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Sawan 2023: सावन में अवश्य करें गोरखपुर- बस्ती मंडल के इन प्राचीन शिव मंदिरों के दर्शन

Most Famous Lord Shiva Temples in Gorakhpur Basti: हिंदू धर्म में सावन माह का विशेष महत्व है। यह माह भगवान शिव को बहुत प्रिय है। शिवभक्तों के लिए शिव की आराधना का उत्तम समय होता है। इस समय भक्तों की भारी भीड़ मंदिरों में देखने को मिल रही है। ऐसे में हम आपकों गोरखपुर-बस्ती मंडल के कुछ प्रमुख व प्राचीन मंदिरों के बारे में बताते हैं जहां आप सावन माह में भगवान शिव की विधि विधान से पूजा अर्चना कर सकते हैं।

महादेव झारखंडी मंदिर गोरखपुर स्थित महादेव झारखंडी मंदिर भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। ऐसी मान्यता है कि जब यह क्षेत्र घने जंगलों से आच्छादित था, तब एक लकड़हारा लकड़ी काट रहा था। उसकी कुल्हाड़ी अचानक पत्थर से जा टकराई। इसके बाद उस पत्थर से रक्त की धारा बहने लगी। यह बात उसने ग्रामीणों को बताई। वहां पहुंचे लोगों ने पत्थर बाहर निकालने की बहुत कोशिश की लेकिन वह नहीं निकला। इसके बाद से वहां जल व दूध से अभिषेक होने लगा। यही स्थान झारखंडी महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गौतम बुद्ध ने भी इस मंदिर में विश्राम किया था।

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मुक्तेश्वरनाथ मंदिर यह मंदिर गोरखपुर के राप्ती नदी के तट पर स्थित है। लगभग चार सौ साल पुराने इस मंदिर का यह नाम मुक्तिधाम के किनारे होने के कारण पड़ा। ऐसी मान्यता है कि बांसी के राजा यहां शिकार करने आए और जंगल में शेरों ने उन्हें घेर लिया। जान संकट में फंसी देखकर राजा ने अपने इष्टदेव भगवान शिवशंकर को याद किया तो शेर वापस लौट गए। इसी स्थान पर राजा ने भगवान का मंदिर बनवाने का संकल्प लिया।

मानसरोवर मंदिर गोरखपुर स्थित मानसरोवर मंदिर का निर्माण राजा मानसिंह ने कराया था। मानसिंह के स्वप्न में आकर भगवान भोलेनाथ ने जंगल के बीच मंदिर निर्माण का निर्देश दिया था। राजा ने इस स्थान पर मंदिर के साथ ही पोखरे का भी निर्माण कराया। यह भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं।

बाबा दुग्धेश्वरनाथ मंदिर देवरिया के रुद्रपुर- गौरीबाजार मार्ग पर सहनकोट के समीप बाबा दुग्धेश्वरनाथ का प्राचीन मंदिर है। लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व महाराजा दीर्घवाह के पुत्र ब्रजभान सैनिकों के साथ कहीं जा रहे थे। रुद्रपुर में घने जंगलों में उन्होंने रात्रिविश्राम किया। कुछ दिन तक राजा अपने सैनिकों के साथ यहीं रुक गए। इसी दौरान सैनिकों ने देखा कि गाय एक स्थान पर खड़ी है और थन से दूध निकल रहा है। कई दिनों तक यही क्रम रहा। सैनिकों ने राजा से यह बात बताई। राजा ने खुदाई करवाया तो वहां शिवलिंग दिखाई दिया। इसी स्थान पर पूजा अर्चना शुरु हो गयी। यही जगह दुग्धेश्वरनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

तामेश्वरनाथ शिव मंदिर संत कबीर नगर में तामेश्वरनाथ धाम शिव भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। यह मंदिर का संबंध पांडवों से हैं। द्वापर युग में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान माता कुंती ने यहां शिव की आराधना की थी। राजकुमार सिद्धार्थ यहां वल्कल वस्त्र त्याग कर मुंडन कराने के पश्चात तथागत बने थे। यहां स्वत: शिवलिंग प्रकट होने का प्रमाण मिलता है।

बाबा भद्रेश्वर नाथ मंदिर बस्ती में स्थित बाबा भद्रेश्वर नाथ मंदिर से संबंधित कई पौराणिक कथाएं हैं। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण रावण ने किया था। अज्ञातवास के समय युधिष्ठिर ने यहां पूजा की थी। जनपद मुख्यालय से सात किलोमीटर दूर कुआनों नदी के तट पर बाबा भद्रेश्वर नाथ का प्राचीन मंदिर स्थित है।

इटहिया शिव मंदिर महराजगंज जिले के निचलौल क्षेत्र में स्थित यह शिव मंदिर मिनी बैजनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। यहां पंचमुखी शिवलिंग है। प्राचीन समय में यह स्थान घने जंगलों से आच्छादित था। राजा वृषभसेन का प्रभाव क्षेत्र था। राजा के यहां एक नंदिनी गाय थी जो राजा को बहुत प्रिय थी। राजा शिव भक्त थे। गाय प्रतिदिन दूध देती थी। कुछ समय बाद उसने दूध देना बंद किया तो राजा परेशान हो गए। बाद में पता चला कि वह गाय घने जंगलों में जमीन पर दूध दे रही है। उस स्थान पर खुदाई हुई तो वहां पर पंचमुखी शिवलिंग मिला। तभी से यह स्थान आस्था का केंद्र बन गया।

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