भारत का ई रुपया लोगों को लुभाने में नाकाम

RBI: मुंबई में रिजर्व बैंक के मोनेट्री म्यूजियम के ठीक बाहर बच्चे लाल साहनी देश की मुद्रा के नये स्वरूप ई-रुपये को परख रहे हैं.

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मुंबई में रिजर्व बैंक के मोनेट्री म्यूजियम के ठीक बाहर बच्चे लाल साहनी देश की मुद्रा के नये स्वरूप ई-रुपये को परख रहे हैं. 45 साल के फल दुकानदार साहनी भारत के खुदरा बाजार के उन शुरुआती लोगों में हैं जो सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी सीबीडीसी का इस्तेमाल कर रहे हैं. भारतीय रिजर्व बैंक ने खुदरा ग्राहकों के लिए इसे एक दिसंबर को जारी किया. इससे एक महीने पहले इसे अंतरबैंकीय लेनदेन के लिए जारी किया गया था.

अब तक साहनी के यहां कुल 30 खरीदारियां ई-रुपये के माध्यम से हुई है. ई-रुपये के अलावा उनके पास गूगल पे और पेटीएम की सुविधा भी है. उन्हें उम्मीद है कि जल्दी ही ज्यादा लोग इसका इस्तेमाल करेंगे, फिलहाल तो नगद वाले ग्राहक ही ज्यादा हैं. साहनी कहते हैं, "यह बिना इंटरनेट के भी काम करता है. गूगल पे और पेटीएम इस्तेमाल करने में कई बार हमें नेटवर्क की दिक्कत होती है." समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बातचीत में साहनी ने कहा, "लोग ई-रुपये के बारे में नहीं जानते क्योंकि अभी यह पायलट फेज में ही है. यह लोकप्रिय होगा लेकिन थोड़ा समय लगेगा."

क्या है सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी

सीबीडीसी देश की आधिकारिक मुद्रा का डिजिटल स्वरूप है जो अंतरबैंकीय और अंतरदेशीय भुगतान के साथ ही खुदरा लेनदेन के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती है. 100 से ज्यादा देश सीबीडीसी के बारे में रिसर्च, विकास या पायलट रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं. बहामास, जमैका और नाईजीरिया जैसे दर्जन भर देशों ने इसे अपने यहां लॉन्च किया है.

आरबीआई का कहना है कि ई-रुपया देश की डिजिटल इकोनॉमी को मजबूत करेगा और भुगतान तंत्र को ज्यादा कुशल बनाएगा. आर्थिक जानकारों का कहना है कि क्रिप्टोकरंसी की बढ़ती लोकप्रियता और यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद लगे आर्थिक प्रतिबंधों ने भी देशों को सीबीडीसी को आजमाने के लिए प्रेरित किया है.

अटलांटिक काउंसिल के जियोइकोनॉमिक्स सेंटर में वरिष्ठ निदेशक जोश लिप्स्की का कहना है, "क्रिप्टोकरंसी के उभार ने भारत जैसे देशों को मौद्रिक संप्रभुता को लेकर चिंता में डाला है और उन्हें विकल्पों की ओर देखना पड़ा है. खासतौर से डॉलर समर्थित स्टेबलकॉइन का विकल्प." स्टेबलकॉइन वर्चुअल कॉइन है जिन्हें डॉलर के बदले इस्तेमाल किया जाता है.

ज्यादा से ज्यादा लोगों को डिजिटल मुद्रा पहुंचाने की कोशिश

दुनिया भर में नगदी का इस्तेमाल घट रहा है. महामारी के दौरान इस चलन ने और जोर पकड़ा. हालांकि इतने पर भी विश्व बैंक के मुताबिक दुनिया में 1.7 अरब वयस्कों के पास आज भी बैंक खाते नहीं हैं.

सीबीडीसी को मोबाइल फोन में ई वॉलेट के जरिये इस्तेमाल किया जाता है. यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने में सक्षम है. हालांकि कई सीबीडीसी इस तरह डिजाइन किये गये हैं कि उन्हें मौजूदा वित्तीय तंत्र के जरिये ही इस्तेमाल किया जा सकता है.

