himachal pradesh सेब किसानों का आंदोलन हिमाचल चुनावों में बना बड़ा मुद्दा, क्या फिर पलट देगा BJP सरकार?
himachal pradesh, देश में सेब के सबसे बड़े उत्पादक राज्य में हिमाचल प्रदेश भी शामिल है। हिमाचल में किसानों की प्रमुख फसल के तौर पर सेब अहम स्थान रखता है। सेबों के चलते राज्य एक बड़ा आंदोलन भी देख चुका है। 1990 में हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादकों ने तत्कालीन भाजपा सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया था। किसानों ने शांता कुमार के नेतृत्व वाली तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी सरकार से मांग की थी कि सेब की फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाए।

22 जुलाई 1990 को कोटगढ़ में किसानों ने एक बड़ी सभा का आयोजन किया था। इस आयोजन के दौरान पुलिस ने गोलियां चलाईं थी। जिसमें तीन किसान गोविंद सिंह,तारा चंद और हीरा सिंह की मौत हो गई। कई और किसान घायल हुए थे। इस सेब आंदोलन ने राज्य का पूरा राजनीतिक माहौल बदकर रख दिया था। विधानसबा चुनावों में वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने राज्य की 68 सीटों में से 60 पर जीत हासिल की थी।
वहीं शांता कुमार ने जिन दो सीटों पर चुनाव लड़ा था, उन्हें वहां हार का सामना करना पड़ा था। सरकार में आने के बाद वीरभद्र सिंह ने फसल के लिए न्यूनतम मूल्य तय करने के लिए मंडी हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) की शुरुआत की थी। 30 साल पहले हुए सेब आंदोलन के बाद से सेब उत्पादक शायद ही सड़कों पर उतरे हों। लेकिन अब एक बार फिर सेब उत्पादक सड़कों पर आते दिख रहे हैं।
जब राज्य में सेब उत्पादक बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के चलते अपनी कई मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। इन मांगों में सबसे प्रमुख मांग यह है कि, सेब के बक्सों पर लगने वाली जीएसटी बढ़ोत्तरी को सरकार वापस ले। हाल ही में सेब के बॉक्स पर लगने वाली जीएसटी को 12 प्रतिशत से बढ़कर 18 प्रतिशत कर दिया गया था।
सेब उत्पादक एमआईएस योजना के तहत लंबित खरीद भुगतानों से भी नाराज़ हैं।
वे इस बात से भी नाराज़ हैं कि सरकार ने एक अन्य योजना को भी वापस ले लिया है। जिसके तहत उत्पादकों को रियायती दरों पर स्प्रे, कीटनाशक और कवकनाशी वितरित किए जाते थे। उत्पादकों की एक और शिकायत अडानी एग्री फ्रेश द्वारा तय की गई शर्तों और खरीद मूल्य को लेकर भी है। किसानों का कहना है कि ये कीमतें बहुत कम हैं। जो खुला बाजार को भी प्रभावित कर रही हैं।
सेब बेल्ट हमेशा हिमाचल के चुनावी में महत्वपूर्ण रही है। सेब की फसल 5000 करोड़ रुपये या राज्य की अर्थव्यवस्था का 13.5 प्रतिशत से अधिक है। जो 20-25 सीटों पर प्रभाव डालती है। इसमें इसमें शिमला जिले की आठ विधानसभा सीटें, मंडी, कुल्लू और चंबा जिलों की 4-4 सीटें, किन्नौर, लाहौल और स्पीति जिलों की एक-एक विधानसभा सीटें शामिल हैं।
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने बताया कि, विपक्षी दलों के निवेश के कारण यह मुद्दा राजनीतिक हो गया है। ठाकुर ने कहा, उत्पादकों की परेशानी को कम करने के लिए हमने कहा है कि पैकेजिंग सामग्री पर जीएसटी परिषद द्वारा की गई बढ़ोतरी के खर्च को राज्य वहन करेगा। कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी) के अध्यक्ष नरेश चौहान ने कहा कि इसके अलावा सरकार ने कई कदम उठाए हैं।












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