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Ram Setu: क्या रामसेतु बनेगा राष्ट्रीय धरोहर, जानिए इसका इतिहास

रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने का मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने टाल दिया है क्योंकि केंद्र सरकार ने इस पर अपना जवाब दाखिल नहीं किया है।

Will Ram setu become a national heritage, know its history

सुप्रीम कोर्ट रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग वाली याचिका पर फरवरी के दूसरे सप्ताह में सुनवाई करेगी। यह याचिका सुब्रमण्यम स्वामी ने दायर की थी। जिस पर केंद्र सरकार ने कहा कि वह फरवरी के पहले सप्ताह में इस पर अपना जवाब दाखिल करेगी। जबकि मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि इस मामले में तुरंत सुनवाई संभव नहीं है।

सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी याचिका में रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने के लिए केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण को आदेश देने की मांग की है। सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि मौजूदा केंद्र सरकार पहले ही रामसेतु के अस्तित्व को स्वीकार कर चुकी है और 2017 में उनकी मांग की जांच के लिए एक बैठक भी बुलाई गई थी, लेकिन उसके बाद भी चीजें आगे नहीं बढ़ीं।

आखिर सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचा ये मामला
2 जुलाई 2005 को 2,500 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई थी। मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार ने सेतुसमुद्रम परियोजना को हरी झंडी दी थी। इस परियोजना के तहत भारत और श्रीलंका के बीच के समुद्री रास्ते यानि रामसेतु वहां के उथले समुद्र को गहरा करके जहाजों के आने-जाने का रास्ता साफ करना था। इसके तहत उस संरचना को भी तोड़ा जाना था, जिसे रामसेतु कहा जाता है। तब इसे लेकर कई संगठनों ने इसका विरोध किया था। इसके बाद सुब्रहमण्यम स्वामी इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और तब सरकार ने इस परियोजना के लिए दूसरे जलमार्ग का सहारा लेने की बात कही। वहीं उन्होंने साल 2018 में रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की याचिका सुप्रीम कोर्ट में मेंशन की थी।

हालांकि, केंद्र सरकार रामसेतु मामले पर अपना रुख पहले ही स्पष्ट कर चुकी है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया था कि समुद्र में जहाजों की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए प्रस्तावित सेतुसमुद्रम परियोजना के लिए रामसेतु को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। परियोजना के लिए सरकार कोई दूसरा वैकल्पिक मार्ग खोज रही है। क्योंकि स्वामी ने अपनी याचिका में स्पष्ट कहा है कि रामसेतु लाखों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा हुआ मामला है। इसे न तोड़ा जाए और रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाए।

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तमिलनाडु विधानसभा में सेतुसमुद्रम पर प्रस्ताव
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने बीते गुरुवार (12 जनवरी) को सेतुसमुद्रम परियोजना को लेकर विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया। उन्होंने कहा कि सेतुसमुद्रम परियोजना से 50 हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा। यह कलाईनार (करुणानिधि) का ड्रीम प्रोजेक्ट है। उन्होंने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस जलमार्ग को विकसित करने के लिए धन आवंटित किया था लेकिन राजनीतिक कारणों से भाजपा ने सेतुसमुद्रम परियोजना का विरोध किया था। वहीं पूर्व सीएम जयललिता भी सेतुसमुद्रम परियोजना के पक्ष में थीं, लेकिन अचानक उन्होंने भी अपना मन बदल लिया था। स्टालिन ने आगे कहा कि भाजपा सरकार ने सेतुसमुद्रम परियोजना के केवल एक जलमार्ग की योजना बनाई है। जिस पर भाजपा विधायक नयनार नागेंद्रन ने कहा कि यदि रामसेतु को बिना नुकसान पहुंचाए परियोजना पर काम किया जा सकता है, तो हम इसका समर्थन करेंगे।

क्या है आखिर सेतुसमुद्रम?
भारत के पूर्वी तट से पश्चिमी तट तक जाने के लिए एक जहाज को श्रीलंका के पीछे से चक्कर लगाकर जाना-आना पड़ता है क्योंकि भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र काफी उथला हुआ है। जहाजों को इस यात्रा में तकरीबन 424 समुद्री मील यानी करीब 780 किलोमीटर की अतिरिक्त यात्रा करनी पड़ती है। इसमें 30 घंटे ज्यादा खर्च हो जाते हैं लेकिन सेतुसमुद्रम परियोजना पर काम हो तो करीब 89 किलोमीटर लंबे दो चैनल बनाए जाएंगे। एक प्रकार से कहें तो यह एक चौड़ी नहर की तरह होगा, जिसमें देश और दुनिया के बड़े-बड़े जहाज पास कर सकेंगे। जिन दो चैनल के बनाए जाने की बात की जा रही है उनमें से एक चैनल उस रास्ते पर बनाया जाएगा जिसे 'रामसेतु' कहते हैं। जबकि दूसरा चैनल दक्षिण-पूर्वी पमबन द्वीप के रास्ते पर पाक जलडमरूमध्य को गहरा करके बनाया जाएगा।

