World Environment Day: जानिए अमृता देवी के बारे में , जिन्होंने पेड़ों की रक्षा के लिए 1730 में दिया था बलिदान
293 वर्ष पूर्व दिया गया पर्यावरण संरक्षण का संदेश, तीनों बेटियों के साथ गांव के 363 महिला-पुरुषों ने दिया था बलिदान। इन सब की प्रेरणा बनी थीं जोधपुर की अमृता देवी।

World Environment Day: विश्व पर्यावरण दिवस विश्वभर में लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है। पर्यावरण और प्रकृति के बिना विकास की कल्पना बेमानी है। आज प्रकृति और पर्यावरण के क्रमिक विनाश के चलते अनेक समस्याएं मानव समाज को चुनौती दे रही हैं। इन बीते दशकों में मनुष्यों ने पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक बलिदान दिए हैं। जैसे सीमा पर तैनात जवान देश की रक्षा के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देते हैं। वैसे ही ऐसे भारतीय भी हुए हैं जो प्रकृति का महत्व समझते थे और उनको बचाने हेतु अपनी जान की बाजी लगा गये। कुछ ऐसी ही थी, अमृता देवी बिश्नोई। जिन्होंने 363 पेड़ों की रक्षा के लिए अपनी बेटियों के साथ बलिदान दे दिया।
293 वर्ष पूर्व दिया था पर्यावरण संरक्षण का संदेश
बात है राजस्थान के जोधपुर की। सन 1730 में जोधपुर के महाराजा अभयसिंह ने अपने भवन के नव-निर्माण के लिए सैनिकों को आदेश दिया कि निर्माण के लिए लकड़ी की आवश्यकता है और शुद्ध लकड़ी की व्यवस्था की जाए। महाराजा अभय सिंह ने अपने आदमियों को रेगिस्तानी क्षेत्र में उपलब्ध खेजड़ी के पेड़ों से लकड़ियाँ प्राप्त करने का आदेश दिया था। सैनिक निकल पड़े खेजड़ली गांव में लकड़ी तोड़ने के लिए। थार रेगिस्तान में होने के बाद भी कई गांवों में बहुत हरियाली थी और खेजड़ी के पेड़ बहुतायत में थे। खेजड़ली वह स्थान है जहां चिपको आंदोलन की उत्पत्ति भारत में हुई थी। वह मंगलवार का दिन था। खेजड़ली गांव में अमृता देवी अपनी तीन बेटियों आसू, रत्नी और भागू बाई के साथ घर पर थीं। तभी उन्हें पता चला कि सैनिक लकड़ी काटने हेतु गांव में आये हैं। यह बात गांव वालो को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं थी कि कोई उनके पेड़ों को हाथ लगाए।
अमृता देवी ने राजा के सैनिकों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, क्योंकि बिश्नोई मान्यताओं में हरे पेड़ों को काटना मना है। इसलिए अमृता देवी पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान भी देने को तैयार थीं। उन्होंने कहा, "सिर साटे, रूंख रहे, तो भी सस्तो जांण।" जिसका अर्थ है, "यदि किसी व्यक्ति की जान की कीमत पर भी एक पेड़ बचाया जाता है, तो वह सही है।" यह बलिदान का यह दौर 27 दिन तक अनवरत चलता रहा। इस दौरान 363 लोगों ने बलिदान दिया। जिसमें अमृता देवी, उनकी तीन पुत्रियां, 69 अन्य महिलाएं व शेष पुरुष शामिल थे।
ग्रामीणों के लिए प्रेरणा बनी अमृता देवी
राजस्थान के जोधपुर शहर से 28 किलोमीटर दूर खेजड़ली में हरे वृक्ष खेजड़ी के लिए अमृता देवी के आह्वान पर 363 लोगों ने खुद को बलिदान कर दिया और समूचे विश्व को प्रकृति और पर्यावरण बचाने की प्रेरणा दी। सबसे पहले वीरांगना अमृता देवी पर ही कुल्हाड़ियों के निर्मम प्रहार हुए और वह वृक्ष रक्षा के लिए प्राण देने वाली पहली महिला बन गई। इस बलिदान से प्रेरणा लेकर उत्साहित ग्रामवासी पूरी ताकत से पेड़ों से चिपक गए। इस बलिदान के बाद अमृता देवी इतिहास में अमर हो गई। अंत में हार मानकर राजा के सैनिकों को वापस जाना पड़ा। यह खबर जब महाराजा अभय सिंह के पास पहुंची तो उन्होंने तुरंत ही पेड़ों को न काटने का आदेश जारी कर दिया और सैनिकों को दंडित भी किया और उन्होंने पूरे बिश्नोई समाज को आश्वासन दिया कि उनके क्षेत्र में अब कोई पेड़ नहीं कटेगा।
