भारत की अदालतों में लंबित हैं 4.70 करोड़ मामले

नई दिल्ली, 02 मई। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी में एक सम्मेलन में बोलते हुए मुख्य न्यायाधीश रमना ने कहा कि अदालतें जजों की कमी से जूझ रही हैं. उन्होंने कहा, "दस लाख लोगों पर हमारे पास 20 जज हैं, जो बढ़ती मुकदमेबाजी को संभालने के लिए नाकाफी हैं."
चीफ जस्टिस रमना ने कहा कि जजों के लिए 24 हजार पद हैं जिनमें से बड़ी संख्या में खाली पड़े हैं. छह साल के अंतराल पर हो रहे मुख्य न्यायाधीशों के 39वें सम्मेलन का उद्घाटन कर रहे थे. उन्होंने देश के पच्चीसों उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों से जल्द से जल्द जजों की पदोन्नति के लिए नाम भेजने को भी कहा.
जस्टिस रमना ने कहा, "मैं खाली पड़े पदों का मामला उठाना चाहता हूं. आपको याद होगा कि मेरी आपसे पहली बात खाली पड़े पदों को भरने के बारे में ही हुई थी. ऑनलाइन हुए हमारे पहले संवाद में ही मैंने आपसे अनरोध किया था कि जजों की हाई कोर्ट में पदोन्नति के लिए नामों की सिफारिश की प्रक्रिया को तेज करें और उसमें सामाजिक विविधता का ध्यान रखें."
दशकों पुराने मामले
पिछले महीने लोकसभा को दिए एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने सूचित किया था कि देश में 4.70 करोड़ मामले अदालतों में लंबित हैं, जिनमें से 70,154 सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में हैं. 25 उच्च न्यायालयों में 58 लाख 94 हजार 60 मामले लंबित हैं जबकि निचली अदालतों में लंबित मामलों की संख्या 4,10,47,976 है. इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश, लक्षद्वीप और अंडमान व निकोबार द्वीप के आंकड़े उपलब्ध नहीं थे.
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कानून मंत्री किरेन रिजेजू ने लोकसभा को बताया, "अदालतों में मामलों का समय पर निपटारा बहुत सारी बातों पर निर्भर करता है. इनमें जजों और अन्य न्यायिक अधिकारियों की समुचित संख्या, आधारभूत ढांचा, तथ्यों की जटिलता, सबूतों की उपलब्धता, पक्षों का सहयोग और नियम व प्रक्रियाओं का पालन आदि शामिल हैं."
2018 में नीति आयोग ने एक रिपोर्ट में लिखा था कि तब जिस रफ्तार से अदालतों में मामलों का निपटारा हो रहा था, उसके मुताबिक लंबित पड़े मामलों के निपटारे में 324 साल से ज्यादा का वक्त लगना था. तब लंबित मामलों की संख्या 2.9 करोड़ थी. उनमें से 65,695 मामले ऐसे थे जिन्हें दिसंबर 2018 तक लंबित पड़े 30 साल से ज्यादा गुजर चुके थे.
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कानूनविद और व्यवस्था के जानकार भारतीय न्यायपालिका की धीमी गति में जो समस्याएं गिनवाते हैं उनमें डिजिटाइजेशन ना होना भी एक है. जानेमाने पत्रकार और आउटलुक पत्रिका के पूर्व प्रबंधक संपादक संदीपन देब ने एक लेख में लिखा था, "हमारी न्याय व्यवस्था देश के सबसे कम डिजिटाइज हुए क्षेत्रों में से एक है. 2019 की क्विंट की एक रिपोर्ट में पता चला कि सुप्रीम कोर्ट के जज हर साल 4.8 करोड़ ए4 कागज हर साल इस्तेमाल करते हैं."
अप्रासंगिक कानून
सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मानवीय संवेदनाओं के आधार पर मामलों को प्राथमिकता दें. उन्होंने कहा, "हमें अदालतों में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने की जरूरत है. इससे ना सिर्फ आम आदमी का न्याय व्यवस्था में भरोसा बढ़ेगा बल्कि वह इससे ज्यादा जुड़ाव भी महसूस करेगा."
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मोदी ने कहा कि 2015 में सरकार ने 1,800 ऐसे कानूनों की पहचान की जो अप्रासंगिक हो चुके हैं. उन्होंने कहा, "इन 1,800 कानूनों में से हमने केंद्र के 1,450 कानून खत्म कर दिए जबकि राज्यों ने सिर्फ 75 ऐसे कानून खत्म किए."
प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसी न्याय व्यवस्था बनाने पर ध्यान देना होगा जिसमें सभी के लिए, त्वरित और आसानी न्याय उपलब्ध हो. मोदी ने कहा, "हमारे देश में न्यायपालिका की भूमिका संविधान के अभिभावक की है जबकि कार्यपालिका जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है. मेरा मानना है कि इन दोनों की सम्मिलन देश में एक प्रभावशाली और समयबद्ध न्याय व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त करेगा."
रिपोर्टः विवेक कुमार (रॉयटर्स)
Source: DW
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