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World Camel Day: 22 जून को राष्ट्रीय ऊंट दिवस, जानें रेगिस्तान का जहाज आज क्यों संकट में है?

देश की पश्चिमी सरहद की रक्षा का जिम्मा उठाने वाला और ग्रामीण जीवन का आधार रहा रेगिस्तानी जहाज ऊंट आज संकट में है। राजस्थान में राज्य पशु ऊंट की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

40 साल पहले देश में 11 लाख से अधिक ऊंट (नर व मादा) थे, जो 2019 में घटकर ढाई लाख रह गए हैं। इसमें सर्वाधिक कमी नर ऊंट की संख्या में हुई है।

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20वीं पशु गणना के अनुसार 1.70 लाख ऊंटनी की तुलना में केवल 80 हजार ऊंट थे। ऊंटों की घटती संख्या से प्रदेश की पाकिस्तान में लगती सीमा की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ने लगी है। सीमा सुरक्षा बल के जवानों के पास 650 ऊंटों का कारवां है और सभी नर हैं।

चार राज्य में ऊंट, नौ में शून्य
20वीं पशु गणना 2019 के अनुसार देश में 2012 की तुलना में ऊंटों (नर व मादा) की संख्या 4 लाख से घटकर 2.50 लाख रह गयी। इसमें सर्वाधिक 56 प्रतिशत की कमी ऊंटों और 19 प्रतिशत की कमी ऊंटनियों में आई हैं। फिलहाल राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में ऊंट सर्वाधिक पाले जाते हैं। जबकि देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ऊंट शून्य हो गये हैं। इसमें आंध्र प्रदेश, झारखंड, सिक्किम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, चंडीगढ़, अंडमान, लक्ष्यदीप, दादरा नगर हवेली और दमन व दीव शामिल है।

पशु पालकों ने बनाई ऊंटों से दूरी
रेगिस्तान के जहाज के नाम से प्रसिद्ध ऊंट की उपयोगिता कम होने लगी है। उपयोगिता कम होने के कारण पशुपालकों ने ऊंट से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है। ऊंटों के संरक्षण के लिए राजस्थान सरकार ने इसे साल 2014 में राज्य पशु का दर्जा दिया था। लेकिन राजस्थान में पिछले 10 साल में ऊंटों की संख्या में करीब 35 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं ऊंटों की संख्या में कमी होने का कारण परिवहन और खेती में इनकी उपयोगिता कम होना है।
आजकल लोग ऊंटों के स्थान पर खेती में अत्याधुनिक यंत्र और परिवहन में वाहन काम में लेने लगे हैं। पर्यटन के क्षेत्र में भी इनकी उपयोगिता ज्यादा नहीं है। ऊंट सफारी के लिए काफी कम ऊंटों को उपयोग में लिया जाता है। कृषि और पशुपालन विशेषज्ञों का मानना है कि बिना लाभ के पशुपालक इन्हें पालने को तैयार नहीं है। ऐसे में वह ऊंटों को खुले में छोड़ रहे हैं।

बीएसएफ देता है प्रशिक्षण
बीएसएफ जवानों को ऊंटों का प्रशिक्षण देश में केवल जोधपुर में दिया जाता है। यहां प्रशिक्षण के लिए 62 ऊंट है। जवानों को चार सप्ताह का प्रशिक्षण दिया जाता है, जिसके बाद वे बॉर्डर पर ऊंटों के साथ गश्त करते हुए सीमा की सुरक्षा करते हैं।

ऊंट व ऊंटनी के दूध से बने उत्पाद स्वास्थ्यवर्धक
कभी ग्रामीण जीवन का आधार रहा ऊंट आज संकट में है। लेकिन ऊंट व ऊंटनी के दूध से बने उत्पाद स्वास्थ्यवर्धक है। वर्तमान में ऊंटनी के दूध से बिस्किट, चॉकलेट, आइसक्रीम और साबुन बनाया जा रहा हैं। दूध में विटामिन, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन व अन्य खनिज तत्व होते हैं। जिससे शरीर में इम्यूनिटी बढ़ने के साथ हड्डियां भी मजबूत होती है। यह दूध कैंसर, डायबिटीज, टीबी, हृदय रोग जैसी अनेक बीमारियों के खतरे को भी कम करता है। ऊंटनी का दूध खून की कमी दूर करने के साथ मेमोरी पावर भी बढ़ाता है। इसमें हाइड्रोकसील अम्ल पाया जाता है, जो त्वचा को निखारने में मदद करता है‌।

ऊंट के बालों से बने अनेक प्रोड​क्ट उपलब्ध
ऊंट के बालों से अनेक प्रोडक्ट भी बनाए जाते हैं। आमतौर पर कपड़े या अन्य जानवरों से बने जैकेट, चप्पल और अन्य वस्तुएं बाजार में मिलती है लेकिन राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र, बीकानेर में ऊंट के बालों से बने जैकेट, चप्पल और पर्स खरीदे जा सकते हैं। इसके लिए राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र और केंद्रीय भेड़ एव ऊन अनुसंधान संस्थान ने मिलकर ऊंट के बालों और भेड़ के बालों से उत्पाद तैयार किए हैं। वहीं ऊंट के बालों से साउंड प्रूफ और अग्निविरोधी सीट भी तैयार की गई हैं। साथ ही योगा मैट भी तैयार किया गया है। योगा मैट में पूरी तरह ऊंट के बाल हैं।

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