रामसेतु क्या चूना पत्थर से बना है?
कई रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी तट से रामेश्वरम द्वीप (पंबन द्वीप) और श्रीलंका के उत्तर-पश्चिमी तट पर मन्नार द्वीप के बीच चूना पत्थर की एक श्रृंखला है, जिसे ही रामसेतु कहते हैं। इसे ही अब कुछ लोग एडम ब्रिज भी कहते हैं। इस सेतु की लंबाई लगभग 30 मील (48 किमी) है। इस इलाके में समुद्र बेहद उथला है। जिससे यहां बड़ी नावें और जहाज चलाने में खासी दिक्कत आती है।

'साइंस चैनल' ने किया था दावा
साल 2017 में डिस्कवरी कम्युनिकेशंस के 'साइंस चैनल' ने भी इस विषय पर शोध किया था। यह मानव निर्मित है या नहीं? साइंस चैनल ने 'व्हाट ऑन अर्थ' नामक एक शो में प्राचीन रामसेतु पर एक एपिसोड बनाया था। उसके प्रोमो वीडियो में बताया गया था कि यह जो चट्टानें हैं वो एक सैंडबार (बालू) पर हैं। इन जांचकर्ताओं का दावा ​​है कि सैंडबार प्राकृतिक है, लेकिन उस सैंडबार के ऊपर मिलने वाले पत्थर नहीं हैं। भूविज्ञानी डॉक्टर एलन लेस्टर के अनुसार ऐसे पत्थर हैं जिन्हें दूर से लाया गया है और सैंड बार द्वीप श्रृंखला के ऊपर स्थापित किया गया है। इस चैनल के इस वीडियो रिपोर्ट के मुताबिक एक पुरातत्वविद् चेल्सी रोज़ कहती हैं कि रेत के ऊपर की चट्टानें वास्तव में रेत से पहले की हैं। दावा किया गया कि वैज्ञानिक जांच से पता चलता है कि चट्टानें 7,000 साल पुरानी हैं, लेकिन रेत केवल 4,000 साल पुरानी है।

जब सरकार ने दिये अलग अलग बयान
साल 2007 में तत्कालीन केंद्रीय राज्य मंत्री कपिल सिब्बल ने तर्क दिया था कि कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि रामसेतु मानव निर्मित है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि लोगों की आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए।
UPA-1 के समय मनमोहन सरकार ने भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दिया था कि यह पुल एक प्राकृतिक संरचना मात्र है और इसके मानव निर्मित होने का कोई साक्ष्य नहीं है।
वहीं दिसंबर 2022 में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि ये करीब 18000 साल पुराना इतिहास है। ऐसे में हमारी कुछ सीमाएं हैं। जिस ब्रिज (सेतु) की बात हो रही है, वह 56 किलोमीटर लंबा था। स्पेस टेक्नोलॉजी के जरिए हमने पता लगाया कि समुद्र में पत्थरों के कुछ टुकड़े पाए गए हैं, इनमें कुछ ऐसी आकृति है जो निरंतरता को दिखाती हैं। समुद्र में कुछ आइलैंड और चूना पत्थर जैसी चीजें भी मिली हैं। साफ शब्दों में कहा जाए तो ये कहना मुश्किल है कि रामसेतु का वास्तविक स्वरूप वहां मौजूद है। हालांकि कुछ संकेत ऐसे भी हैं, जिनसे ये पता चलता है कि वहां कोई स्ट्रक्चर मौजूद हो सकता है।

1860 में परियोजना पर हुआ था विचार?
BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह कोई नई परियोजना नहीं है। भारत और श्रीलंका के बीच से गुजरने वाली इस परियोजना का प्रस्ताव 1860 में भारत में कार्यरत ब्रितानी कमांडर एडी टेलर ने रखा था। हालांकि, तब इस पर काम क्यों नहीं हुआ इसका कोई जिक्र नहीं है। इसी से प्रेरित होकर यूपीए सरकार ने इसके बारे में विचार किया था। यह चैनल 12 मीटर गहरा और 300 मीटर चौड़ा होगा। इसमें आने और जाने दोनों का मार्ग बनाने का प्लान था।

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