गुरू जाम्भेश्वर के पद चिन्हों को माना
गुरू जाम्भेश्वर (1451-1536) ने बिश्नोई संप्रदाय के लिए 29 नियमों का उपदेश दिया था। गुरू जाम्भेश्वर जाम्भोजी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए। जाम्भोजी महाराज का जन्म पंवार गोत्र के क्षत्रिय कुल में हुआ। लोग उन्हे भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं। उनके 120 शब्द प्रमाणिक रूप से उपलब्ध हैं, जिन्हें पांचवा वेद कहा जाता है। भगवान जाम्भोजी महाराज ने कहा था, "जीव दया पालणी, रूंख लीलो न घावेंगुरू। बरजत मारे जीव, तहां मर जाइए।" जिसका अर्थ है "जीव मात्र के लिए दया का भाव रखें, और हरा वृक्ष नहीं काटे। जीव हत्या रोकने के लिये अनुनय-विनय करने, समझाने-बुझाने के बाद भी, सफलता नहीं मिले, तो स्वयं आत्म बलिदान कर दें।"
इन्हीं उपदेशों का पालन करते हुए अमृता देवी हरे पेड़ों को बचाने के लिए पेड़ से चिपक गयी। जिसके बाद महाराजा के सैनिकों द्वारा कुल्हाड़ी से वार करने पर उनका निधन हो गया। अमृता देवी के बलिदान के बाद उनकी तीनों बेटियों ने भी पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे दी। यह खबर पूरे गांव और और विश्नोई समाज में आग की तरह फैल गई जिसके बाद कुल 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।
राजस्थान में सैकड़ों वर्ष पूर्व हुआ था चिपको आंदोलन
पर्यावरण की रक्षा के लिए उत्तराखंड का चिपको आंदोलन सर्वविदित है। उत्तराखंड में गढ़वाल क्षेत्र के चमोली जिले के रेनी गांव में 1973 में यह आंदोलन शुरू हुआ। चिपको आंदोलन को उत्तराखंड की पहाड़ियों में लकड़ी के ठेकेदारों द्वारा बड़े पैमाने पर पेड़ों को काटने के खिलाफ चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा ने शुरू किया था। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आज से लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व 1730 में राजस्थान में विश्व का पहला चिपको आंदोलन अमृतादेवी के नेतृत्व में हुआ था। जिसमें उनकी प्रेरणा से पेड़ों को बचाने के लिए 363 ग्रामीणों ने बलिदान दिया।
केंद्र, राजस्थान और एमपी सरकार देती है अमृता देवी पुरस्कार
वर्ष 1978 से खेजड़ली दिवस मनाया जाता है तथा भादप्रद दशमी को हर साल खेजड़ली का मेला अमृतादेवी की स्मृति में लगता है। इस मौके पर भारत सरकार द्वारा वन्य जीव संरक्षण के लिए अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव सुरक्षा पुरस्कार देती है। जिसमें वन्यजीव सुरक्षा में शामिल व्यक्तियों/संगठनों को पुरस्कार के रूप में एक लाख रुपये नकद की राशि प्रदान की जाती है। इसी प्रकार राजस्थान और मध्य प्रदेश सरकार के वन विभाग ने जंगली जानवरों के संरक्षण और संरक्षण में योगदान के लिए प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय अमृता देवी विश्नोई स्मृति पुरस्कार शुरू किया है। पुरस्कार में नकद ₹25000 और प्रशस्ति पत्र शामिल है। जो भी प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण को बचाने में मदद करता है, उसे अमृतादेवी अवॉर्ड से सम्मानित किया जाता है।
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