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States’ Revenue Share: राष्ट्रीय आय के वितरण में दक्षिण भारत बनाम उत्तर भारत का विवाद क्यों?

States' Revenue Share: कर्नाटक से कांग्रेस सांसद डी.के. सुरेश ने राष्ट्रीय आय के वितरण में केंद्र पर न्याय नहीं करने का आरोप लगाकर देश के खिलाफ एक बहुत विवादास्पद बयान ने दिया।

उन्होंने कहा कि राजस्व में दक्षिण के हिस्से को काटकर उत्तर के राज्यों को ऐसे ही दिया जाता रहा तो दक्षिणी राज्य अलग देश की मांग करने के लिए मजबूर हो जाएंगे।

Why the dispute of South India vs North India in the distribution of national income?

उनके इस बयान पर बहुत हंगामा मचा और कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर दिया गया। हालांकि कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और सांसद सुरेश के भाई ने यह कह कर मामले को शांत करने की कोशिश की कि डी. के. सुरेश केवल जनता की धारणा की बात कर रहे थे।

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी कहा कि कांग्रेस 'दक्षिण भारत के लिए अलग राष्ट्रीयता की मांग का समर्थन नहीं करती।' राजनीतिक रूप से यह मुद्दा भले ही एक बार फिर टाल दिया जाए, लेकिन विभिन्न मुद्दों विशेषकर राष्ट्रीय आय में वितरण को लेकर साउथ-नॉर्थ के बीच यह विवाद बहुत पुराना है।

31 दिसंबर, 2023 को सोलहवें केंद्रीय वित्त आयोग की नियुक्ति की गई, जिसके अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया को बनाया गया। वह केंद्र और राज्य के बीच प्राथमिक कड़ी के रूप में कार्य करेंगे। संघ और राज्यों के बीच शुद्ध करों और अन्य निधियों का बंटवारा न्यायपूर्ण तरीके से हो, इसके अलावा ग्रामीण और शहरी स्थानीय सरकारों को भी उचित धन का हस्तांतरण हो यह वित्त आयोग की कोशिश होगी। 15वें वित्त आयोग के विवादास्पद संदर्भ को ध्यान में रखते हुए यह काम बहुत सावधानी से करना होगा।

मुख्य रूप से 2011 की जनगणना को आधार बनाने के कारण केंद्र और दक्षिणी राज्यों के बीच कुछ मतभेद हैं, जिनको सुलझाना जरूरी है। 29 अक्टूबर को ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर 15वें वित्त आयोग के कार्यकाल के दौरान राजस्व हानि और कम वित्तीय हस्तांतरण के मामले में कर्नाटक सरकार के साथ हुए अन्याय के बारे में जिक्र कर विवाद को हवा दे दी थी।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने बीजेपी के इस दावे का खंडन किया था कि 2009-14 के मुकाबले 2014-19 के दौरान कर्नाटक के कर हस्तांतरण में 148.26% की वृद्धि और सहायता अनुदान में 129.42% की वृद्धि हुई। भाजपा के बेंगलुरु दक्षिण से सांसद तेजस्वी सूर्या ने यह दावा किया था कि 2014-2023 तक एनडीए शासन के दौरान राज्य को कुल कर हस्तांतरण 2.93 लाख करोड़ रुपये था, जो यूपीए I और यूपीए II शासन के दौरान किए गए संयुक्त हस्तांतरण से काफी अधिक था।

इधर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने एक कन्नड़ दैनिक प्रजावाणी में एक विस्तृत लेख लिखकर केंद्र के सौतले व्यवहार और असमनता के व्यवहार पर सवालों की बौछार कर दी थी। सिद्धारमैया ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने कर्नाटक के लिए शुद्ध कर की हिस्सेदारी 4.72 प्रतिशत से घटाकर 3.64 कर दी है। जिससे राज्य के खजाने को 45,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, जबकि उत्तर प्रदेश को जहां 0.15 पैसे मिलते थे अब 2.73 रुपये मिलते हैं।

यह जनसंख्या के लिए 2011 की जनगणना का उपयोग कर अपनाए गए मानदंडों के कारण है। वित्त आयोग द्वारा उपयोग किए गए नए संकेतकों के कारण दक्षिणी राज्यों को नुकसान हुआ है, जहां जनसंख्या स्थिर है और उस पर नियंत्रण के उपाय किए गए हैं।

