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व्यंग्य: गजब हैं ये चित्रकार जो मुंह से रंगते हैं दीवारों को

भारतीय मन के अन्दर एक चित्रकार है और इनकी कला, क्या कहने.. भारतीय चित्रकार मन की तारीफ़ करने बैठूं तो एक बाबरनामे से बड़ी किताब लिख जाये। ऐसे ही थोड़े न हर कोई इसका दीवाना है. और आप देश की क्या बात करते हैं.. विदेशों में चर्चे हैं जनाब.. विदेशी इनकी कला की फ़ोटो खींचे बिना रह ही नहीं पाते तो बरबस ही उनका कैमरा बस इनकी कला को कैद कर लेता है। आप जानते हैं इन कलाकारों को किसी कैनवास या कागज़ की ज़रुरत नहीं है।

Paan Gutkha

इनका कैनवास हर वो जगह है जो ख़ाली है, मुफ्त है और जिसको साफ़ ये नहीं करने वाले हैं. समझे कुछ.. अरे सड़क, सरकारी दीवारों के कोने, टाइल्स, सीढियां, लोहे के पाइप, सड़क के किनारे लगी रेलिंग और सरकारी कूड़ेदान का बाहरी भाग सब कुछ इनका कैनवास ही तो है, इनका प्रिय रंग आप समझ ही गए होंगे.. जी हां..कत्थई रंग, इस रंग में अपनी कला के नमूनों को डुबोकर चित्रकार इस कैनवास को कभी खाली नहीं रहने देता।

बिना ब्रश बना देते हैं आर्ट

जनाब इनके हुनर के क्या कहने, मजाल है कि ये कूंची और ब्रश हाथ में भी पकड़ें, ये केवल अपने मुंह को ही इस कार्य के लिए प्रयोग कर सकते हैं. मुंह में रंग लिए ये सड़कों को कत्थई रंग से रंगते हैं, यदि मेरी बात पर यकीन न हो तो राह चलते किसी भारतीय चित्रकार को गाड़ी को धीमा करके और दायीं या बायीं किसी भी तरफ चित्रकारी करते देख सकते हैं। इससे कोई फरक नहीं पड़ता कि ग़लती से ये रंग किसी और के कपड़ों, मुंह और गाड़ी पर लग सकता है क्यूंकि ग़लती इन कलाकारों की नहीं होती.. हवा की होती है, मुई उसी तरफ़ बह रही होती है।

इंसान भी रंग जाता है इस कला में

कभी-कभी चित्रकार केवल ज़मीन की तरफ देखते हुए मुंह में भरे रंग को बस उलट भर देता है। इस कला में समय की बचत होती है। अगली कला के नमूने में चित्रकार राह में चलते बिना किसी तरफ देखे मुंह में भरा रंग एक लम्बी धार जैसे छोड़ता है, फ़ायदा देखिएगा कि सड़क के साथ-साथ कोई और दीवार या इंसान भी इस कला में रंग जाता है।

ये सब पढ़कर आप सब गर्व और ख़ुशी से भर गए होंगे। हाँ इस कला को न समझ पाने वाले नासमझ लोगों को ग़ुस्सा ज़रूर आ रहा होगा पर जनाब आपने कर क्या लिया। अगर इतना ही बुरा लगता था तो किसी चित्रकार को रोका होता।

लेखक का मन हुआ पुलकित

मुझ लेखक को ही ले लीजिये, ये लिखते हुए इतना अधिक हर्ष हो रहा है कि मन का हर कोना उस कला और कलाकार के दांतों के सफ़ेद से कत्थई हो चुके रंग और उसके ऊपर लिजलिज़ी परत के स्मरण मात्र से पुलकित हो उठा है और भोजन करने की भी इच्छा नहीं हो रही।

अरे हाँ .. मैंने अभी तक आपको ये नहीं बताया ये कला सुन्दर होने के साथ साथ सुगन्धित भी है। इसकी सुगंध के क्या कहने, बस यूँ समझिये कि इससे प्यार न हो जाये इसलिए लोगों को कभी कभार नाक भी बंद करनी पड़ जाती है।

अब तक चित्रकारी करने के लिए उतावले हो चुके इस मन को रोकिये मत, बस अपने घर के पास के किसी खोखे पर चले जाइये, गोल्ड्मोहर, तुलसी, तम्बाकू आदि रंग ले आइये, थोड़े महँगे रंगों से चित्रकारी करना चाहें तो रजनीगंधा, पान विलास, कमला पसंद जैसे विकल्प भी उपलब्ध हैं। इन रंगों को अपने मुंह में रखिये और लार के साथ मिश्रित कीजिये, घर से बाहर निकलिये और सबसे पहले अपने घर की बाहरी दीवार से शुरुआत कीजिये। यकीन जानिये बेहद ख़ूबसूरत लगेगी।

और नासमझ लोगों से मेरी अपील है कि चित्रकारों को अपना काम करने दें क्यूंकि इन्हें रोकने में आप अपना समय गंवाएंगे नहीं और खून जलाने से कुछ होगा नहीं। जैसे आप आज तक चुप रहे हैं.. कृपया अभी भी रहें। पढ़ें- लखनऊ में पान की पीक पर 10 लाख रुपए होते हैं खर्च।

यदि आप भी लिखने का शौक रखते हैं तो भेजें अपने लेख, फोटो के साथ। हमारी मेल आईडी है [email protected], अपना पूर्ण विवरण देना मत भूलियेगा।

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