हिमाचल प्रदेश चुनाव से क्यों गायब हो गए असली मुद्दे, जानिए वजह?
कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां अपना मेनिफेस्टो यानी चुनावी घोषणा पत्र को अब तक जारी करने में नाकाम साबित हुई हैं। अब तक दोनों पार्टियां सिर्फ एक-दूसरे के खिलाफ बयान देने में ही व्यस्त रही हैं।
शिमला। हिमाचल प्रदेश में चुनाव आयोग ने बिगुल भले ही बजा दिया हो लेकिन चुनाव से असली मुद्दे गायब हैं। ना तो भाजपा इस मामले में आगे आई और ना ही कांग्रेस ने कोई पहल की। ना तो चुनावी मैदान में बेरोजगारी की बात हो रही है और ना ही पर्यटन की। बस दोनों ही दल एक दूसरे पर कीचड़ उछालने में लगे हैं। कल तक भाजपा जहां कांग्रेस और वीरभद्र सिंह को भ्रष्ट्राचार के मामले में घेरती नजर आ रही थी, आज सुखराम के परिवार के भाजपा में आने के बाद खुद ही बैकफुट पर आती दिख रही है। हालांकि भाजपा के लिए अभी वीरभद्र सिंह और उनके परिवार की आमदनी ही एकमात्र मुद्दा है। यही हाल कांग्रेस का है जो विकास की बात बड़े जोर-शोर से तो करती रही है लेकिन चुनावी बेला में लोगों के सामने इसका कोई खाका पेश करने में नाकाम रही है। कांग्रेस जीएसटी के विरोध को धारदार नहीं बना पा रही है। चूंकि जीएसटी को पास कराने में वीरभद्र सिंह सरकार भी आगे रही है।

क्यों गायब हो गए स्थानीय मुद्दे?
प्रदेश में कंपोजीशन स्लैब की सीमा बढ़ाई है। जिससे प्रदेश में बीस लाख तक का कारोबार करने वाले कारोबारियों को छूट नहीं है। मतदान में अब कुछ ही दिन बाकी हैं लेकिन ना कांग्रेस और ना ही भाजपा, दोनों लोगों को आने वाले 5 साल का विजन दिखा रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां अपना मेनिफेस्टो यानी चुनावी घोषणा पत्र को अब तक जारी करने में नाकाम साबित हुई हैं। अब तक दोनों पार्टियां सिर्फ एक-दूसरे के खिलाफ बयान देने में ही व्यस्त रही हैं।
कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता नरेश चौहान से बात की गई तो उन्होंने कहा कि मेनिफेस्टो बनकर करीब-करीब तैयार है। 27 या 28 अक्टूबर तक घोषणा पत्र जारी कर दिया जाएगा। बीजेपी भी इसी हफ्ते घोषणा पत्र जारी करने की तैयारी कर रही है। उधर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतपाल सत्ती ने बताया कि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को घोषणा पत्र जारी करने के लिए बुलाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी अपने मेनिफेस्टो में हर तबके का ध्यान रखेगी।

क्यों जरूरी होता है मेनिफेस्टो?
मेनिफेस्टो किसी भी पार्टी का औपचारिक दस्तावेज होता है, जिसमें वो अपने अगले 5 साल के कामों को वादों के माध्यम से अपनी योजनाएं, कार्यक्रम और परिणामों के बारे में जनता को बताती है। पार्टी इस दस्तावेज के जरिए सरकार बनने पर अपने 5 साल के कार्यकाल में इन वादों को पूरा करने का भरोसा दिलाती है। ऐसे में चुनावी घोषणा पत्र एक अहम दस्तावेज के रूप में देखा जाता है। पहले बकायदा चुनावी सभाओं और कार्यक्रमों में इन पर बहस भी होती थी। पिछले चुनाव में भी प्रदेश के विकास की बात पीछे ही रही थी। 2012 में वीरभद्र सिंह मुद्दा हो गए थे, पार्टी में भी और भाजपा के लिए भी।

आपसी निशाने का चुनाव!
वीरभद्र सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते जिस तरह का चुनावी प्रचार और जुबानी जंग हुई, वैसी कभी नहीं देखी। इस बार भी सरकार के पांच साल वीरभद्र सिंह और उनके परिवार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर ज्यादा चर्चा में रहे। तो वीरभद्र सरकार भी धूमल और उनके सांसद पुत्र अनुराग ठाकुर के खिलाफ डटी रही। सो इस बार भी भाजपा का मुद्दा मुख्य रूप से भ्रष्टाचार ही है और निशाने पर वीरभद्र सिंह।












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