Gwalior News: 400 वर्ष पुराने भगवान कार्तिकेय मंदिर में सिर्फ एक दिन कार्तिक पूर्णिमा को ही होते है दर्शन
संवाद सूत्र- पकंज श्रीमाली
Gwalior News: ग्वालियर में एक ऐसा मंदिर है जिसके पट भक्तों के लिए वर्ष में सिर्फ एक दिन खोले जाते हैं यह मंदिर है भगवान शिव शंकर के पुत्र कार्तिकेय का जहां कार्तिक पूर्णिमा को हर वर्ष मंदिर के पट भक्तों के लिए खोले जाते हैं और भगवान कार्तिकेय के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
भगवान श्री गणेश के भाई और भगवान् शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय स्वामी का आज जन्मदिन है । आज उन्ही की पूजा की जाती है और मान्यता है कि कार्तिकेय के दर्शन से भक्त की सभी मनोकामनाएं पोइरी हो जातीं हैं। लेकिन मुश्किल ये है कि भक्तों को उनके दर्शन वर्ष में सिर्फ एक दिन यानी कार्तिक पूर्णिमा पर ही हो सकते है। फिर उनकी प्रतिमाएं और मंदिर भी नही है।

देश का सबसे प्राचीन और संभवतः इकलौता मंदिर ग्वालियर मे मौजूद है। इस मंदिर के पट यानी दरवाजे भी वर्ष मे सिर्फ एक बार ही वह भी मात्र चौबीस घंटे के लिए ही कार्तिक पूर्णिमा के दिन खुलते है। ऐसा देश के किसी भी मंदिर मे नहीं होता है, इसलिए इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आधी रात के बाद से ही भीड़ लगना शुरू हो जाती है।
चार सौ वर्ष प्राचीन है ग्वालियर का कार्तिकेय मंदिर
ग्वालियर के जीवाजी गंज क्षेत्र में मौजूद भगवान कार्तिकेव का यह मंदिर देश मे सबसे प्राचीन और इकलौता माना जाता है । इस मंदिर के लगभग अस्सी वर्षीय पुजारी का कहना है कि यह मंदिर लगभग चार सौ वर्ष से भी ज्यादा प्राचीन है । हालांकि स्थापना कब हुई इसका कोई लेख मौजूद नही है लेकिन पुजारी बताते है कि जब ग्वालियर में सिंधिया राजाओं का शासन हुआ और उन्होंने इसे अपनी राजधानी बनाया तो तत्कालीन सिंन्धिया शासकों ने ही इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। तब से लागातार यहां पूजा अर्चना चल रही है।

साल में केवल एक बार होते हैं दर्शन
भगवान कार्तिकेय मंदिर के पट हर साल सिर्फ एक बार कार्तिक पूर्णिमा को ही खुलते है । खास बात ये भी है कि सामान्यतया सभी मंदिरों के पट अलसुबह खुलते हैं और पूजा -अर्चना और दर्शन शुरू होती है लेकिन भगवान कार्तिकेय के ग्वालियर स्थित इस मंदिर के पट कार्तिक पूर्णिमा को मध्यरात्रि ठीक बारह बजे खुल जाते है और इसी के साथ दर्शन शुरू हो जाते हैं। इस बार रविवार को रात्रि बारह बजे से ही विशेष पूजा अर्चना के सात परंपरानुसार पट खोले गए और पहले से ही कतार में लगे श्रद्धालुओ ने भगवान के दर्शन करके अपनी मनोकामना उनके समक्ष रखी।
देश के कोने -कोने से पहुंचते हैं श्रद्धालु
इस मंदिर पर दर्शन करने के लिए मध्यप्रदेश, ,उत्तर प्रदेश और राजस्थान के अलावा महाराष्ट्र,गुजरात, दिल्ली के साथ देश के दूरस्थ राज्यों से भी श्रद्धालु ग्वालियर पहुंचते है और भगवान कार्तिकेय की पूजा अर्चना और दर्शन का सुख - सौभाग्य प्राप्त करते हैं। भक्तों की मान्यता है कि यहां दर्शन करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। इस मंदिर में प्रसाद बांटने वाले राजेन्द्र शिवहरे का कहना है कि वे बीस वर्षों से यहां प्रसाद का वितरण करते हैं । बीस साल पहले जब उनकी मनोकामना पूरी हुई तो उन्होंने पाँच किलो प्रसाद वितरित किया था लेकिन मेरे परिवार में खुशियां आती गईं और मात्रा बढ़ती गई । इस वर्ष वे एक कुंटल 11 किलो का प्रसाद वितरित कर रहे हैं।
साल में सिर्फ एक बार ही क्यो देते हैं कार्तिकेय अपने दर्शन
भगवान कार्तिकेय की पूजा और दर्शन वर्ष में सिर्फ एक दिन ही क्यों होते है? इनके दर्शन करना बाकी दिनों में क्यों निषिद्ध होते है ? यह सवाल सभी के मस्तिष्क में उठना अवश्यम्भावी है । इसकी कथा मंदिर के पुजारी जमुना प्रसाद शर्मा पौराणिक आख्यानों के उध्दरण के माध्यम से बताते हैं।
उनका कहना है कि महादेव शिव और माता पार्वती ने जब अपने पुत्र गणेश और कार्तिकेय के विवाह करने को लेकर विचार किया तो दोनो के सामने यह शर्त रखी कि जो ब्रह्मांड की परिक्रमा करके सबसे पहले उनके पास लौटेगा उसका विवाह वे सबसे पहले करेंगी। इसके बाद कार्तिकेय अपने वाहन गरुण पर सवार होकर ब्रह्मांड परिक्रमा करने के लिए निकल गए । गणेश जी ने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करते हुए अपने माता - पिता की परिक्रमा की और थोड़ी ही देर में माता के सामने आकर बैठ गए । उनका विवाह भी सम्पन्न करा दिया गया।
यह बात नारदमुनि के माध्यम से ब्रह्मण्ड परिक्रमा में जुटे भगवान कार्तिकेय को पता चली तो वे क्रोधित हो गए। जब उनके गुस्से का पता चला तो शिव पार्वती उन्हें मनाने पहुंचे लेकिन कार्तिकेय गुस्से के इतने वशीभूत थे कि उन्होंने शाप दे दिया कि - जो भी उनके दर्शन करेगा वह सात जन्मों तक नरक भोगेगा। माता -पिता के बहुत मनाने पर वे अपने शाप को थोड़ा परिवर्तन करने को राजी हुए । उन्होंने वरदान दिया कि उनके जन्मदिन कार्तिक पूर्णिमा पर जो भी भक्त उनके दर्शन देगा उसकी हर मनोकामना पूर्ण होगी। तभी से उनके वर्ष में एके बार दर्शन की प्रथा शुरू हुई।
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