंगला बाँध और अटक तेलशोधक कारख़ाने पर बमबारी से भी भारतीय वायु सेना के दबदबे में बढ़ोत्तरी हुई.

भारतीय नौसेना ने जिस तरह कराची पर हमला करने के लिए मिसाइल बोट्स का इस्तेमाल किया उसकी भी किसी ने कल्पना नहीं की थी.

हमले के दौरान मिसाइल बोट के चालक दल ने आपस में रूसी भाषा में बात की ताकि पाकिस्तानी उनकी भाषा न समझ सकें.

पाकिस्तानी नौसेना आक्रामक रणनीति बनाने में असफल रही. वो भारत की एक पनडुब्बी आईएन एस खुखरी डुबा पाने में ज़रूर कामयाब रहे लेकिन विक्रांत को डुबोने आई उनकी पनडुब्बी ग़ाज़ी, विशाखापट्टनम के तट के पास खुद ही डूब गई.

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सैन्य मामलों के विशेषज्ञों के बीच इस बारे में आज भी बहस होती है कि अगर जनरल मानेक शॉ ने अप्रैल में पूर्वी पाकिस्तान पर हमला करने के इंदिरा गाँधी के आदेश को मान लिया होता तो क्या हुआ होता.

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे शायद भारत को फ़ायदा हुआ होता क्योंकि तब तक पाकिस्तान की तैयारी बिलकुल नहीं के बराबर थी.

लेकिन अर्जुन सुब्रमणियम का मानना है कि "अगर ऐसा हो जाता तो भारतीय सेना की आँख और कान का काम करने वाली मुक्ति बाहिनी की मदद उन्हें न मिल पाती. इसका मतलब ये होता कि भारत के फ़ील्ड कमांडर सूचना के अभाव में उसी तरह अँधेरे में तीर चलाते जैसा उन्होंने पश्चिमी मोर्चे पर चलाए थे."

जहाँ तक बांग्लादेश अभियान के मनोवैज्ञानिक पहलू की बात है, लड़ाई के पहले सप्ताह में ही जनरल नियाज़ी की विरोध करने की इच्छाशक्ति समाप्त हो चली थी.

तंगेल पैराड्रॉप और ढाका के गवर्नमेंट हाउस पर मिग-21 और हंटर विमानों के हमले ने नियाज़ी को मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़कर रख दिया था.

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पाकिस्तानी फ़ील्ड कमांडरों को लगने लगा था कि हार के लिए ज़िम्मेदार ठहराए जाने से बेहतर है कि वो भारतीय सेना के सामने हथियार डाल दें.

लेफ़्टिनेंट जनरल शमशेर सिंह मेहता कहते हैं, "अगर सगत सिंह और चंदन सिंह न हुए होते तो ढाका भी नहीं होता. अगर पूर्वी कमान के मुख्यालय में जनरल जैकब नहीं होते तो पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण नहीं हो पाता. जहाँ सगत सिंह सैनिक मामलों में जीनियस थे, वहीं जैकब दुश्मन का दिमाग पढ़ने में माहिर थे."

1971 की लड़ाई ने युद्ध में वरिष्ठ नेतृत्व की भूमिका को रेखांकित किया था.

तीनों सेना प्रमुखों ने 30 और 40 के दशक में पैदा हुए अफ़सरों की प्रतिभा को पहचानने और लड़ाई में उन्हें महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी देने में कोई कोताही नहीं बरती थी.

मानेक शॉ ने लड़ाई से कई महीने पहले अपने साथ काम कर चुके क़ाबिल अफ़सरों लेफ़्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा, मेजर जनरल जैकब, लेफ़्टिनेंट जनरल सगत सिंह और मेजर जनरल इंदर गिल को महत्वपूर्ण पदों पर बैठा दिया था.

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एयर चीफ़ मार्शल पीसी लाल ने भी तेज़ अफ़सरों की पहचान कर विनायक मालसे, मैली वोलेन और चंदन सिंह को महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां दी थीं.

एडमिरल नीलकांता कृष्णन, एसएन कोहली और स्वराज प्रकाश के रूप में एडमिरल नंदा ने चुनिंदा अफ़सर चुने थे जो उनकी योजना पर अमल करने में पूरी तरह से सक्षम थे.

युवा अफ़सरों में अरुण खेत्रपाल, होशियार सिंह, निर्मलजीत सिंह सेखों, बहादुर करीम नवीना और डॉन लज़ारुस ने बहादुरी की नई मिसाल कायम की थी.

जहां तक राजनीतिक नेतृत्व की बात है इंदिरा गांधी और जगजीवन राम को युद्ध का नेतृत्व करने का कोई अनुभव नहीं था और न ही उन्हें सैनिक मामलों की कोई गहरी समझ थी.

लेकिन उन्होंने इस मामले में सैन्य बलों की बहुत मदद की कि उन्होंने उनके सामने स्पष्ट रूप से राजनीतिक लक्ष्य रखे और सेना प्रमुखों को काम करने की पूरी आज़ादी दी.

सेना प्रमुखों ने जो सलाह दी उसे एक विस्तृत रणनीति का हिस्सा बनाया गया.

राजनीतिक इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार लोगों के बीच समुचित तालमेल ने भारत को इस युद्ध में विजयी बनाया.

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