चीन के 16 लोगों ने ली भारतीय नागरिकता, कितने और कतार में हैं सरकार ने बताया

नई दिल्ली, 16 मार्च: 15 वर्षों में 16 चाइनीज नागरिकों को भारतीय नागरिकता दी गई है और कई आवेदन अभी भी सरकार के पास लंबित हैं। यह जानकारी आज केंद्र सरकार ने संसद में एक लिखित सवाल के जवाब में दी है। हालांकि, सरकार ने यह बताने में असमर्थता जाहिर की है कि ये चीनी नागरिक कौन हैं और चीन के किस समुदाय और समाज से आते हैं। क्योंकि, चीन से तिब्बती, उइगर मुसलमान और मंगोल समुदायों के मानवाधिकार उल्लंधन की खबरें आती रहती हैं और चीन की सरकार इन खबरों को सख्ती से दबाने की भरपूर कोशिश में लगी रहती है।

15 साल में 16 चाइनीजों को मिली भारतीय नागरिकता

15 साल में 16 चाइनीजों को मिली भारतीय नागरिकता

केंद्र सरकार ने बुधवार को राज्यसभा में जानकारी दी है कि पिछले 15 वर्षों में 16 चाइनीज नागरिकों को भारतीय नागरिकता दी गई है। यह जानकारी गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने एक लिखित सवाल के जवाब में दी है। उन्होंने सदन से कहा है कि 2007 से अबतक 16 चीनी नागरिकों को भारतीय नागरिकता दी गई है। सरकार से यह विवरण डीएमके सांसद तिरुचि शिवा ने मांगा था। उन्होंने चीन से तिब्बतियों, उइगर मुसलमानों, मंगोलियन समुदाय और दूसरे लोकतांत्रिक असंतुष्टों की ओर से भारत से शरणार्थी और नागरिकता के अनुरोध की विस्तृत जानकारी सरकार से मांगी थी।

10 चीनी नागरिकों का आवेदन लंबित है-सरकार

10 चीनी नागरिकों का आवेदन लंबित है-सरकार

इस सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री राय ने सदन को बताया कि 'ऑनलाइन सिटीजनशिप मॉड्यूल पर जो डेटा उपलब्ध है उसके मुताबिक, नागरिकता की मंजूरी के लिए चीनी नागरिकों के 10 आवेदन लंबित हैं। इसके अलावा, 2007 से 16 चीनी नागरिकों को भारत की नागरिकता प्रदान की गई है।' हालांकि, उन्होंने चीन के विभिन्न समुदायों को दी गई नागरिकता के बारे में जानकारी नहीं दी, क्योंकि इस डेटा में सिर्फ राष्ट्रीयता का ही जिक्र होता है। समुदाय के आधार पर डेटा का जिक्र नहीं किया गया है।

'शरण मांगने वालों का डेटा केंद्रीय स्तर पर नहीं'

'शरण मांगने वालों का डेटा केंद्रीय स्तर पर नहीं'

जवाब में नित्यानंद राय ने यह भी बताया है कि भारत ने शरणार्थियों की स्थिति और उससे संबंधित 1967 के प्रोटोकॉल के तहत 1951 के संयुक्त राष्ट्र कंवेंशन पर हस्ताक्षर नहीं किया है। गृह राज्य मंत्री ने कहा, 'सभी विदेश नागरिक (शरण मांगने वालों समेत) फॉर्नर्स ऐक्ट- 1946, रजिस्ट्रेशन ऑफ फॉर्नर्स ऐक्ट- 1939, पासपोर्ट ऐक्ट (भारत में प्रवेश), 1920 और सिटीजनशिप ऐक्ट- 1955 के प्रावधानों से नियंत्रित होते हैं। शरण मांगने वालों का डेटा केंदीय स्तर पर नहीं रखा जाता।'

चीन में कई समुदायों के साथ ज्यादती की रिपोर्ट

चीन में कई समुदायों के साथ ज्यादती की रिपोर्ट

गौरतलब है कि चीन के शिंजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों के मानवाधिकार का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मसला है। आरोपों के मुताबिक यह अल्पसंख्य समुदाय चीन की सत्ताधारी चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से दमन और बर्बरता का शिकार होता रहा है। हालांकि, चीन इन आरोपों का हमेशा से खंडन करता आया है। लेकिन, उइगरों के साथ दिक्कत ये है कि उनके साथ खड़े होने की हिम्मत बड़े से बड़े मुस्लिम राष्ट्र भी नहीं दिखा पाते। एक आंकड़े के मुताबिक तुर्की ने जरूर 30,000 से ज्यादा उइगर मुसलमानों को अपने यहां शरण दे रखा है। जबकि, इसके ठीक उलट पाकिस्तान के मौजूदा पीएम इमरान खान भी उइगर मुसलमानों के मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों पर शी जिनपिंग की सरकार की तरफदारी कर रहे हैं।

उइगर मुसलमानों और तिब्बतियों का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित

उइगर मुसलमानों और तिब्बतियों का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित

2016 में भारत ने उइगर ऐक्टिविस्ट डोलुन ईसा को वीजा दिया था, लेकिन बाद में यह वीजा आवेदन वापस ले लिया गया था। ईसा वर्ल्ड उइगर कांग्रेस के चीफ हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उइगरों की आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। उइगरों की हालातों का मुद्दा उठाने वाले देशों के खिलाफ चीन हमेशा नाराजगी जाहिर करता आया है। जबकि, कई पश्चिमी मीडिया उइगर मुसलमानों को प्रताड़ित करने वाले डिटेंशन कैंपों की भयावह और दर्दनाक कहानियां बयां कर चुके हैं। इसमें उइगर पुरुषों को तो प्रताड़ित किया ही जाता है, उइगर महिलाओं के साथ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के कैडर सेक्स गुलामों की तरह बर्ताव करते हैं। (कुछ तस्वीरें- सांकेतिक)

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