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हिमाचल में बागियों ने इन 12 सीटों पर कांग्रेस-बीजेपी दोनों का ही खेल बिगाड़ा

हिमाचल में भाजपा के तीन बागी चुनाव जीत गए और पांच सीटों पर उनके चलते पार्टी को कांग्रेस ने हरा दिया। जबकि, 4 सीटों पर कांग्रेस के बागियों की वजह से बीजेपी को जीत मिली। बागियों ने कुल 12 सीटों पर चुनावी गणित बिगाड़ दिया।

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हिमाचल प्रदेश में इस बार बागी उम्मीदवारों ने खेल नहीं बिगाड़ा होता तो अंतिम नतीजों की तस्वीर कुछ अलग होती। यह बात अब चुनाव आयोग से जारी आंकड़े बता रहे हैं। हिमाचल की 68 सीटों में से कम से कम 12 सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस या बीजेपी के बागी उम्मीदवारों को मिले वोट, दोनों दलों में से किसी भी पार्टी की जीत या हार के अंतर से ज्यादा है। इस बार राज्य में कम से कम 28 बागी नेताओं ने टिकट कटने के बाद अपने-अपने दलों को ठेंगा दिखाकर खुद ही चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया। हालांकि, कामयाबी सिर्फ 3 को मिली। बाकी ने बस यही किया- हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे!

हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे!

हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे!

हिमाचल प्रदेश की 68 सीटों में से 12 पर बागी उम्मीदवारों ने भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस का भी खेल बिगाड़ने का काम किया है। हालांकि, इस मामले में निर्दलीय लड़ने वाले बागियों ने बीजेपी को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है, जो 8 सीटों पर ऐसे ही बागी प्रत्याशियों की वजह से चुनाव हारी है। जबकि, कांग्रेस के साथ यह नौबत 4 सीटों पर आई है। हिमाचल विधानसभा चुनाव में इस बार कुल 99 निर्दलीय उम्मीदवार लड़े, जिनमें से 28 बागी हैं या जिन्होंने टिकट कटने की वजह से पार्टियों के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़ा है।

चुनाव जीतने वाले तीनों निर्दलीय बीजेपी के बागी

चुनाव जीतने वाले तीनों निर्दलीय बीजेपी के बागी

हिमाचल चुनाव में भाग्य आजमाने वाले 28 में से सिर्फ 3 को ही जीत मिली है और ये तीनों ही भारतीय जनता पार्टी से बगावत करके चुनाव मैदान में उतरे थे। बीजेपी से टिकट ना मिलने पर निर्दलीय लड़कर चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार हैं- नालागढ़ से केएल ठाकुर, देहरा से होशियार सिंह और हमीरपुर से आशीष शर्मा। केएल ठाकुर 2012 में चुनाव जीते थे, लेकिन 2017 में वह नहीं जीत सके थे। इस बार उनकी जगह भाजपा ने कांग्रेस के दो बार के विधायक रहे दलबदल कर आए लखविंदर सिंह राणा को टिकट दिया था। वहीं होशियार सिंह देहरा से ही निर्दलीय विधायक थे और चुनावों से पहले ही बीजेपी में शामिल हुए थे। लेकिन, पार्टी ने रमेश धावाला को टिकट दे दिया।

बागियों को जीत की मार्जिन से ज्यादा वोट मिले

बागियों को जीत की मार्जिन से ज्यादा वोट मिले

इसी तरह भाजपा के बागी उम्मीदवारों की वजह से किन्नौर, कुल्लू, बंजार, इंदौरा और धर्मशाला में भी पार्टी की उम्मीदें कुंद हुई हैं। जबकि, बागियों की वजह से पच्छाद, चौपाल, आनी और सुलह में चुनाव जीतने का कांग्रेस का सपना टूटा है। राज्य में निर्दलीयों और अन्य छोटे दलों का वोट शेयर 10.39% रहा है। किन्नौर में पूर्व बीजेपी एमएलए तेजवंत नेगी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे थे। उन्हें यहां 8,574 वोट मिले और भाजपा के आधिकारिक प्रत्याशी सूरत नेगी कांग्रेस उम्मीदवार जगत सिंह नेगी से सिर्फ 6,964 वोटों से जीत गए। इसी तरह कुल्लू में भाजपा के बागी राम सिंह को 11,937 वोट मिले, जबकि पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी नरोत्तम सिंह को कांग्रेस के सुरेंद्र ठाकुर ने 4,103 वोटों के अंतर से हरा दिया।

भाजपा को बागियों ने यहां भी दिया झटका

भाजपा को बागियों ने यहां भी दिया झटका

बंजार विधानसभा सीट की कहानी भी उसी तरह की है। भाजपा नेता महेश्वर सिंह के बेटे हितेश्वर सिंह ने निर्दलीय लड़कर 14,568 वोट काट लिए और पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी खिमी राम महज 4,334 वोट से पिछड़ गए। इसी तरह धर्मशाला में बीजेपी के बागी को 7,416 वोट मिले, जो कि कांग्रेस उम्मीदवार सुधीर शर्मा की जीत के मार्जिन 3,285 से अधिक है।

कांग्रेस को बागियों ने यहां लगाई चपत

कांग्रेस को बागियों ने यहां लगाई चपत

भाजपा उम्मीदवारों के साथ जो ऊपर की सीटों पर हुआ, वही स्थिति कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवारों के साथ सुलह और आनी में भी पैदा हुई। जहां लड़ाई कांग्रेस के बागी और बीजेपी के बीच हुई और कांग्रेस का प्रत्याशी तीसरे नंबर पर खिसक गया। जैसे पच्चाद और चौपाल में कांग्रेस के बागियों गंगू राम मुसाफिर और सुभाष मांगलेट को क्रमश: 21.46% और 22.03% वोट मिले, जो कि बीजेपी के विजेता उम्मीदवारों की जीत के अंतर से दो से तीन गुना अधिक है।

कांग्रेस को पूर्ण बहुमत

कांग्रेस को पूर्ण बहुमत

वैसे 68 सीटों वाली हिमाचल विधानसभा में कांग्रेस को 40 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत मिला है और निर्दलीय जीतने वाले भाजपा के 3 बागियों के लिए कोई चांस बचा नहीं है। क्योंकि, एग्जिट पोल के नतीजों के बाद कुछ बागी उम्मीदवारों ने ही दावा किया था कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही नेताओं की ओर से उनसे संपर्क शुरू कर दिया गया है और वे 8 दिसंबर का इंतजार करना चाहते थे। लेकिन, अब कांग्रेस को उन निर्दलीय विधायकों की सरकार बनाने के लिए कोई जरूरत नहीं रह गई है। वैसे, प्रदेश के इतिहास में कई बार त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में निर्दलीय विधायकों की चांदी हो भी चुकी है। (इनपुट-पीटीआई)

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