Haryana Chunav: महिला वोटरों को कम करके न आंकें! कैसे बदल सकती हैं चुनाव का रुख? इनसाइड स्टोरी
Haryana Chunav 2024: एक दशक पहले तक हरियाणा अपने खराब लिंगानुपात के लिए कुख्यात था। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। हरियाणा की बेटियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश और प्रदेश का नाम रोशन कर रही हैं, तो प्रदेश की राजनीति को लेकर भी यहां की महिलाओं की सोच बदल रही है। आज यह कह देना कि हरियाणा की महिला वोटर वहीं वोट डालेंगी, जहां पुरुषों की ओर से कहा जाएगा तो शायद हम भ्रम में हैं।
लिंगानुपात की भारी विषमता की वजह से ही हरियाणा से 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के महत्वाकांक्षी अभियान की शुरुआत की गई। हरियाणा इस अभियान से हुए बदलाव का प्रत्यक्ष गवाह बना है। 2011 में हरियाणा में अगर 1,000 लड़कों के मुकाबले 833 लड़कियां होती थीं तो 2023 में यह आंकड़ा सुधरकर 921 तक पहुंच चुका था। हरियाणा जैसे प्रदेश के लिए यह बहुत बड़ी सामाजिक क्रांति है।

हरियाणा में अब स्वतंत्र रूप से सोचने लगी हैं महिला वोटर
इंडियन एक्सप्रेस ने हरियाणा के बदलाव में भागीदार बनी कुछ महिलाओं से बात की है, जिनकी बातों से साफ होता है कि राज्य में कितना बड़ा सामाजिक परिवर्तन आ रहा है। इस बदलाव का एक बड़ा उदाहरण करनाल की कतलाहेरी गांव की मनसा देवी देती हैं। वो कहती हैं, 'घूंघट-वूंघट सब उड़ गया, ये खुला देश हुआ। अब तो सब मैडम बनी बैठी हैं....'
मनसा देवी ने जो कुछ कहा है, उसके पीछे ठोस वजहें भी हैं। उनके गांव की सरपंच भी महिला है और एक सीजन में लाखों कमाने वाली 'ड्रोन दीदी' भी है। अब यहां की महिलाएं पहले की तरह मर्दों के कहने पर वोट नहीं डालतीं, बल्कि अपनी पसंद खुद चुनती हैं।
महिला वोटर बदल सकती हैं हरियाणा चुनाव का रुख
इसका मतलब ये है कि 90 सीटों के हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने भले ही 12 महिलाओं को ही टिकट दिया हो और कांग्रेस ने 10 पर ही हाथ खड़े कर लिए हों, लेकिन महिला वोटरों की पसंद से चुनाव परिणाम में बड़ा उलटफेर देखने को भी मिल सकता है।
12वीं तक पढ़ीं कतलाहेरी की सरपंच डिंपल की अब इलाके में अपनी पहचान है। चुनावों के बारे में वो कहती हैं,'लोग बहुत ही चालाक हो गए हैं, वह अपनी पसंद नहीं बताते। हमें तभी पता चलेगा, जब वोट पड़ जाएंगे।'
डिंपल कहती हैं कि वह संयोग से सरपंच बनी हैं। क्योंकि, पहले लोगों ने उनके पति को उम्मीदवार बनाने का फैसला किया था। लेकिन, पंचायत निकायों में 50% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाने के बाद पति की जगह उन्हें मौका मिल गया।
लेकिन, सरपंच बनने के बाद डिंपल को काफी कुछ समझ में आ चुका है। उनकी सास भी कहती हैं, 'साइन तो इसी के होते हैं।' डिंपल को पता है कि वह अपने गांव में क्या काम करवा सकती हैं।
गांवों से जुड़े कार्यों में बढ़ गई है महिलाओं की भागीदारी
इसी तरह से पड़ोस के नौरता गांव की सरपंच नीलम देवी अब बीडीओ और कई बार डिप्टी कमिश्नर के साथ बैठकों में शामिल होती हैं। उनके लिविंग रूम में कुछ सरकारी फॉर्म भर रहे स्वास्थ विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, 'पहले अधिकारी किसी के बदले किसी की उपस्थिति को मंजूर कर लेते थे, लेकिन अब प्रशासन उम्मीद करता है कि महिला सरपंच ही खुद बैठकों में उपस्थित हों।'
'ड्रोन दीदी' बनने से चमक गई किस्मत
जहां कतलाहेरी गांव में डिंपल संयोग से सरपंच बन गई हैं, वहीं उन्हीं के गांव की सीता देवी ने 'ड्रोन दीदी' को अपना करियर बनाया है। इसकी वजह से आज उनके जीवन में बहुत ही बड़ा बदलाव आ चुका है। वो ग्रैजुएट हैं, इसलिए वो ड्रोन ऑपरेटर बनने के योग्य साबित हुईं।
