हिंद महासागर में खुफिया सैन्य अड्डे बना रहा है भारतः रिपोर्ट

नई दिल्ली, 05 अगस्त। उपग्रह से मिली तस्वीरें कहती हैं कि मॉरिशस के द्वीप अगालेगा में दो नौसैनिक जेटी और एक बड़ी हवाई पट्टी बनाई जा रही हैं. अल जजीरा को कुछ सैन्य विशेषज्ञों ने बताया है कि लगभग तय है कि ये निर्माण सैन्य प्रयोग के लिए हैं.

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वैसे ऐसी ही खबरें 2018 में भी आई थीं और तब भारत और मॉरिशस दोनों ने इस निर्माण को सैन्य इस्तेमाल से जुड़ा होने का खंडन किया और कहा कि यह द्वीप पर रहने वाले लोगों की जरूरतों के लिए है. मॉरिशस की मुख्य भूमि से करीब 1,100 किलोमीटर दूर स्थित इस द्वीप पर 300 लोग रहते हैं.

भारत ने हाल के दिनों में हिंद और प्रशांत महासागर में अपनी गतिविधियां और पहुंच बढ़ाई हैं. एक दिन पहले ही खबर आई थी कि भारत दक्षिण चीन सागर में अपना नौसैनिक टास्क फोर्स भेज रहा है. इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया के साथ उसका सैन्य संपर्क भी लगातार बढ़ रहा है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि हिंद और प्रशांत महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों को लेकर प्रशांत क्षेत्र के देशों में चिंता बढ़ रही है इसलिए वे उसे संकेत भेजना चाहते हैं.

तस्वीरों मेंः भारत से कितना डरते हैं चीनी

चीन मामलों के विशेषज्ञ मेलबर्न यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले डॉ. प्रदीप तनेजा कहते हैं, "इसका मतलब यह है कि चीन की गतिविधियां अगर बढ़ती रहेंगी और चीन भारत के पड़ोसी देशों, खासकर दक्षिण एशियाई देशों के नजदीक अगर चीन के जहाज और पनडुब्बियां आएंगी, तो भारत को यह सोचना होगा कि चीन क्यों इन देशों के साथ अपने सैनिक संबंध इतने बढ़ा रहा है."

भारत भी बढ़ा रहा है संबंध

पिछले कुछ सालों में प्रशांत क्षेत्र में भारत ने कई देशों से अपने सैन्य संबंध बढ़ाए हैं. इनमें सबसे प्रमुख ऑस्ट्रेलिया है, जिसके साथ भारत के सैन्य अभ्यास और अन्य आदान-प्रदान में काफी तेजी आई है.

इसी साल ऑस्ट्रेलिया के बेहद प्रतिष्ठित सैन्य अभ्यास तालिस्मान साबर में अन्य देशों के अलावा भारत को भी बतौर पर्यवेक्षक बुलाया गया है. ऑस्ट्रेलिया ने ऐसी इच्छा भी जताई है कि 2023 के तलिस्मान साबर अभ्यास में भारत भी हिस्सा ले.

पिछले साल भारत ने ऑस्ट्रेलिया को अपने सैन्य अभ्यास मालाबार में आमंत्रित किया था, जो लगभग दो दशक बाद हुआ था. पिछले साल सितंबर में भारत और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्रियों के बीच एक रणनीतिक वार्ता हुई थी जिसके बाद ऑस्ट्रेलिया इंडिया स्ट्रैटिजिक पार्टनरशिप संधि हुई थी जिसमें सैन्य संबंधों को अहम जगह दी गई थी.

देखिएः आकाश से लद्दाख

पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच नियमित सैन्य आदान-प्रदान भी बढ़ा है. दोनों देशों के जहाज और अधिकारी नियमित रूप से आते जाते हैं. हाल ही में भारतीय सेना के कई बड़े अधिकारी ऑस्ट्रेलिया का दौरा कर चुके हैं.

क्वॉड की बढ़ती ताकत

भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के संगठन क्वॉड्रिलैटरल सिक्यॉरिटी डायलॉग (क्वॉड) का मजबूत होता आधार भी इसी दिशा में एक कदम माना जा रहा है. क्वॉड में शामिल चार देश लगातार अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर चर्चा कर रहे हैं. हाल ही में भारत की यात्रा पर गए अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने भी क्वॉड पर खासा जोर दिया और इसी साल संगठन की एक बैठक कराने का प्रस्ताव भी रखा.

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत के नजरिए से यह एक सकारात्मक कदम है क्योंकि वह अकेला चीन का सामना नहीं कर सकता.

डॉ. तनेजा कहते हैं, "भारत का रक्षा बजट, चीन के रक्षा बजट के एक चौथाई से भी कम है. तो भारत के पास अकेले इतनी शक्ति नहीं है कि चीन की जो बढ़ती हुई ताकत है, उसका मुकाबला कर सके. तो भारत ने यही नीति अपनाई है कि जो दूसरे समदर्शी देश हैं, उनके साथ मिलकर इंटेलिजेंस शेयरिंग और बातचीत के जरिए यह आंका जा सके कि चीन के इरादे क्या हैं और अगर इरादे ठीक नहीं हैं तो उसका कैसे जवाब दिया जाए."

चीन को घेरने की कोशिश?

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत ने ही नहीं बल्कि अन्य कई देशों ने भी अपनी गतिविधियां तेज की हैं. ब्रिटेन का का विमानवाहक युद्धतपोत क्वीन एलिजाबेथ और उसके सहयोगी जहाज सितंबर में जापान पहुंच रहे हैं. जापान के टोक्यो में एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद ब्रिटेन ने ऐलान किया है कि उसके दो पोत स्थायी तौर पर एशिया में तैनात रहेंगे.

टोक्यो और लंदन के बीच मजबूत होते रणनीतिक संबंधों के बीच यह ऐलान हुआ है. हाल ही में जापान ने चीन के अपनी सीमाओं के प्रसार के मंसूबों को लेकर चिंता जताई थी. इसमें ताईवान को लेकर चीन के इरादों की ओर भी इशारा किया गया था.

जानेंः भारत और चीन की सेना में अंतर

जापान, दक्षिण कोरिया और इस क्षेत्र के अन्य कई देश भी न सिर्फ अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं बल्कि विभिन्न देशों के साथ मिलकर ऐसे कदम भी उठा रहे हैं जिन्हें चीन के खिलाफ देखा जा सकता है.

हालांकि डॉ. तनेजा इसे चीन को घेरने की कोशिश नहीं मानते. वह कहते हैं, "यह घेरने वाली बात नहीं है. इन देशों को लगता है कि हमें मिल जुलकर एक संकेत देना चाहिए कि चीन अगर अपनी ताकत का प्रदर्शन करेगा तो उसे सहन नहीं किया जाएगा."

चीन दक्षिणी चीन सागर के बड़े हिस्से पर अपने अधिकार का दावा करता है. यह दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में तनाव और विवाद की बड़ी वजह है क्योंकि कई अन्य देश भी इन इलाकों पर दावा करते हैं, जिन्हें अमेरिका और यूरोप का भी समर्थन मिलता है. कथित 'नाईन डैश लाइन' पर उसके अधिकार का दावा द हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में भी खारिज हो चुका है.

Source: DW

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