अकाउंट खुलवाने के लिए ब्रांच में खूब पचे थे, काम नहीं हुआ, तो खुद का बैंक खोल लिया
सूरत। यहां के एक शख्स ने अपनी एक समस्या खत्म न होने पर ऐसा काम कर दिखाया कि अब हजारों लोग उसके भरोसे रह रहे हैं। हम बात कर रहे हैं कांजीभाई भालड़ा की, जिन्होंने खुद ही अपना बैंक शुरू किया था। कांजीभाई पेशे से एक व्यापारी थे। उनके द्वारा बैंक शुरू करने के पीछे की कहानी बरसों पुरानी है। नब्बे के दशक में, जब उन्हें अपनी कीमती वस्तुओं की सुरक्षा के लिए बैंक में लॉकर चाहिए था। लॉकर के लिए पहले बैंक में अकाउंट खुलवाना पड़ता है, इसलिए वह अपना अकाउंट खुलवाना चाहते थे।
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अकाउंट खुलवाने के लिए उन्होंने अपने निकट की एक बैंक ब्रांच में संपर्क किया था। हालांकि, किसी न किसी वजह से महीनों तक अकाउंट न खुला। एक दिन उन्होंने समाजसेवी मावजीभाई मवानी की मदद ली। तब मावजीभाई ने बैंक मैनेजर से अनुरोध किया। हालांकि, उस दिन भी शाम 4 बजे तक बैंक परिसर में ही बैठने पर भी कांजीभाई का अकाउंट नहीं खुल पाया। तब बैंक में बैठे-बैठे उन्हें ख्याल आया कि अकाउंट खुलवाने जैसी सामान्य प्रक्रिया में भी लोगों को इतने चक्कर काटने पड़ते हैं, वक्त भी बर्बाद होता है...तो क्यों न अपनी बैंक खोल ली जाए। इससे औरों को भी सहूलियत होगी।
कांजीभाई कहते हैं, ''उस दिन के बाद मैंने अपनी बैंक शुरू करने पर फोकस किया। बैंक खुल भी गई..जिसका 'दि वराछा को-ऑपरेटिव बैंक' नाम रखा। 1995 में उसमें काम-काज भी शुरू कर दिया। अब ढाई दशक हो गया है..आज अपने इसी बैंक में लोगों के हजारों अकाउंट चल रहे हैं। और, यह गुजरात के टॉप-10 बैंको में शुमार है।'












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