'ड्रोन दीदी' केंद्र की मोदी सरकार की महिला केंद्रित बहुत ही महत्वाकांक्षी योजना है। सीता देवी ने अक्टूबर, 2023 में गुरुग्राम के पटौदी गांव में 15 दिनों की ड्रोन ऑपरेटर की ट्रेनिंग लेने के बाद केंद्र सरकार से मिले ड्रोन से खेतों में कीटनाशकों का छिड़काव शुरू किया था और उनकी किस्मत चमक गई।
'मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि मैं इतना कमा लूंगी'
सिर्फ खरीफ सीजन में ही उन्होंने 800 एकड़ में कीटनाशकों का छिड़काव किया है। प्रति एकड़ 350 रुपए की कमाई से उन्हें 2.90 लाख रुपए मिले हैं।
सीता देवी इसी साल दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक कार्यक्रम में भी आमंत्रित की जा चुकी हैं। अब वो और ड्रोन खरीदने की सोच रही हैं। वह कहती हैं, 'मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि मैं इतना कमा लूंगी।' सीता देवी को महिला स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़े होने का लाभ मिला है।
स्वयं सहायता समूह की वजह से भी महिलाओं की सोच में आ रहा है बदलाव
स्वयं सहायता समूह के सदस्यों के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही हैं। पहले हरियाणा में महिलाएं चुनावी चर्चाओं से दूर ही देखी जाती थीं। लेकिन, खासकर स्वयं सहायता समूहों की वजह से चुनावों की बातें अब इनके बीच भी आम हो चुकी है। इन समूहों की वजह से खासकर ग्रामीण हरियाणा में वंचित परिवारों की महिलाओं के जीवन में काफी बदलाव देखा जा रहा है। इसमें हर जाति और वर्ग की महिलाएं शामिल हैं।
'बेटी, बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान' ने भी किया बड़ा काम
स्वयं सहायता समूहों ने जहां हरियाणा की वंचित महिलाओं का जीवन बदलने का काम किया है, वहीं 'बेटी, बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान से लड़कियों की शिक्षा में भी आधारभूत तरक्की हुई है। मसलन, हरियाणा में साक्षरता दर जो 2011 में 71.42% था, वह 2023 में बढ़कर 75.5% पहुंच चुका था। हरियाणा के किसी गांव में आज जितने पढ़ने वाले लड़के नजर आते हैं, उतनी ही छात्राएं भी दिख जाती हैं।
2015 में हरियाणा सरकार ने निरक्षर महिलाओं को पंचायत चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। ऊपरी अदालतों ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। अंबाला जिले के बारा गांव की सरपंच अमरजीत कौर कहती हैं, इससे 'सकारात्मक विकास' हुआ है। वो कहती हैं, 'मेरे माता-पिता ने मुझे सिर्फ 10वीं तक पढ़ाया, लेकिन मैंने अपने दोनों बेटियों को ग्रैजुएशन और पोस्ट-ग्रैजुएशन करवाया।' सब अच्छे जॉब के लिए प्रयास कर रही हैं।
हरियाणा में समय की रफ्तार पकड़ चुकी महिलाओं के जीवन से जुड़ी ऐसी अनगिनत कहानियां है। सरोज बाला नाम की एक नर्स इस परिवर्तन के बारे में कहती हैं, 'लड़कियों को शिक्षा न देने से लेकर उन्हें न सिर्फ डिग्री, बल्कि डिप्लोमा देकर सशक्त बनाने तक, जिससे कि उन्हें नौकरी मिल सकती है, राज्य के ग्रामीण परिवेश में बहुत बड़ा बदलाव आया है।'
भले ही राजनीतिक दलों ने ज्यादा महिला उम्मीदवारों पर भरोसा नहीं किया है, लेकिन प्रदेश की महिला वोटर विधानसभा और संसद में ज्यादा प्रतिनिधित्व पर जोर दे रही हैं। सीता देवी कहती हैं, 'महिला विधायकों के लिए हमारी चुनौतियों के प्रति सहानुभूति रखना और हमें सशक्त बनाना ज्यादा आसान होगा।'
'हमें अब किसी की मदद की जरूरत नहीं है'
सीता और उनकी स्वयं सहायता समूह के अन्य सदस्य 5 अक्टूबर के मतदान को लेकर बहुत ज्यादा उत्साहित हैं। लेकिन, यह पूछने पर कि क्या उनके लिए पुरुषों की सलाह प्राथमिकता होगी? तो समूह की एक सदस्य सबकी ओर से कह देती हैं, 'ना जी, हमें अब किसी की मदद की जरूरत नहीं है।'
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