गुजरात में चुनावी ऐक्शन शुरू, कांग्रेस, AAP या AIMIM,BJP को कौन दे रहा ज्यादा टेंशन ?

अहमदाबाद, 15 मई: गुजरात में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से पूरा जोर लगाना शुरू कर दिया है। अभी तक प्रदेश में दो ही पार्टियों के बीच मुकाबला होता था, लेकिन अबकी बार इसमें कई किरदार जोर मार रहे हैं। इस वजह से कांग्रेस और भाजपा के लिए अपनी-अपनी चुनौतियां पैदा हो गई हैं। आम आदमी पार्टी, कांग्रेस की जड़ें काटने में लगी दिख रही है तो भाजपा का टेंशन अपने गढ़ को सुरक्षित बचाए रखने को लेकर है। क्योंकि, गुजरात से ना सिर्फ पार्टी की, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सियासी प्रतिष्ठा भी जुड़ी हुई है।

भाजपा के लिए प्रतिष्ठा बचाए रखने का चुनाव

भाजपा के लिए प्रतिष्ठा बचाए रखने का चुनाव

गुजरात में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक पार्टियों का ऐक्शन शुरू है। सच तो यह है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी फरवरी-मार्च में हुए 5 विधानसभा चुनावों के साथ ही इसका आगाज कर दिया था। गुजरात विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए कोई सामान्य चुनाव नहीं है। पार्टी यहां लगातार पांच चुनावों से जीतती आ रही है और इसबार छठवीं बार सरकार बनाने की कोशिश है। बीजेपी की राजनीति के लिए गुजरात चुनाव एक तरह से उसकी सियासी पहचान से जुड़ा है। क्योंकि, प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का यह गृहराज्य भी है। 2017 के चुनाव में भाजपा यहां की 182 में से 99 सीटें जीतकर सरकार बचाने में सफल रही थी। लेकिन, तब कांग्रेस ने सत्ताधारी दल के लिए बहुत ही कड़ी चुनौती पेश की थी।

आम आदमी पार्टी की जोर आजमाइश

आम आदमी पार्टी की जोर आजमाइश

पिछले कम से कम ढाई दशकों से गुजरात में दो दलों की राजनीति चली है। बीजेपी मजबूती के साथ सत्ता में रही है और कांग्रेस ने उसे इससे बेदखल करने के लिए हर जतन कर लिए हैं। पिछले कुछ समय में कुछ स्थानीय चुनावों के जो परिणाम आए हैं, उससे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम की उम्मीदें जग गई हैं। आम आदमी पार्टी यहां खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में पेश करना चाहती है। खासकर उसके मुस्लिम वोट बैंक पर पार्टी ने कातर निगाहें टिका रखी हैं। इसके अलावा वह अपनी 'फ्री पॉलिटिक्स' से इस बार यहां की चुनावी फिजा को त्रिकोणीय करना चाहती है। इन्हीं अरमानों के साथ पार्टी ने 20 दिनों की 'परिवर्तन यात्रा' की योजना बनाई है। पंजाब में पार्टी की सरकार बनने से यूं भी इसका हौसला बुलंद है और पिछले कुछ समय में इसके संयोजक अरविंद केजरीवाल कम से कम पांच बार प्रदेश का दौरा कर चुके हैं। पार्टी ने जनजातीय सीटों पर प्रभाव डालने के लिए भारतीय ट्राइबल पार्टी के साथ गठबंधन भी किया है और केजरीवाल 1 मई को भरूच में आदिवासी संकल्प महासम्मेलन को भी संबोधित कर चुके हैं।

