हिमाचल उपचुनावों में कांग्रेस को मिली करारी हार, सुक्खू को किनारे करना पड़ा महंगा
शिमला। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को मिल रही लगातार शिकस्त के बीच एक बार फिर पार्टी को दो विधानसभा उपचुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा है। इससे एक बार फिर मौजूदा नेतृत्व की क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं कि आखिर पार्टी में बदलाव लाने के बावजूद कोई परिणाम सामने क्यों नहीं आ रहा? धर्मशाला में विशाल नैहरिया जीत दर्ज करने में कामयाब हुए और यहां कांग्रेस उम्मीदवार विजय इंद्र कर्ण की जमानत जब्त हो गई। वहीं, पच्छाद में भाजपा प्रत्याशी रीना कश्यप ने कांग्रेस के गंगू राम मुसाफिर को हराया।

कांग्रेस में गुटबाजी से हुआ नुकसान
लोकसभा चुनावों और विधानसभा चुनावों में हिमाचल कांग्रेस को लगातार हार का सामना करना पड़ा है। अब रही-सही कसर विधानसभा उपचुनावों ने पूरी कर दी। जहां धर्मशाला और पच्छाद में पार्टी को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा है। धर्मशाला में कांग्रेस प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे तो पच्छाद में दूसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। धर्मशाला से कांग्रेस प्रत्याशी विजय इन्द्र कर्ण ने तो नतीजे सामने आने से पहले ही अपनी हार के लिये कांग्रेस के ही दूसरे नेता पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा को जिम्मेवार ठहराया था। उनका आरोप था कि सुधीर शर्मा ने यहां कांग्रेस नहीं बल्कि भाजपा की मदद की। कांग्रेस पार्टी में हमेशा ही गुटबाजी ने अपना रंग दिखाया है।

सुक्खू को हटाने का आत्मघाती फैसला!
विधानसभा चुनावों में हार की वजह भी गुटबाजी ही रही है। उस समय कांग्रेस पार्टी ने चुनाव के एन वक्त पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से सुखविन्दर सिंह सुक्खू को हटाकर पार्टी की कमान कुलदीप सिंह राठौर को सौंप दी। पार्टी का यह फैसला संगठन के लिये आत्मघाती साबित हुआ। चुनावों में सुक्खू समर्थक कांग्रेसी साइलेंट मोड में चले गये। उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिये राठौर ने कोशिश भी नहीं की। उल्टे राठौर वीरभद्र सिंह के सामने नतमस्तक हो गये। राठौर का प्रदेश में कोई ठोस जनाधार नहीं है। यही वजह है कि चुनावों में उनका आजमाया कोई भी हथियार नकारा साबित हुआ।

पार्टी का फैसला गलत हुआ साबित
यही नहीं, कांग्रेस का वाररूम क्या कर रहा था, इसका पता ही नहीं चला। कागजों में सब घोड़े दौड़ते रहे। कुलदीप राठौर ने प्रचार के लिये पूर्व अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह सुक्खू की मदद ही नहीं ली। यही नहीं पार्टी के स्टार प्रचारक ऐसे लोग थे,जिनमें से अधिकतर के जनाधार को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं। मौजूदा उपचुनावों में भी ऐसा ही हुआ। पार्टी ने पहले प्रत्याशी चयन को लेकर मनमानी की तो बाद में प्रचार के दौरान गुटबाजी को हवा दी। धर्मशाला में जब भाजपा ने गद्दी समुदाय से अपना उम्मीदवार घोषित किया तो कांग्रेस ने भी उसी बिरादरी को मैदान में उतार दिया जो कि गलत निर्णय साबित हुआ। कांग्रेस पार्टी के वोट बैंक में विभाजन हुआ और पार्टी का मतदाता आजाद प्रत्याशी की ओर चला गया। इसी तरह पच्छाद में भी कांग्रेस नया चेहरा सामने लाने में नाकाम रही। भाजपा ने युवा चेहरा दिया। यही नहीं पूरे चुनावी अभियान में पार्टी में एकजुटता का अभाव रहा।












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