आर्थिक अपराधों पर नजर रखने वाले ब्रिटिश लेखक ओलिवर बुलॉफ का कहना है, "उन्हें इस तरह डिजाइन किया जा सकता है कि जो लोग आज आर्थिक सेवाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं उन तक पहुंचा जा सके. हालांकि यह फिर थोड़ा महंगा होगा और मुझे यह नहीं दिखा कि सेंट्रल बैंक इस जिम्मेदारी को उठाने में दिलचस्पी ले रहे हों."

बुलॉफ का कहना है कि सेंट्रल बैंक के आकर्षण की एक बड़ी वजह है मनी लाउंड्रिंग और दूसरे आर्थिक अपराधों पर नकेल कसना. नगद का पता लगाना मुश्किल है लेकिन सीबीडीसी के लिए आईडी चाहिए. उनका कहना है, "कोई भी डिजिटल करंसी गुमनाम नहीं है. चाहे आप एप्पल पे यूज करें या डेबिट कार्ड, आपकी पहचान तय है."

रिजर्व बैंक का कहना है कि ई रुपये के लिए कानूनी तौर पर गुमनामी हासिल करना संभव है. आरबीआई के डिप्टी गवर्नर टी. रबी संकर ने दिसंबर में कहा, "गुमनामी इस मुद्रा का बुनियादी गुण है और हमें उसे सुनिश्चित करना होगा."

डिजिटल ड्राइव

बहामास 2020 में सैंड डॉलर के रूप में सीबीडीसी लॉन्च करने वाला पहला देश बना था. हालांकि अधिकारियों का कहना है कि वहां कम ही लोगों ने इसे अपनाया है. चीन में अलीपे और वीचैट पे का डिजिटल पेमेंट में दबदबा है लेकिन डिजिटल युआन यानी ई सीएनवाई का परीक्षण कई शहरों में चल रहा है. इसे 2022 में विंटर ओलिंपिक के लिए शुरू किया गया. तब कई विशेषज्ञों ने इसे निगरानी रखने का औजार कह कर इसके खिलाफ चेतावनी भी दी थी.

बीते कुछ सालों से भारत में डिजिटल भुगतान तेज हुआ है. छोटी मोटी खरीदारियां भी यूपीआई जैसे माध्यमों से की जा रही हैं. इसके जरिये छोटी रकम का भुगतान रियल टाइम में बैंक खातों के बीच होता है. पिछले महीने करीब 150 अरब डॉलर की कीमत के 7 अरब लेनदेन यूपीआई के माध्यम से किये गये. अधिकारियों का कहना है कि यूपीआई ने बैंकिंग सेवाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों का दायरा बढ़ाने में मदद की है.

हालांकि ज्यादा डिजिटल होने पर प्राइवेसी और सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ती है. सीबीडीसी के जरिये सरकार इसे अपनाने और इस्तेमाल के लिए दबाव बना सकती है. फ्री सॉफ्टवेयर मूवमेंट से जुड़ी श्रीनिवास कोडली का कहना है, "प्राइवेसी डिजिटल पेमेंट सिस्टम में सबसे बड़ी चिंता का कारण है खासतौर से सीबीडीसी के मामले में. भारत में डाटा प्रोटेक्शन कानून सरकार को सारे आंकड़ों तक जाने की छूट देता है."

कोडली ने यह भी कहा, "साइबर सुरक्षा एक और चिंता है, क्योंकि कोई भी खामी लोगों को जोखिम में डाल देगी. सीबीडीसी को दूसरे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की तरह ही बिना पारदर्शिता और नागरिकों की भागीदारी के विकसित किया गया है." यहां तक कि बैंकर भी कह रहे है कि वो ई रुपये में यूपीआई के मुकाबले कोई सचमुच का फायदा नहीं देखते हैं.

एनआर/वीके (रॉयटर्स)

Source: DW

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