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हिमाचल में आज भी कायम है वीरभद्र सिंह का जलवा

शिमला। हिमाचल विधानसभा चुनावों में भले ही सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी पिछड़ गई हो, लेकिन पार्टी के कद्दावर नेता वीरभद्र सिंह का करिशमा उनकी ढलती उम्र के बावजूद आज भी कायम है। इस बार भी वीरभद्र सिंह ने चुनाव जीत लिया है। हालांकि उनका चुनाव क्षेत्र भी भाजपा नेता प्रेम कुमार धूमल की तरह बदला गया था। रामपुर रियासत के अंतिम राजा वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के पहले ऐसे नेता हैं, जो अपने राजनीतिक करियर में एक-दो नहीं बल्कि चार विधानसभा हलकों से जीत कर विधानसभा में पहुंचे हैं। इस बार उन्होंने अपनी शिमला ग्रामीण सीट को छोड़कर सोलन जिला के अर्की से चुनाव लड़ा और जीत कर नया इतिहास कायम किया। वीरभद्र सिंह अपने जीवन के 55 साल राजनीति में ही बिता चुके हैं। उन्होंने केंद्रीय राजनीति से प्रदेश की राजनीति में आने के बाद कुल चार विधानसभा हलकों से विधानसभा में प्रवेश किया है। अबकी बार वह अपनी चौथी विधानसभा सीट अर्की से विधानसभा में पहुंचे हैं। उन्होंने भाजपा के प्रत्याशी को 6051 वोटों से शिकस्त दी।

पहला चुनाव जुब्बल-कोटखाई हलके से लड़ा

पहला चुनाव जुब्बल-कोटखाई हलके से लड़ा

वीरभद्र सिंह हिमाचल की राजनिति में 1983 में आए और उन्होंने अपना पहला विधानसभा चुनाव जुब्बल-कोटखाई हलके से लड़ा था। इसके बाद 1990 में वीरभद्र सिंह दो हलको जुब्बल-कोटखाई और रोहड़ू से चुनाव लड़ा था और उस दौरान वे रोहड़ू की सीट भारी अंतर से जीते थे, लेकिन जुब्बल कोटखाई हार गए थे। वे दो बार जुब्बल-कोटखाई हलके से विधायक चुने गए थे। इसके बाद वे रोहड़ू से ही चुनाव लड़ते रहे और वह वहां से पांच बार विधायक चुने गए।

पुत्र विक्रमादित्य सिंह ने भी जीत से किया राजनीति में डेब्यू

पुत्र विक्रमादित्य सिंह ने भी जीत से किया राजनीति में डेब्यू

डीलिमिटेशन के बाद रोहड़ू हलका रिजर्व होने पर वे शिमला ग्रामीण सीट पर शिफ्ट हो गए। राजधानी शिमला के साथ लगती यह सीट नई बनी थी। इसका गठन कसुंपटी और कुमारसेन हलकों को काटकर बनाया गया था। इस सीट से वे पिछली बार चुनाव जीते थे और वह भी करीब 20 हजार के भारी अंतर से जीते। अबकी वहां से उनके पुत्र विक्रमादित्य सिंह चुनावी समर में उतरे और उन्हें फिर नई सीट तलाशनी पड़ी। अबकी उन्होंने सोलन जिला में प्रवेश किया और वहां की अर्की सीट से भाग्य आजमाया। इस प्रकार जुब्बल-कोटखाई, रोहड़ू और शिमला ग्रामीण हलके के बाद अर्की उनका चौथा विधानसभा क्षेत्र था। इस बार अर्की से उन्होंने भारी मतों से जीत दर्ज कर अपना लोहा मनवाया।

9वीं बार अर्की सीट से विधानसभा पहुंचे हैं

9वीं बार अर्की सीट से विधानसभा पहुंचे हैं

वीरभद्र सिंह की खासियत रही है कि वे जिस हलके से भी चुनाव लड़ते हैं वे वहां दो-तीन दिन से ज्यादा समय नहीं लगाते। वे नामांकन पत्र भरने के बाद बीच में या अंत में एक दो दिन लगाते हैं। बाकी वह सारा दारोमदार अपने कार्यकर्ताओं पर छोड़ते हैं। इस दौरान वे खुद राज्यभर में प्रचार को निकल जाते हैं और पार्टी के अन्य उम्मीदवारों की जीत के लिए रैलियां और प्रचार करते हैं। वहीं, उनकी सीट की जिम्मेदारी उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और पुत्र विक्रमादित्य सिंह संभालते रहे हैं। विक्रमादित्य सिंह जब छोटे थे, उसी समय से वे प्रचार करने जाते थे और रोहड़ू में उन्होंने खूब प्रचार किया था। अबकी बार वीरभद्र सिंह 9वीं बार अर्की सीट से विधानसभा पहुंचे हैं और अर्की उनका चौथा विधानसभा क्षेत्र है।

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