हाथरस में जेट्रोफा के बीज खाने से 7 बच्चों की हालत बिगड़ी, बायोडीजल के रूप में इस्तेमाल होता है यह पौधा
उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक जंगली पौधे के बीज खाने से सात बच्चों की तबीयत बिगड़ गई। बच्चों बिगड़ने की जानकारी परिजनों को हुई तो आनन-फानन में बच्चों को अस्पताल में भर्ती करवाया गया। जिस पौधे के बीज को खाने से तबियत बिगड़ी है, उसे जेट्रोफा के नाम से जाना जाता है। देश में पहले जेट्रोफा को जंगली अरण्डी के नाम से जाना जाता था। इसकी उपयोगिता एवं महत्व की जानकारी के अभाव में इसकी व्यापारिक तौर पर खेती नहीं की जा रही थी | परन्तु विगत वर्षो से इसका उपयोग बायोडीजल के रूप में होने के कारण यह केरोसिन तेल, डीजल, कोयला, जलौनी लकड़ी के विकल्प के रूप में उभरा है |

खेल-खेल में खा गए जेह्रीला पौधा
दरअसल, पूरा मामला हाथरस जिले के थाना कोतवाली मुरसान क्षेत्र के गांव टिमर्ली का है। यहाँ सोनू, नीरज, योगेश, राजेश आदि के परिवार मेहनत-मजदूरी करते हैं। शाम को उनके बच्चे खेतों के पास खेलने गए थे। गांव में जेट्रोफा के पौधे लगे हुए हैं। जेट्रोफा से बायोडीजल बनाया जाता है। खेल-खेल में साेनू की बेटियां छह वर्षीय अनु, सात वर्षीय तनवी, कालीचरण का छह वर्षीय बेटा महावीर, राजेश का सात वर्षीय पुत्र वंशु, नीरज का बेटा मन्नू,योगेश की डेढ़ वर्षीय बेटी कनिष्का और सात वर्षीय हिमांशु ने शाम को साढ़े पांच बजे करीब जेट्रोफा बीज खा लिए। इसके बाद बच्चे घर पर आ गए।
सोनू ने बताया कि कुछ देर बाद उनकी बेटियां अनु और तनवी को उल्टियां होने लगीं। उन्हें लगा सर्दी का असर है। इसके बाद जानकारी हुई कि गांव के अन्य बच्चों को भी उल्टियां हो रही हैं। इससे सब घबरा गए। बच्चों से जानकारी की तो उन्होंने जेट्रोफा के पौधे से बीच खाने की बात बताई। इससे गांव में अफरा तफरी मच गई। मन्नू, तनवी, कनिष्का और हिमांशु का गांव में ही उपचार कराया गया। उनकी तबीयत अब ठीक है। वहीं महावीर, अनू और वंशु को परिजन जिला अस्पताल लेकर आए जिनका उपचार जिला अस्पताल में चल रहा है।

जेट्रोफा के बीज में जहरीला पदार्थ पाया जाता है
भारत में गांवों, खेतों, पगडंडियों और सड़कों के किनारे सहज रूप से जेट्रोफा के पौधे उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसे में इसके बीज से उत्पन्न गंभीर स्थिति से अंजान रहना काफी खतरनाक हो सकता है। जेट्रोफा के बीज में कुछ मात्रा में जहरीला पदार्थ पाया जाता है। इसे खाने से यह पदार्थ व्यक्ति में नशा पैदा करता है। ज्यादा सेवन करने से व्यक्ति बेहोशी की हालत में पहुंच जाता है। जेट्रोफा के बीज खाने की जानकारी होते ही पीड़ित व्यक्ति को शीघ्र अस्पताल ले जाना चाहिए, जिससे उसका समय से उपचार हो सके क्योंकि ज्यादा देर करना व्यक्ति के लिए घातक हो सकता है। तत्काल उपचार के उपाय के संबंध डॉक्टरों का कहना है कि पीड़ित व्यक्ति अगर बेहोश नहीं है तो उल्टी कराने के लिए नमक-पानी का घोल दिया जा सकता है। लेकिन यह ध्यान रहे कि यह घोल बेहोशी की हालत में कभी न दें। उन्होंने बताया कि उल्टी के जरिए जेट्रोफा के असर को कम कराया जाता है।

जेट्रोफा बायोडीजल से महिंद्रा एंड महिंद्रा कम्पनी ने चलाए ट्रेक्टर
किसी भी पुन: नवीनीकरण योग्य जैव पुंज (रिन्यूवेबिल बायोमास) से तैयार ऐसा वनस्पति तेल जो पेट्रोलियम ईधन का विकल्प हो सकें, जैव डीजल कहलाता है। वास्तव में वनस्पतिक तालों को ईंधन के रूप में प्रयोग करने की अवधारणा कोई नयी नहीं है। डीजल ईंजन के आविष्कारक रुडोल्फ डीजल ने सन 1895 में वानस्पतिक तेल से चलने वाला पहला इंजन बनाया था। आज जेट्रोफा के बीजों से तैयार बायो डीजल इंजनों की बनावट में बिना किसी परिवर्तन के प्रयोग किया जाने लगा है। अमरीका व यूरोपियन देशों में 10-20 प्रतिशत बायोडीजल, पेट्रोलियम डीजल के साथ मिलाकर प्रयोग किया जा रहा है। भारतीय रेल ने दिल्ली से अमृतसर के बीच में जेट्रोफा बायोडीजल (5 प्रतिशत मिश्रित) डीजल तेल से शताब्दी एक्सप्रेस चलाकर तथा महिंद्रा एंड महिंद्रा कम्पनी ने अपने ट्रेक्टरों में बायोडीजल का प्रयोग सफलता पूर्वक परिक्षण करके दिखलाया है। दसवी योजना के अंत तक पेट्रोडीजल की मांग 52.33 मिलियन टन तक हो सकती है। यदि इस अवधि तक 5 प्रतिशत पेट्रो डीजल को जैविक डीजल में बदलना है तो उसके लिए 2.29 मिलियन हैक्टेयर जमीन पर जेट्रोफा का बीज उगाकर तेल निकालने की आवश्यकता है।












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