DDU University: शोधपीठ में योग कार्यशाला के आनलाईन व्याख्यान के साथ आयोजित हुआ योग प्रशिक्षण कार्यक्रम
Gorakhpur News: दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय स्थित महायोगी गुरु श्रीगोरक्षनाथ शोधपीठ द्वारा कुलपति प्रो. पूनम टण्डन के संरक्षण में चल रहे सप्तदिवसीय शीतकालीन योग कार्यशाला विषय 'योग एवं दर्शन' दिनांक 21 दिसम्बर को योग प्रशिक्षण के पांचवें दिन भी प्रतिभागियों की काफी संख्या रही। योग प्रशिक्षण डा. विनय कुमार मल्ल के द्वारा दिया गया। आज प्राणायाम, आसनों के साथ ही जलनेति का भी अभ्यास कराया गया। योग प्रशिक्षण में लगभग 30 लोगों ने भाग लिया। इसमें स्नातक, परास्नातक, शोध छात्र आदि विद्यार्थी एवं अन्य लोग सम्मिलित हुए।
अपरान्ह 1 बजे आनलाइन माध्यम से नाथ पंथीय भक्ति एवं श्रीमद्भागवत पुराणोक्त भक्ति की तुलनात्मक दृष्टि विषय पर कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि के स्वागत के साथ शोधपीठ के उप निदेशक डॉ. कुशलनाथ मिश्र जी के द्वारा हुआ। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. सूर्यकांत त्रिपाठी, सहायक आचार्य, संस्कृत एवं प्राकृत विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय रहे। उन्होंने भक्ति के विविध आयामों तथा भक्ति के व्यापक अवधारणा पर विस्तृत रूप से चर्चा किया। उन्होंने कहा कि सूर्य एवं चंद्र जगत के नियामक तत्व है। इसी सूर्य व चंद्र से हठयोग की व्युत्पति हुई है। लोभ, क्रोध, मोह इत्यादि से मुक्ति वैराग्य का लक्षण है और यही अमनस्क योग में भी साधन का अंग है। उन्होंने कहा कि कर्तव्य कर्म के प्रति भी भक्ति होना चाहिए। कर्म, ज्ञान तथा भक्ति का अभिप्राय एक ही है। बिना मन के साधे भक्ति में प्रवेश नहीं हो सकता। और मन कि साधना योग है। शिव समता व समरसता के उद्घोषक देवता है।

इस आनलाइन व्याख्यान में कार्यक्रम का संचालन शोधपीठ के रिसर्च एसोसिएट डॉ. सुनील कुमार द्वारा किया गया। शोधपीठ के सहायक निदेशक डॉ. सोनल सिंह द्वारा मुख्य वक्ता एवं समस्त श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापित किया गया। शोधपीठ के सहायक ग्रन्थालयी डॉ. मनोज कुमार द्विवेदी, वरिष्ठ शोध अध्येता डॉ. हर्षवर्धन सिंह, चिन्मयानन्द मल्ल आदि उपस्थित रहे। डॉ. कपिल, डॉ. राकेश दुबे आदि ने प्रश्न भी पूछा जिसका वक्ता ने उत्तर दिया। विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के साथ ही विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के आचार्य सहित डॉ. श्रीनिवास मिश्र, डॉ. अनूपपति तिवारी आदि जुड़े रहे।












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