बिहार चुनाव के नतीजों ने दिए बीजेपी को यह 10 सबक
पटना। बिहार चुनाव के नतीजे शायद बीजेपी के लिए काफी चौंकाने वाले हैं। वर्ष 2010 में पार्टी को 91 सीटें मिली थीं और इस बार पार्टी 80 सीटों के आसपास सिमटती नजर आ रही है।
पार्टी ने जहां अपनी हार स्वीकार कर ली है तो वहीं अंदर ही अंदर अब इस हार को लेकर एक मंथन भी शुरू हो चुका होगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि पार्टी ने इतना खराब प्रदशर्न किया।
पार्टी के प्रदर्शन के लिए चाहे जो वजहें रहीं हो लेकिन यह सच है कि इस हार ने पार्टी को कई सबक भी सिखाएं हैं, पार्टी माने या न माने। एक नजर डालिए उन 10 बातों पर जो बतौर सबक इन चुनावों के नतीजों के बाद पार्टी को हासिल हुए हैं।

बयान
सिर्फ बयान देने के नाम पर बयान न दें बल्कि अपने दिमाग का प्रयोग करके ही कुछ कहें।

सबकी सुनें
नेता चाहे आरके सिंह जैसा कोई पूर्व अधिकारी रहा हो या फिर शत्रुघ्न सिन्हा जैसा बॉलीवुड एक्टर, पार्टी के नेताओं के तौर पर सबकी आवाजों को सुनें।

रणनीति
सिर्फ जात-पात या फिर गौमांस जैसे मुद्दों को ही रणनीति में शामिल न करें बल्कि विकास के मुद्दे को सबसे पहले तरजीह दें।

अहम को किनारे करें
लोकसभा के बाद दूसरे विधानसभा चुनावों में मिली जीत की वजह से आया अहम अब चकनाचूर हो गया है। बेहतर होगा कि अगर इसे किनारे करके आगे की रणनीति पर काम किया जाए।

दुश्मन को कमजोर न समझें
बीजेपी ने इस बार नीतीश कुमार को कमजोर समझने की जो गलती की है, उसकी वजह से पार्टी को खासा नुकसान हुआ है। ऐसे में अब आगे बेहतर होगा कि पार्टी अपने दुश्मनों की ताकत को समझकर ही आगे बढ़े।

क्षेत्रीय राजनेता को मिले तरजीह
शत्रुघ्न सिन्हा के ट्वीट से अब बीजेपी को एक सीख लेनी होगी। सिन्हा ने ट्वीट किया है कि जहां बिहार में चुनाव बिहारी वर्सेज बाहरी के तौर पर लड़ा जा रहा था तब बीजेपी ने पार्टी के बिहारी को ही बाहर कर दिया।

लोकसभा और विधानसभा
जो नेता या पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर है वह राज्य स्तर पर भी कमजोर होगी, यह कभी न समझें।

पॉपुलैरिटी
सीएम नीतीश की पॉपुलैरिटी को पीएम मोदी ने अपनी पॉपुलैरिटी से कम आंका। पीएम मोदी को समझना होगा कि बिहार की तरह ही अन्य राज्यों में उनके मुकाबले पॉपुलर लीडर मौजूद हैं।

समय पर कर दें नेता का ऐलान
विधानसभा चुनावों में पार्टी के पास जब तक उसका स्थानीय नेता नहीं होगा, जनता कंफ्यूज ही रहेगी। यह कंफ्यूजन बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में नुकसान न पहुंचाए इसलिए अभी से अपने नेता के बारे में सोचना शुरू कर दें।

विवादित मुद्दों को चुनावी मुद्दा न बनाएं
बीफ, पाकिस्तान और आरक्षण जैसे मुद्दों अब पुराने हथकंडे हो चुके हैं। बेहतर होगा कि अब इनसे पार्टी तौबा कर ले।
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