भारत में विज्ञान की दुनिया क्यों है इतनी पुरुष प्रधान

विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में आज भी महिलाएं लैंगिक भेदभाव की शिकार हैं. इस क्षेत्र में महिलाओं की बराबरी के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन चुनौतियां अब भी कम नहीं हुई हैं.

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भारत के मिशन मंगलयान से लेकर चंद्रयान-2 तक की सफलता के पीछे कई महिला वैज्ञानिकों का हाथ है. विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में महिलाओं की इस भागीदारी का खूब जश्न भी मनाया गया है. इसके बावजूद आज भी यह क्षेत्र पुरुष प्रधान है. महिला सशक्तिकरण के तमाम दावों और योजनाओं के बावजूद विज्ञान की दुनिया में महिलाएं लगातार पितृसत्ता और लैंगिक भेदभाव से जूझ रही हैं.

पुरुष प्रधान हैं ज्यादातर प्रयोगशालाएं

दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज के फिजिक्स डिपार्टमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर आभा देव हबीब बताती हैं, "मेरी बहन को एक प्रोफेसर ने अपनी लैब में काम नहीं करने दिया. एक-डेढ़ साल तक उसका समय बर्बाद करने के बाद कहा कि वह अपनी लैब में पुरुष स्कॉलर को लेना पसंद करते हैं." हबीब का कहना है कि इस घटना ने उनकी बहन का मनोबल तोड़ कर रख दिया था. आखिरकार उन्हें विदेश जाकर आगे की पढ़ाई करनी पड़ी.

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भारत में ना सिर्फ अधिकतर प्रयोगशालाएं, बल्कि फैकल्टी के सदस्य भी पुरुषों के वर्चस्व वाले हैं. माना जाता है कि पढ़ाई की मदद से लैंगिक भेदभाव को कम किया जा सकता है लेकिन साइंस और रिसर्च के क्षेत्र में इसका ठीक उल्टा हो रहा है. इतनी पढ़ाई-लिखाई के बावजूद यहां आज भी महिलाओं को लेकर वही रूढ़िवादी सोच कायम है. आईआईटी दिल्ली के फिजिक्स डिपार्टमेंट से पोस्ट डॉक्टरेट फेलोशिप कर रहीं नयनी बजाज बताती हैं, "इस क्षेत्र में में जितना ऊंचाई पर जाते हैं, लैंगिक असमानता की घटनाएं बढ़ती जाती हैं. ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन लेवल पर फिर भी सब ठीक रहता है, लेकिन असल दिक्कतें उसके बाद पेश आती हैं."

पुरुषों को दी जाती है प्राथमिकता

ग्रेजुएशन और मास्टर्स दिल्ली से करने के बाद फिजिक्स में पीएचडी के लिए नयनी ने जब मुंबई के भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर (बीएआरसी) में दाखिला लिया तो जिस लैब में उनकी रिक्रूटमेंट हुई, वहां वह अकेली लड़की थीं. नयनी बताती हैं, 'पीएचडी पूरी करने के बाद मैं पोस्ट डॉक्टरेट के लिए बाहर जाना चाहती थी. मैंने अपने प्रोफेसर से रिकमेंडेशन लेटर देने के लिए कहा तो उन्होंने मुझसे कहा, "तुम्हारी उम्र शायद 29 के आसपास होगी. जल्दी ही तुम्हारी शादी हो जाएगी. मेरे खयाल में शादी हो जाने के बाद तुम्हें इस बारे में अपने पति से सलाह-मशविरा करना चाहिए. फिर आगे का कोई फैसला लेना चाहिए"

बजाज कहती हैं, "यह सुनकर मैं हैरान थी. उन्होंने मुझे रिकमेंडेशन लेटर नहीं दिया. मेरी जगह एक पुरुष स्कॉलर को यह मौका दिया गया."

बेंगलुरु के जवाहरलाल नेहरु सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च से एक्सपेरिमेंटल फिजिक्स में पीएचडी कर रही सुधा (बदला हुआ नाम) ने बताया कि एक्सपेरिमेंटल फिजिक्स में पूरी तरह पुरुषों का दबदबा है. यहां प्रयोगशालाओं में भारी-भरकम मशीनों और इंस्ट्रूमेंट्स पर काम करना होता है. महिलाओं को लेकर लंबे समय चली आ रही धारणाओं के आधार पर यह सोच लिया जााता है कि उनमें ऐसी प्रयोगशालाओं में काम करने का ना तो स्टैमिना है और ना ही वह अपने काम को उतना वक्त दे सकती हैं, जितना कि पुरुष. कॉन्फ्रेंसों में भी पुरुषों के विचारों को ज्यादा तरजीह दी जाती है.

