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Political Murders: क्यों होती है राजनीतिक हत्या, क्या हैं इनके आंकड़े?

Political Murders: हरियाणा के झज्जर में इंडियन नेशनल लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष और बहादुरगढ़ से पूर्व विधायक नफे सिंह राठी की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई।

पांच हमलावरों ने नफे सिंह की कार को घेरकर अंधाधुंध गोलीबारी की। इसमें नफे सिंह के प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड की भी मौत हो गई। हत्याकांड में पूर्व विधायक नरेश कौशिक समेत सात लोगों के खिलाफ नामजद और कुछ अन्य अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

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सुर्खियों में राजनीतिक हत्या

इसके बाद कांग्रेस और आईएनएलडी समेत तमाम विपक्षी दलों ने कानून और व्यवस्था को लेकर हरियाणा की मनोहरलाल सरकार पर जमकर निशाना साधा। वहीं, राज्य सरकार ने मामले की गहराई से जांच और आरोपियों को जल्द गिरफ्तार करने के लिए सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी है। नफे सिंह राठी के बेटे एवं बहादुरगढ़ नगर परिषद के सदस्य जितेंद्र सिंह राठी ने इसे राजनीतिक हत्या करार दिया है।

इस तरह की पोलिटिकल किलिंग पूरी दुनिया में हो रही है। रूस में व्लादिमीर पुतिन के विरोधी एलेक्सी नवलिनी की मौत हो या बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के बड़े नेता अब्दुल सलाम उर्फ असलम मुखिया का मर्डर, 'राजनीतिक हत्या' शब्द सुर्खियों में शामिल रहा है। जानते हैं कि इसका क्या मतलब है और राजनीतिक हत्या को क्यों अंजाम दिया जाता है। इसके अलावा देश में कुछ बड़े राजनीतिक हत्याकांड के बारे में भी जानने की कोशिश करते हैं।

क्या होती है राजनीतिक हत्या

पॉलिटिकल मर्डर, असैसिनेशन या राजनीतिक हत्या का सीधा मतलब राजनीतिक मकसद से किसी राजनैतिक शख्सियत या लोगों की जान लेने से है। ईसा पूर्व 300 साल में चाणक्य ने प्राचीन भारतीय राजनीतिक ग्रंथ अर्थशास्त्र में इसका जिक्र किया है। मगध के सम्राट चंद्रगुप्त और बिंदुसार के सलाहकार रहे चाणक्य ने राजनीतिक कारणों से साजिशन सरेआम या गुप्त रुप से प्रमुख हस्तियों की हत्या करने को राजनीतिक हत्या बताया था। बाद के मध्ययुगीन काल में, कई राजाओं को जहर देकर या धोखे से हत्या करना आम बात थी।

वहीं, द न्यूयॉर्क टाइम्स ने अब्राहम लिंकन की हत्या का उदाहरण देते हुए अक्सर राजनीतिक कारणों से अचानक या गुप्त हमले द्वारा हत्या और हत्या के प्रयास के अलावा प्रतिष्ठा को कम या खत्म करने को राजनीतिक हत्या करार दिया है। अंग्रेजी डिक्शनरी में सबसे पहले साल 1610 में असैसिनेशन शब्द का इस्तेमाल किया गया था।

देश के कुछ प्रमख राजनीतिक हत्याकांड

अपने देश के बारे में बात करें तो वामपंथी दलोंका शासन देख चुके दक्षिण में केरल और पूरब में बंगाल में राजनीतिक हत्याओं का लंबा इतिहास और खून से सना इतिहास मौजूद है। शायद ही कोई राज्य हो जहां राजनीतिक हत्याओं की खबर न आती हो। आजादी के बाद देश की कुछ प्रमुख राजनीतिक हत्याओं की बात करें तो महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, ललित नारायण मिश्र, प्रताप सिंह कैरों, फूलन देवी, बेअंत सिंह, सफ़दर हाशमी, हरेन पांड्या जैसे कई बड़े उदाहरण सामने आते हैं।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो का आंकड़ा

दिसंबर, 2023 में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ओर से जारी साल 2022 के आंकड़ों को देखें तो देश में राजनीतिक कारणों से हत्या की सबसे अधिक वारदात झारखंड में दर्ज की गई। क्राइम इन इंडिया-2022 रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में राजनीतिक कारणों से 59 हत्याएं रिपोर्ट हुईं, इनमें सबसे ज्यादा 17 राजनीतिक हत्याएं झारखंड में हुईं।

रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और त्रिपुरा में राजनीतिक हत्या की सबसे कम घटनाएं रिकॉर्ड की गई। इन तीनों राज्यों में राजनीतिक कारणों से हत्या का एक-एक मामला दर्ज किया गया। झारखंड के बाद बिहार और ओडिशा में राजनीति से प्रेरित हत्या की आठ-आठ वारदातें हुईं। केरल में सात, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में चार-चार और कर्नाटक में राजनीतिक हत्या की दो घटनाएं सामने आई।

इससे पहले एनसीआरबी को बंगाल सरकार की ओर से राज्य में राजनीतिक हिंसा और हत्या की घटनाओं के बारे में गलत आंकड़े दिए जाने की खबर भी आई थी। सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत बंगाल पुलिस से मिली जानकारी और सरकारी आंकड़े में बड़ा फर्क था। एनसीआरबी रिकॉर्ड में केरल के आंकड़े को लेकर भी स्थानीय विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाए थे।

एनसीआरबी ने जुटाया 'राजनीतिक कारणों से हत्या' का डेटा

एनसीआरबी 2017 से राज्यों में हो रही राजनीतिक कारणों से हत्या के मकसद' के आंकड़े इकट्ठा कर रहा है। अगस्त, 2021 को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में साल 2017 और 2019 के बीच हुई राजनीतिक हत्याओं के बारे में बताया था कि इस कारण से देश भर में 230 लोग मारे गए। राजनीतिक कारणों से मारे गए लोगों में झारखंड में 49, पश्चिम बंगाल में 27 और बिहार में 26 लोग थे। साल 2017 में राजनीतिक कारणों से देश में 99 लोग मारे गए, जबकि साल 2018 में देश में राजनीतिक हत्या की 59 वारदात रिकॉर्ड हुई। साल 2019 में सियासी वजहों से 72 लोग मारे गए थे।

ऐसी वारदात को क्यों अंजाम दिया जाता है?

साल 1993 में वोहरा कमेटी की रिपोर्ट और साल 2002 में संविधान के कामकाज की समीक्षा करने के लिये गठित राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) की रिपोर्ट में साफ तौर पर माना गया है कि भारतीय राजनीति में गंभीर आपराधिक बैकग्राउंड वाले लोगों की गिनती बढ़ रही है। लोकसभा चुनाव 2009 से लोकसभा चुनाव 2019 के बीच एक दशक में ऐसे सांसदों की संख्या में कुल 109 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली। गंभीर आपराधिक मामलों में बलात्कार, हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध आदि शामिल हैं।

राजनीति का यह अपराधीकरण देश में राजनीतिक हत्याओं की परिपाटी की यह एक बड़ी वजह है, क्योंकि इसके चलते समाज में भी बाहुबल और धनबल के साथ हिंसा की मानसिकता को बढ़ावा मिलता है। हालांकि, राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट और निर्वाचन आयोग ने कई कदम उठाए हैं, लेकिन वे नाकाफी साबित हुए हैं। इसके लिए कड़े कानूनों के अलावा आम लोगों की शिक्षा और जागरूकता का स्तर बढ़ना बेहद जरूरी बताया जाता है।

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