72 साल के भूपिंदर हुड्डा ने कैसे हरियाणा में कांग्रेस को जिंदा कर दिया?
चंडीगढ़। 72 साल के भूपेन्द्र सिंह हुड्डा हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हीरो बन कर उभरे। 15 विधायकों वाली पार्टी को 31 पर पहुंचा कर उन्होंने शीर्ष नेतृत्व को अपनी अहमियत बता दी। उनके दबाव पर ही कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को हटाकर कुमारी शैलजा को नयी जिम्मवारी दी गयी थी। हुड्डा का दावा है कि अगर ये बदलाव पहले किया गया होता तो वे बहुमत का आंकड़ा पार कर लेते। भूपेन्द्र हुड्डा ने अपने प्रभाव वाले रोहतक और झझ्झर जिले में भाजपा का सफाया कर अपना सिक्का जमा दिया। पुराने रोहतक को 10 हलकों की 14 सीटों में से हुड्डा ने 11 पर कांग्रेस को जीत दिलायी। कांग्रेस ने देर से ही सही लेकिन हुड्डा को फ्री हैंड काम करने का मौका दिया। इसका नतीजा सबके सामने है। कांग्रेस के एक और दिग्गज नेता रणदीप सिंह सूरजेवाला उनके सामने टिक नहीं सके। जींद उपचुनाव में हार के बाद सुरजेवाला अपने गढ़ कैथल से भी विधानसभा चुनाव भी हार गये। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर भी हुड्डा को कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाये। दो टर्म सीएम रहने वाले हुड्डा ने कांग्रेस में एक नयी जान फूंकी है।

72 साल के हैं भूपेन्द्र सिंह हुड्डा
भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को राजनीति विरासत में मिली है। उनके पिता रणवीर सिंह हुड्डा भारत की संविधानसभा के सदस्य थे। पंजाब सरकार में मंत्री भी रहे। लेकिन राजनीति में मुकाम बनाने के लिए भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को संघर्ष करना पड़ा है। उन्होंने 1972 में प्रखंड कांग्रेस कमेटी से सदस्य के रूप में राजनीति की शुरुआत की। 1980 में हरियाणा युवा कांग्रेस का उपाध्यक्ष बने। 1991 में पहली बार सांसद बने। 1996 में हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर पहुंचे। 2002 से 2004 तक वे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे। 2005 में पहली बार मुखंयमंत्री बने। 2009 में वे एक बार फिर सीएम बने। उस समय कांग्रेस को भी 40 सीटें ही आयी थीं। हुड्डा ने गोपाल कांडा समेत छह निर्दलीय विधायकों के सहय़ोग से सरकार बनायी थी। यानी जोड़तोड़ की राजनीति में भी वे माहिर हैं। अगर इस बार कांग्रेस 35-36 पर भी रहती तो वे अपना हुनर दिखा सकते थे।

हुड्डा ने जीतने वाले उम्मीदवारों की पहचान की
रोहतक शहर सीट पर भाजपा के मनीष ग्रोवर का पिछले कुछ समय से दबदबा था। 2014 में ग्रोवर ही जीते थे। लेकिन इस बार हुड्डा ने इस सीट पर अपने करीबी भारत भूषण बत्रा को टिकट दिया था जिन्होंने ग्रोवर को हरा दिया। बादली और बहादुरगढ़ सीट भी भाजपा को गंवानी पड़ी। सोनीपत की सीट पर भाजपा की सविता जैन का कब्जा था। वे मंत्री भी थीं। लेकिन यहां हुड्डा ने सुरेन्द्र पंवार को मैदान में उतारा था। पंवार ने सविता जैन को तीसरी बार जीतने से रोक दिया और कांग्रेस का झंडा फहरा दिया। हुड्डा समर्थक बलबीर वाल्मीकि ने खट्टर सरकार के मंत्री कृष्णलाल पंवार को चित्त कर दिया। समलखा सीट पर भी कांग्रेस के धर्म सिंह छोक्कर को जीत मिली जिन्हें भूपेन्द्र हुड्डा ने टिकट दिया था। पुराना रोहतक, रोहतक, सोनीपत और झझ्झर जिले में हुड्डा ने जीतने वाले उम्मीदवारों की पहचान की और उन्हें टिकट दिलाया। इसका ही नतीजा है कि कांग्रेस इतनी सीटों पर जीत पाने में कामयाब हुई। टिकट वितरण में हुड्डा की ही चली थी।

अशोक तंवर फैक्टर फेल
अशोक तंवर जब हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे तब उन्हें राहुल गांधी की पसंद माना जाता था। 2014 में हार के बाद कांग्रेस में निराशा थी। अशोक पार्टी के लिए कुछ खास कर नहीं पा रहे थे। ऊपर से गुटबाजी भी तेज थी। 2019 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के बाद भी अशोक तंवर पद पर बने रहे। राहुल गांधी के वीटो के कारण उन्हें अध्यक्ष पद से नहीं हटाया जा सका था। लेकिन जब कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथ में वापस आयी तो भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने प्रदेश अध्यक्ष बदलने के लिए दबाव बनाया। अशोक तंवर को हटाया गया तो उन्होंने कांग्रेस को नतीजा भुगतने की चेतावनी दी। लेकिन हुड्डा ने अपना ऐसा प्रभाव दिखाया कि तंवर का विरोध किसी काम का न रहा। हुड्डा और नयी प्रदेश अध्यक्ष कुमारी शैलजा की टीम ने कांग्रेस को एक बार फिर सत्ता संघर्ष में आगे कर दिया।

हुड्डा ने भाजपा को भी दिखायी ताकत
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने हरियाणा में 75 पार का नारा दिया था। इसे सफल बनाने के लिए नरेन्द्र मोदी ने सात सभाएं की थीं। इसके अलावा अमित शाह, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ समेत 41 स्टार प्रचारकों ने भी खूब मेहनत की थी। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने खुद 77 के करीब सभाएं की थीं। इसे उलट कांग्रेस के राहुल गांधी ने हरियाणा में सिर्फ दो दिन दिये। भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ही मुख्य रूप से कांग्रेस के स्टार प्रचारक रहे। भाजपा ने कांग्रेस को हल्के में लिया। जब कि हुड्डा जमीनी स्तर पर अपने उम्मीदवारों की जीत के लिए काम करते रहे। हुड्डा ने मोदी-शाह की विजेता जोड़ी की राह रोक कर अपनी ताकत दिखा दी।
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