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इस क्षेत्र में लैंगिक असमानता का यह आलम है कि कई महिलाएं कॉन्फ्रेंस में सवाल ही नहीं पूछतीं, ना ही खुल कर अपनी बात कह पाती हैं. सुधा बताती हैं कि ऐसा करने के पीछे सिर्फ एक कारण है और वह यह कि कहीं उनकी किसी बात से प्रोफेसरों या समकक्ष पुरुषों का मेल ईगो आहत हो गया तो उन्हें जो थोड़ा-बहुत मौका दिया जा रहा है, वह भी नहीं दिया जाएगा. आखिर में सुधा हंसते हुए कहती हैं, "मैं भी इसी वजह से नहीं चाहती कि मेरा असली नाम लिखा जाए."

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"साइंस के लिए नहीं बनी हैं महिलाएं!"

अपना एक और अनुभव साझा करते हुए नयनी बजाज बताती हैं, "रिसर्च इंस्टीट्यूट में आने के बाद मुझे एहसास हुआ कि यहां फैकल्टी और पुरुष स्कॉलर्स के दिमाग में कहीं पीछे यह सोच हावी रहती है कि महिलाएं साइंस के लिए नहीं बनी हैं. कुछ वक्त पहले अपनी लैब में एक इंस्ट्रूमेंट ठीक करने आए इंजीनियर से मैंने उनकी कंपनी में वेकेंसी के लिए पूछताछ की, तो उन्होंने जवाब दिया कि आपके प्रोफाइल से मैच करती वेकेंसी है पर कंपनी उस पोस्ट के लिए पुरुष कैंडिडेट की तलाश कर रही है."

मिरांडा हाउस में फर्स्ट ईयर के छात्रों को फिजिक्स पढ़ा रहीं प्रोफेसर आभा का कहना है कि पुरुष आज भी यही सोचते हैं कि साइंस और मैथ्स में लड़कियों के नंबर आ जाते हैं बस. नंबर आने में और टेक्निकल चीजें समझने में बहुत फर्क है. पुरुषों को महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा बुद्धिमान माना जाता है.

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'पविनारी' तोड़ने की कोशिश कर रही है यह छवि

मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की इंडियन फिजिक्स एसोसिएशन का जेंडर इन फिजिक्स वर्किंग ग्रुप (जीआईपीडब्ल्यूजी) इस दिशा में काफी काम कर रहा है. इस ग्रुप का मुख्य उद्देश्य है फिजिक्स के क्षेत्र में लैंगिक समानता लाना, जिसके तहत जीआईपीडब्ल्यूजी ने पविनारी की शुरुआत की है. पविनारी यानी पदार्थ विज्ञान की नारियां. इसके तहत प्रमुख महिला भौतिक वैज्ञानिकों पर एक पब्लिक लेक्चर सीरीज पेश की जाती है. पविनारी का उद्देश्य है प्रमुख महिला वैज्ञानिकों के शानदार काम को संजोना और युवा पीढ़ी को प्रेरित करना.

यूट्यूब पर मौजूद इसी सीरीज के एक लेक्चर में स्कूल ऑफ फिजिक्स, यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद की रिटायर्ड प्रोफेसर बिंदू ए बांबा कहती हैं, "ज्यादातर साइंटिफिक रिसर्च जो मैंने देखी हैं, वे इस आधार से शुरू होती हैं कि महिलाएं पुरुषों जितनी अच्छी नहीं हैं. लेकिन असल में ऐसा है नहीं. महिलाएं इस क्षेत्र में ना सिर्फ पुरुषों के बराबर हैं, बल्कि कई परिस्थितियों में उनसे बेहतर भी हैं. पविनारी का उद्देश्य एक ऐसी दुनिया बनाना नहीं है, जहां महिलाओं को विशेषाधिकार दिए जाएं, बल्कि एक ऐसी दुनिया बनाना है, जहां महिलाएं और पुरुष समान हों."

बांबा के मुताबिक ऐसा देखा गया है कि महिलाएं एमएससी तक बहुत अच्छा स्कोर करती हैं. अपनी क्लास में टॉप करती हैं लेकिन उसके बाद यह ग्राफ नीचे गिरता जाता है. इसकी बड़ी वजह है ब्रेन ड्रेन. देश की आधी आबादी को वैज्ञानिक अवसरों से दूर करने की कोशिश कर जाती है. ऐसा करना एक तरह से देश को असाधारण रचनात्मकता से वंचित करना है.

भौतिक विज्ञान के क्षेत्र से जुड़ी अधिकतर महिलाओं का यह भी मानना है कि इस क्षेत्र में महिलाओं को बराबरी के मौके तभी मिलेंगे, जब फैकल्टी और लैब में लैंगिक संतुलन होगा. ये महिलाएं छात्रों की रोल मॉडल बन सकती हैं और ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को इस क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं.

Source: DW

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