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क्या गोवा में मनोहर पर्रिकर का अपमान कर रही भाजपा ?

क्या गोवा में मनोहर पर्रिकर का अपमान कर रही भाजपा ?

पणजी, 23 जनवरी: क्या भाजपा काम निकल जाने के बाद अपने वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर देती है ? क्या भाजपा में आदर्शवाद और सिद्धांत केवल ढोंग है ? दिवंगत मनोहर पर्रिकर राजनीति में सादगी और ईमानदारी के प्रतीक थे। उनके कारण ही गोवा में भाजपा की सरकार बनी थी। लेकिन 2022 के चुनाव में भाजपा ने उनके त्याग और बलिदान को भुला दिया। वे पणजी के विधायक थे। पर्रिकर के पुत्र उत्पल पणजी से टिकट मांग रहे थे। लेकिन भाजपा ने उनकी मांग ठुकरा कर ऐसे नेता को उम्मीदवार बना दिया जिस पर रेप का आरोप है। इसके विरोध में उत्पल ने भाजपा से इस्तीफा दे कर पणजी से निर्दलीय चुनाव लड़ने का एलान किया है। उन्होंने शर्त रखी है कि अगर भाजपा पणजी में कोई योग्य उम्मीदवार देगी तो वे निर्दलीय चुनाव लड़ने का विचार छोड़ देंगे।

पिता की मौत के बाद उत्पल को टिकट देने की थी चर्चा

पिता की मौत के बाद उत्पल को टिकट देने की थी चर्चा

मनोहर पर्रिकर जैसे नेता विरले ही होते हैं। वे जितने योग्य नेता थे उतने ही योग्य अभिभावक भी। उनकी पत्नी मेधा पर्रिकर की सन 2000 में कैंसर से मौत हो गयी थी। उसके बाद मनोहर पर्रिकर ने ही अपने दोनों पुत्रों उत्पल औऱ अभिजीत की परवरिश की। 2019 में दोनों भाइयों ने अपने पिता को भी खो दिया। मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद मई 2019 में पणजी सीट पर उपचुनाव हुआ था। उस समय भी उत्पल को टिकट देने की बात चली थी। लेकिन बाद में भाजपा ने सिद्धार्थ कुंकोलियंकर को उपचुनाव में उतारा। इस चुनाव में कांग्रेस के एतानसियो मोनसेरेट ने सिद्धार्थ कुंकोलियंकर को करीब 1700 वोटों से हरा दिया था। भाजपा की सरकार रहते उसने मुख्यमंत्री की सीट गंवा दी। इस चुनाव में उत्पल ने भाजपा उम्मीदवार सिद्धार्थ का जी जान से प्रचार किया था। उन्हें टिकट नहीं मिलने का कोई गम नहीं था। इसकी वजह थी सिद्धार्थ कुंकोलियंकर का त्याग। 2017 में पणजी सीट से सिद्धार्थ ने ही भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता था।

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    मनोहर पर्रिकर की वजह से बनी थी भाजपा की सरकार

    मनोहर पर्रिकर की वजह से बनी थी भाजपा की सरकार

    2017 के गोवा विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत नहीं मिला था। उसके सिर्फ 13 विधायक जीते थे। अन्य दलों के सहयोग से भाजपा सरकार बनाने के लिए जोड़तोड़ कर रही थी। कुछ निर्दलीय विधायकों और गोवा फॉरवर्ड पार्टी ने मांग रख दी कि अगर मनोहर पर्रिकर को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा तो वे भाजपा का समर्थन कर सकते हैं। मनोहर पर्रिकर जनसरोकार वाले नेता थे। विरोधी भी उनकी इज्जत करते थे। भाजपा को सहयोग करने वाले दलों को सिर्फ उन पर ही विश्वास था। भाजपा के सामने मुश्किल आन पड़ी। मनोहर पर्रिकर उस समय केन्द्रीय रक्षा मंत्री के पद पर आसीन थे। पीएम मोदी उन्हें पद पर बनाये रखना चाहते थे। लेकिन उनके बिना गोवा में भाजपा की सरकार संभव नहीं थी। सोचने समझने का समय बिल्कुल नहीं था। कांग्रेस सबसे पार्टी थी और उसे सरकार बनाने के लिए सिर्फ 4 विधायकों की जरूरत थी। देर करने का मतलब था कांग्रेस को मौका देना। मनोहर पर्रिकर रक्षा मंत्री का पद छोड़ कर गोवा आ गये। सीएम बने। अब उनके लिए विधायक बनना जरूरी था। तब उनके विधायक बनने के लिए सिद्धार्थ ने ही पणजी की सीट खाली की थी। इस सीट से उपचुनाव जीत कर मनोहर पर्रिकर सीएम का पद बरकार रख पाये थे।

