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2018: पहाड़ की राजनीति में धूमल-वीरभद्र युग का अंत, युवाओं के हाथों में कमान

शिमला। 2018 की शुरुआत हिमाचल प्रदेश की राजनीति में नए युग की शुरुआत कही जा सकती है। पहाड़ की राजनीति में यह पहला मौका है,जब एक मुख्यमंत्री युवा है। एक तरफ भाजपा ने पार्टी के अंदर गुटबाजी को थामते हुए धूमल युग की समाप्ति के संकेत दिए तो दूसरी तरफ कांग्रेस में भी वीरभद्र राज से छुटकारा पाने की कोशिश चल रही है और इसके लिए पार्टी विधायक दल की कमान युवा हर्षवर्द्धन चौहान को सौंपने जा रही है। 2018 में पहाड़ की राजनीति में बहुत बदलाव होने के आसार हैं क्योंकि अब प्रदेश की कमान युवा के हाथों में है।

भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार हारे

भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार हारे

चुनाव नतीजे घोषित होते ही जब भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ सामने आई तो पार्टी के लिये एक असुखद खबर साथ यह भी थी,कि पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद के दावेदार प्रेम कुमार धूमल चुनाव हार चुके थे। राजनिति ने करवट ली व पार्टी ने भी गुपचुप तरीके से जयराम ठाकुर को दिल्ली बुला लिया। यह गुप्त बात लीक हो गई कि 52 साल के जयराम ठाकुर को पार्टी नेतृत्व ने दिल्ली बुलाया है। किसी को भी यह नहीं पता था कि ठाकुर को दिल्ली क्यों बुलाया गया है। धूमल और कई अन्य नामीचन नेताओं के चुनाव हारने के बाद बनी परिस्थितियों में इस फैसले को देखा जा रहा था। भाजपा का एक बड़ा वर्ग भी यह मानकर ही चल रहा था कि भले ही धूमल चुनाव हार गये हों,लेकिन प्रदेश की कमान उन्हें ही सौंपी जायेगी। धूमल भी इसमें पीछे नहीं रहे। उन्होंने भी अपने समर्थकों के जरिये गुपचुप दबाव बनाना शुरू कर दिया जो बाद में बेअसर साबित हुआ।

जयराम की किस्मत पलटी

जयराम की किस्मत पलटी

मंडी क्षेत्र की सिराज सीट से पांचवीं बार विधायक बने जयराम के लिये यह बदलता राजनैतिक घटनाक्रम किस्मत पलटने जैसा था। हिमाचल प्रदेश को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। यहां लोगों को नियति और भाग्य में पूरा भरोसा है। इससे पहले योगी आदित्यनाथ, मनोहर लाल खट्टर और देवेंद्र फड़णवीस को मुख्यमंत्री बनाने के चौंकाने वाले फैसलों ने लोगों को इस निष्कर्ष पर पहुंचा दिया कि जयराम ठाकुर को सत्ता मिलने वाली है। हुआ भी यही। भले धूमल खेमे की ओर से चले गये दांव पेंचों के चलते पार्टी नेतृत्व को शीर्ष पद के लिए नाम की घोषणा करने में कुछ वक्त लगा। पार्टी ने तय प्रक्रियाओं का पालन किया और मुख्यमंत्री के चुनाव में छूटे हुए नेताओं को गुस्सा निकालने का समय दिया। इस दौरान यह आकलन किया जा सकता था कि गुस्से पर काबू पाने के लिए क्या दूसरे उपाय करने की जरूरत है। आखिर में पार्टी ने सबको यह जता दिया कि पहले दिन उसने जो फैसला किया था। वो ही अंतिम था।

चरण स्पर्ष परिपाटी का अंत होता दिखा

चरण स्पर्ष परिपाटी का अंत होता दिखा

शिमला के एतिहासिक रिज मैदान में शानदार शपथ ग्रहण समारोह हुआ। सभी भाजपा शासित राज्यों में अब इसी तरह के समारोह का नियम बन चुका है। यानि पार्टी का शक्ति परीक्षण। जयराम ठाकुर मौका या किस्मत के कारण मुख्यमंत्री का पद ग्रहण कर चुके हैं। अब यह उन पर है कि वो अपने और पार्टी के लिए चुनौतियों को अवसरों में बदलें। शपथ समारोह में मौजूद हिमाचल सरकार का एक रिटायर्ड आला अफसर ठाकुर के नेतृत्व को लेकर आशावादी दिखे। यह पहले भी ऐसे मौकों पर मौजूद रह चुके हैं। उन्होंने जो सबसे पहला बदलाव देखा, वह भारी तादाद में लोगों की मौजूदगी नहीं थी। बल्कि पहला मौका था जब शपथ लेने के बाद मंत्रियों ने (बीजेपी सरकार में) मुख्यमंत्री या पार्टी के दूसरे नेताओं के पैर नहीं छुए। उन्होंने कहा, ‘ऐसा लगता है कि चरण स्पर्श की परिपाटी खत्म होना शुभ संकेत है' इसकी एक वजह जयराम ठाकुर का युवा होना हो सकता है। 52 साल के ठाकुर अपने कुछ मंत्रियों से उम्र में छोटे हैं, कुछ की उम्र उनके बराबर है और बाकियों से वो कुछ ही बड़े हैं। लेकिन नए मंत्रियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के चरण स्पर्श भी नहीं किए। जो कि प्रदेश के लोगों के लिये नया अनुभव रहा है। बदलती राजनिति की ताजा तस्वीर।