कांग्रेस की कश्मकश

कांग्रेस की कश्मकश

कांग्रेस के लिए दशकों बाद ऐसा पहला मौका होगा, जब पार्टी बिना अहमद पटेल की रणनीति बनाए यहां चुनाव मैदान में उतरेगी। पटेल कांग्रेस के ना सिर्फ बहुत बड़े और सोनिया गांधी के सबसे भरोसेमंद सियासी चेहरा थे, बल्कि उनके इशारे के बिना गांधी परिवार को छोड़कर किसी के लिए पार्टी में पत्ता तक हिला पाना नामुकिन था। फिर गुजरात तो उनका गृहराज्य ही था। दिवंगत पटेल के जाने के बाद उनके बेटे फैसल पटेल भी कुछ समय पहले एक ट्वीट के जरिए नेतृत्व की ओर से अपनी अनदेखी पर सवाल उठा चुके हैं। वह विकल्प खुले होने की बात भी कह चुके हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी तो उसपर पाटीदार आंदोलन का भी असर था, जिसके अगुवा हार्दिक पटेल कांग्रेस में 'बिना विभाग के मंत्री' (कार्यकारी अध्यक्ष होते हुए भी जिम्मेदारी तय नहीं होने का आरोप) बनाए जाने पर सार्वजनिक तौर पर अपनी खीझ जाहिर कर चुके हैं। पार्टी विधायक अश्विन कोटवाल, पूर्व विघायक मणिभाई वाघेला और प्रवीण मारू, वसंत भटोल जैसे दिग्गज पहले ही बीजेपी के साथ जा चुके हैं। हालांकि, राहुल गांधी राज्य में अगली सरकार बनाने का दावा कर चुके हैं, लेकिन संगठन को अभी काफी ठोकने-पीटने की जरूरत लग रही है।

बीजेपी को कौन दे रहा है ज्यादा टेंशन ?

बीजेपी को कौन दे रहा है ज्यादा टेंशन ?

उधर भाजपा ने भी रविवार से अहमदाबाद में अगले चुनावों को लेकर रणनीति बनाने के लिए दो दिवसीय चिंतन शिविर में माथा खपाना शुरू किया है। जानकारी के मुताबिक खुद गृहमंत्री अमित शाह, पार्टी के गुजरात प्रभारी भूपेंद्र यादव और मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के साथ मिलकर प्रदेश नेतृत्व के साथ रणनीतियां बनाने में लगे हुए हैं। माना जा रहा है कि इस बैठक में चुनावों से पहले कांग्रेस के बागियों को शामिल कराने पर भी विचार होना है। सूत्रों का कहना है कि हाल ही में जो नेता पार्टी में शामिल हुए हैं, उन्हें टिकट देने से पहले उनकी जीत की संभावनाओं को लेकर भी एक मापदंड तय किया जा सकता है, क्योंकि गुजरात में पार्टी को जीत से कम कुछ भी मंजूर नहीं हो सकता! लिहाजा, पांच कार्यकाल की एंटी इंकंबेंसी, महंगाई, पेट्रोल-डीजल के दाम और विपक्ष की ओर से बेरोजगारी की शोर से निपटने पर भी रणनीति बन सकती है। क्योंकि, ये सारे ऐसे मुद्दे हैं, जो इस वक्त भाजपा नेतृत्व को सबसे ज्यादा टेंशन दे रहे होंगे।

ओवैसी की पार्टी ने भी लगा दिया है जोर

ओवैसी की पार्टी ने भी लगा दिया है जोर

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने भी इस बार गुजरात में चुनावी जाल बिछाना शुरू कर दिया है। पार्टी चीफ ओवैसी ने रविवार को जिग्नेश मेवाणी के चुनाव क्षेत्र वडगाम में एक सभा की है, जिसमें उन्होंने 2002 समेत गुजरात में हुए तमाम दंगों के जख्मों को कुरेदकर अपनी सियासी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। उन्होंने कहा है, 'मैं उस जमीन पर खड़ा हूं, जहां देश में सबसे ज्यादा फसाद हुए। चाहे वह 69 का फसाद हो, 1980 का फसाद हो, चाहे बाबरी मस्जिद के बाद का फसाद हो, चाहे 2002 का वह नरसंहार हो, लेकिन मैं सलाम करता हूं इस सरजमीन पर बसने वालों को, जो हिम्मत से सीना तानकर आज भी जिंदा हैं......और फक्र के साथ अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं।'

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