    जिसे टिकट मिला उस पर रेप का केस

    जिसे टिकट मिला उस पर रेप का केस

    मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस के एतानसियो मोनसेरेट चुनाव जीते थे। सरकार भाजपा की थी। चुनाव जीतने के कुछ महीने बाद मोनसेरेट भाजपा में शामिल हो गये थे। 2022 के विधानसभा चुनाव में उत्पल पर्रिकर ने पणजी से टिकट मांगा था। लेकिन भाजपा ने उत्पल की जगह मोनसेरेट को टिकट दे दिया। मोनसेरेट विवादास्पद छवि के नेता हैं। 26 दिसम्बर 2019 को गोवा की जिला अदालत ने मोनसेरेट के खिलाफ रेप का आरोप तय किया था। उन पर एक नाबालिग लड़की के दुष्कर्म का आरोप लगा था। उस लड़की ने आरोप लगाया था कि एतानसियो मोनसेरेट ने नशीला पदार्थ खिला कर उसका यौन शोषण किया था। इस मामले में वे 2016 में गिरफ्तार भी हुए थे। तब मोनसेरेट ने इस केस को विरोधियों की साजिश बताया था।

    दलबदलुओं को मलाई और निष्ठावन को उपदेश

    दलबदलुओं को मलाई और निष्ठावन को उपदेश

    एतानसियो मोनसेरेट सुविधा के हिसाब से दल बदलते रहे हैं। 2002 में वे यूनाइटेड गोअंस डेमोक्रेटिक पार्टी से विधायक बने थे। फिर कांग्रेस में आये। अब भाजपा में हैं। 2017 में मोनसेरेट पणजी में चुनाव हार गये थे। उन्हें भाजपा के सिद्धार्थ कुंकोलियंकर ने ही हराया था। फिर क्या गारंटी है कि वे 2022 में भाजपा के टिकट पर गोवा से जीत ही जाएंगे ? मनोहर पर्रिकर के समर्थक पूछ रहे हैं कि उत्पल जैसे युवा और साफ छवि के उम्मीदवार की अनदेखी कर भाजपा ने आखिर मोनसेरेट को टिकट क्यों दिया ? अगर भाजपा ने परिवारवाद के आधार पर उत्पल को टिकट नहीं दिया तो फिर उसने मोनसेरेट की पत्नी जेनिफर को कैसे टिकट दे दिया ? एक विवादित नेता खुद भी टिकट ले और पत्नी को भी टिकट दिला दे, क्या यही भाजपा की नीति है ? अगर भाजपा वंशवाद के खिलाफ है तो फिर उसने विश्वजीत राणे और उनकी पत्नी दिव्या राणे को कैसे टिकट दे दिया ? विश्वजीत राणे कांग्रेस से भाजपा में आये और उनके दोनों हाथ में लड्डू है जब कि भाजपा के समर्पित नेता मनोहर पर्रिकर के पुत्र उत्पल को सिद्धांत का उपदेश दिया जा रहा है। मनोहर पर्रिकर के हजारों समर्थक भाजपा की इस दोहरी नीति बेहद नाराज हैं।

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