दरअसल उत्तर-दक्षिण राजकोषीय विभाजन, शुद्ध कर हस्तांतरण और संघ और राज्यों के बीच कर हस्तांतरण के लिए उपयोग किए जाने वाले मानदडों को लेकर ही विवाद उत्पन्न हुआ है। उच्च कर योगदान और वित्त आयोग के माध्यम से प्राप्त कम धनराशि के बारे में दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्हें जनसंख्या नियत्रण के लिए दंड दिया जा रहा है। वित्त आयोग को इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

तमिलनाडु को छोड़कर, अन्य सभी दक्षिण के राज्यों ने कहा है कि चौदहवें से पंद्रहवें वित्त आयोग के काम के दौरान वित्त के उनके हिस्से में गिरावट आई है। कर्नाटक का हिस्सा 4.7 प्रतिशत से घटकर 3.6 प्रतिशत हो गया है। केरल का हिस्सा 2.5 प्रतिशत से 1.9 प्रतिशत और तेलंगाना का हिस्सा 2.4 प्रतिशत से 2.1 प्रतिशत हो गया है। आंध्र प्रदेश का भी हिस्सा 4.3 प्रतिशत से घटकर 4.1 प्रतिशत हो गया है।
वित्त आयोग के लिए चुनौती राज्यों के बीच संतुलन बनाने और उनकी शिकायतों को समायोजित करने की है। करों के हस्तांतरण के लिए एक ऐसा तर्कसंगत आधार बनाना पड़ेगा जो केंद्र सरकार और राज्यों को संतुष्ट कर सके। साथ ही यह भी लगे कि वित्त आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में काम कर रहा है।

केन्द्रीय वित्त आयोग राज्य वित्त आयोगों की सिफारिशों पर भी ध्यान देना चाहिए ताकि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तनावपूर्ण राजकोषीय संबंधों के बजाय सहकारी संघवाद को मजबूत करने वाले हों। साथ ही समानता और दक्षता के मुद्दों के साथ-साथ सामाजिक न्याय के पहलुओं पर भी ध्यान रखना जरूरी है ताकि गरीब राज्यों को भी समानता पर लाया जा सके।

ब्रुकिंग्स इंडिया में शोध निदेशक पद पर तैनात शमिका रवि का कहना है कि धन वितरण के मामले में पूरे भारत में भिन्नता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में गरीब परिवारों की संख्या सबसे अधिक है। साथ ही भारत के उत्तर और दक्षिण के बीच एक गहन आर्थिक विभाजन है।

भारत में 29 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों के साथ संघीय सरकार प्रणाली है। सभी राज्यों की विकास दर अलग-अलग है। हालांकि देश की औसत वृद्धि दर इस समय काफी अच्छी है, पर राज्यों का प्रदर्शन अलग है। भारत में धन वितरण के मामले में ग्रामीण-शहरी क्षेत्र मे भी अंतर स्पष्ट है। यहां तक कि अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों से बेहतर कुछ शहर ही हैं जो आधुनिक भारत में विकास के सच्चे इंजन हैं।

लेकिन देश में आर्थिक असमानता है। सबसे अधिक गरीब परिवार उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में रहते हैं। ये क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से कम आय वाले बेल्ट का हिस्सा हैं और धीमी गति से बढ़ रहे हैं। हालांकि देश का उत्तर-पूर्वी हिस्सा इस समय केंद्र के लिए प्राथमिकता बन गया है, लेकिन यह दशकों से सुस्त पड़ा हुआ था। ये भविष्य के विकास के पीछे ना छूट जाए, यह देखना भी वित्त आयोग का काम है।

आर्थिक विकास की असमान प्रकृति को देखते हुए, सरकार को क्षेत्रीय असमानताओं के प्रति सचेत रहना होगा और ग्रामीण/शहरी और क्षेत्रीय विभाजनों, यहां तक कि राज्यों के भीतर भी नागरिकों के जीवन की बुनियादी गुणवत्ता के मामले में अंतर को कम करने के प्रयास करने होंगे।

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