धूमल की हार पार्टी के लिए शुभ संकेत

धूमल की हार पार्टी के लिए शुभ संकेत

इस चुनाव में धूमल की हार पार्टी के लिए एक शुभ संकेत की तरह रही। धूमल फिलहाल 73 साल के हैं और अगले दो साल में वो 75 साल के हो जाएंगे। अगर वो जीतते और मुख्यमंत्री बनते तो अगले दो साल में वो सेवानिवृत्ति की आयु पर पहुंच जाते। पार्टी ने अलिखित रूप से रिटायरमेंट के लिए 75 साल की आयु तय की है। इसके बाद मुख्यंत्री बनने के इच्छुक नेताओं में सत्ता-संघर्ष शुरू हो जाता। ठाकुर के कुर्सी पर रहने से पार्टी लंबे वक्त के लिए योजनाएं बना सकती है। अब तक हिमाचल प्रदेश बीजेपी में शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल गुट का वर्चस्व था। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा तीसरे गुट की अगुवाई करते थे। शांता कुमार 83 साल के हैं। हलांकि कुछ क्षेत्रों में अब भी उनका प्रभाव है। वो सक्रिय राजनीति से लगभग रिटायर हो चुके हैं। परिस्थितियों ने धूमल को भी सेवानिवृत्ति के कगार पर ला खड़ा किया है। इन स्थितियों ने जेपी नड्डा और अनुराग ठाकुर को मजबूत कर दिया है लेकिन फिलहाल दोनों को राष्ट्रीय राजनीति पर फोकस करना होगा। पौराणिक जय श्री राम जयघोष हमेशा भाजपा-आरएसएस के हृदय के करीब रहा है। अब वास्तविक जयराम ने इस क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है।

भाजपा ने उठाया कदम तो कांग्रेस भी उसी राह पर चली

भाजपा ने उठाया कदम तो कांग्रेस भी उसी राह पर चली

भाजपा की तरह हिमाचल कांग्रेस भी बड़े बदलाव के साथ नये कलेवर में नये साल में सामने आने की तैयारी में है। कांग्रेस विधायक दल के नेता के लिये भाजपा की तरह कांग्रेस भी नये युवा चेहरे को जिम्मेवारी देने जा रही है। इसके लिये शिलाई के विधायक हर्षवर्धन चौहान का नाम लगभग तय हो गया है। इसी शीतकालीन सत्र में कांग्रेस विधायक दल के नेता के तौर सदन के अंदर चौहान ही नये जोश के साथ सत्तारूढ़ दल को घेरने का प्रयास करते दिखेंगे।

भाजपा ने जब शांता कुमार व प्रेम कुमार धूमल की छाया से निकल कर ताजगी भरे चेहरों को सरकार सौंप कर प्रदेश में नई शुरुआत कर दी व 52 वर्षीय जय राम ठाकुर को सीएम पद सौंपा तो कांग्रेस भी इस दवाब में आई कि पार्टी को भी अब बदलाव लाना होगा अगर वीरभद्र सिंह के प्रभाव से आगे निकलना चाह रही है। यह संकेत खुद राहुल गांधी ने दो दिन पहले अपने शिमला दौरे के दौरान दे दिये थे। उम्र के लिहाज से देखा जाये तो वीरभद्र सिंह जय राम ठाकुर से करीब 31 साल बड़े हैं। इस लिहाज से उन्हें सीएलपी लीडर बनाना पार्टी के लिये अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने जैसा हो सकता था। इसके चलते पार्टी में नये चेहरे की तालाश राहुल गांधी की ओर से शुरू कराई गई तो हर्षवर्धन चौहान जैसे बेदाग छवि के नेता का नाम ही उभर कर सामने आया।

वीरभद्र युग से निकलने की कोशिश

वीरभद्र युग से निकलने की कोशिश

राहुल गांधी इससे पहले भी कई बार युवा चेहरों को सामने लाने के लिए पार्टी के भीतर जोरदार पैरवी करते आए हैं। वहीं, हिमाचल कांग्रेस पांच दशक से वीरभद्र सिंह के आभामंडल के भीतर ही विचरण करती रही है। वीरभद्र सिंह को विद्या स्टोक्स व कौल सिंह ठाकुर से चुनौती तो मिलती रही, लेकिन वे भी वीरभद्र सिंह के कद के सामने घुटने टेकते रहे। मौजूदा चुनाव ने हिमाचल कांग्रेस को ये मौका दिया है कि वो बदलाव के साथ चले। लिहाजा अब कांग्रेस पार्टी ने वीरभद्र सिंह जैसे बुजुर्ग नेता के आभा मंडल से पार्टी को बाहर लाने की कसरत शुरू कर दी है।

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