जितना ध्यान एकाग्र होगा, कुण्डलिनी उतनी जल्दी जागृत होगी- डॉक्टर दीनानाथ

International Yoga Day: गोरखपुर स्थित गोरक्षनाथ मंदिर में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर महायोगी गुरु गोरखनाथ योग संस्थान एवं महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद द्वारा चल रहे साप्ताहिक योग शिविर के दूसरे दिन शुक्रवार को सैद्धांतिक सत्र को मुख्य वक्ता लखनऊ से डॉक्टर दीनानाथ राय ने गोरखनाथ जी के कुंडलिनी योग पर वैज्ञानिक व्याख्या विषय पर अपने विचार रखे। यहां सात दिवसीय योग शिविर का आयोजन किया जा रहा है।

डॉक्टर दीनानाथ ने कहा कि कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया से पहले शरीर को समझना जरूरी है। ब्रहाण्ड में जो कुछ है, वह इंसान शरीर में ही है। उसके सब तत्व शरीर को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले हिस्से में सिर और मेरू (स्पाइन) है। दूसरे हिस्से में टांगें। स्पाइनल कॉर्ड शरीर को जोड़ता है। यही दिमाग को नियंत्रित करता है।

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हमारी चेतना मेरू में दौड़ती है। यहीं सात चक्र यानी सात लोक हैं। शरीर पांच तत्वों आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से मिल कर बना है। मूलाधार चक्र में पृथ्वी, सुविष्ठान में जल, मणिपूर में अग्नि, अनाहत में वायु और विशुद्ध में आकाश। इन चक्रों को प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। मानव एक प्रक्रिया के तहत इन तक पहुंचता है। मृत्यु के साथ ये चक्र गायब हो जाते हैं। मूलाधार चक्र रीढ़ की हड्डी के शुरुआती भाग यानी गुदा द्वार के पास होता है। सबसे पहले यहां ध्यान को लाया जाता है। यह कुण्डलिनी शक्ति के बैठने का स्थान है। 'ऊं' की मद्धम ध्वनि के साथ प्राणायाम किया जाता है। सीधे हाथ के अंगूठे से दाईं नासिका को बंद करके (3 ऊं) सांस को खींचना और बाईं से छोड़ना। फिर यही क्रिया सीधे हाथ के अंगूठे से दाईं नासिका बंद करके (12 ऊं) सांस रोककर दोहराई जाती है।

यह कल्पना करते हुए कि प्राण वायु कुण्डलिनी को जगा रही है। इसके बाद यह क्रिया 6 ऊं सांस खींचकर और इतनी ही देर में सांस छोड़कर की जाती है। इससे कुण्डलिनी जल्दी जागृत होती है। जितना ध्यान एकाग्र होगा, कुण्डलिनी उतनी जल्दी जागेगी। प्राण शक्ति के मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक चलने को शक्ति चालना कहते हैं।

कुण्डलिनी जाग जाने के बाद भी इसे सहस्रार चक्र तक पहुंचाना जरूरी है।
कुण्डलिनी योग में चक्र दर चक्र ग्रंथियों को तोड़ना होता है। यह बहुत मुश्किल प्रक्रिया है। प्राण को सुषुम्ना नाड़ी के जरिए ग्रंथियों तक पहुंचाने के लिए गुरु की ज़रूरत पड़ती है। गुरु नाड़ियां, चक्रों के स्थान और योगिक क्रियाओं की बारीकियां समझा सकता है। इसलिए ख़ुद को गुरु को समर्पित करना होगा। कुंडलिनी का संबंध तंत्र से है इसका सबसे पहले प्रयोग ऋग्वेद में आया है शिवा शक्ति का मिलन ही कुंडलिनी जागरण जब शरीर में शिवा शक्ति के का मिलन होता है तो जीवन बदल जाता है । कुंडलिनी महायोग है, सभी प्रकार के योग का उद्देश्य कुंडलिनी जागरण ही है। जब गुरु गोरक्षनाथ जी के हठयोग की बात करते हैं तो वह भी कुंडलिनी जागरण ही है।

अध्यक्षता गोरखपीठ के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ जी महाराज, संचालन गोक्षनाथ संस्कृत विद्यापीठ के आचार्य बृजेश मणि मिश्र तथा आभार ज्ञापन शिविर प्रभारी योगी सोमनाथ ने किया। इस अवसर पर मंच पर योगाचार्य डॉ जयंतनाथ उपस्थित रहे। इसके पूर्व प्रातः 5:00 से 6:00 बजे तक योगिक षटकर्म तथा 6:00 से 8:00 तक योग एवं प्राणायाम की क्रियाएं हुई । तथा सायंकाल सत्र में संगोष्ठी के बाद सायं 6:00 से 7:30 तक योगाभ्यास एवं ध्यान की क्रियाएं कराई गई जिसमें विभिन्न आसन एवं प्राणायाम योगाचार्य जी द्वारा शिविर के प्रतिभागियों को कराया गया ।

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