भाजपा में नमो-नमो जपने नहीं आये हैं एमजे अकबर

"धर्म मेरा इस्लाम है, भारत जन्म स्थान, वजू करुं अजमेर में काशी में स्नान...." ये शब्द भारतीय जनता पार्टी में कुछ ही घंटों पहले शामिल हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक एमजे अकबर पर पूरी तरह फिट बैठते हैं। उनके भाजपा में शामिल होते ही टीवी चैनलों पर बहस छिड़ गई और कईयों ने अकबर को भाजपा का मुस्ल‍िम कार्ड करार दे दिया, जबकि सच पूछिए तो एमजे अकबर को मुसलमान या हिंदू कहना ही गलत होगा, वो एक हिंदुस्तानी हैं और इस समय भाजपा से कहीं ज्यादा हिन्दुस्तान को उनकी जरूरत है।

अपनी इस बात को सिद्ध करने के लिये मैं एक-एक कर कुछ मुद्दे उठाउंगा, जिसमें एमजे अकबर की भूमिका और उनके सामने चुनौतियों की बात करूंगा।

वाराणसी में मोदी को मजबूती देंगे अकबर

अकबर ने भाजपा ज्वाइन करते ही कहा, कि वो राजनीति में नीति के लिये आये हैं, राज करने नहीं। अकबर की पर्सनालिटी भी कुछ ऐसी ही है। वो जब किसी के साथ काम करते हैं, तो पूरी पारदर्श‍िता बरतते हैं और निष्पक्ष होकर काम करते हैं। भाजपा में उनके आने का यह मतलब नहीं कि वो भी अन्य नेताओं की तरह नमो-नमो जपने लगेंगे। इतिहास के पन्ने पलटें तो कांग्रेस के टिकट पर किशनगंज से सांसद बनने के बाद भी वो राजीव गांधी समेत किसी भी कांग्रेसी की गलत बात को कभी नहीं मानते थे। अब वो मोदी को मजबूती प्रदान करने में अहम भूमिका निभायेंगे।

ये नमो है राजीव नहीं अकबर साहब

अब राजीव गांधी की बात आयी है, तो हम अकबर से कहना चाहेंगे कि जब वो कांग्रेस के साथ थे, तब राजीव गांधी का बोलबाला था, आज नरेंद्र मोदी का है। तब हर गली-चौबारों पर राजीव का नाम होता था, तो आज मोदी का है, लेकिन चुनावी खेल के परिणामों में अंतर अभी से साफ नजर आ रहा है। उस वक्त राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 384 सीटें जीती थीं, आज मोदी के नेतृत्व में भाजपा की 272 भी पूरी नहीं होती दिख रही हैं। तब अकबर कुछ खास नहीं कर पाये। उसे अनुभव की कमी कह सकते हैं, लेकिन आज अकबर के पास अनुभव है, इसलिये उनसे देश को खासी उम्मीदें हैं।

भाजपा से ज्यादा भारत की जरूरत

एमजे अकबर की सामर्थ, त्याग, अध्ययन, परिश्रम और कठोर जीवन ही उनकी शक्त‍ि है। वे उन गिने चुने मुसलमान राष्ट्रवादियों में से एक हैं, जो सोचते हैं इस देश का मुसलमान विभाजन के बाद पहले, दूसरे नहीं बल्क‍ि तीसरे दर्जे का नागरिक बन कर रह गया है। अकबर वो व्यक्त‍ि हैं जो भारतीय मुसलमान के दु:ख, दर्द, तकलीफ, जरूरतों को करीब से समझते हैं। अगर उन्हें मुसलमानों की श्रेणी में रखा जाये, तो उन्हें फिलटर्ड मुसलमान कहना गलत नहीं होगा।

इस फिलटर्ड मुसलमान के माध्यम से भाजपा का वोट बैंक पक्का हो या नहीं हो, लेकिन हां अगर भाजपा सत्ता में आयी, तो एमजे अकबर की मदद से वो देश के मुसलमानों के उत्थान के लिये कुछ कर पाने में सक्षम जरूर हो पायेगी। और जिस दिन देश की 25 करोड़ जनसंख्या तकलीफों से बाहर निकल आयी, उस दिन देश को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक पायेगा। अकबर के माध्यम से भाजपा उन मुसलमानों के दिल में जगह बना सकती है, जिनके लिये वो अछूत है।

देखें भाजपा के funny videos उससे पहले स्लाइडर में अकबर के जीवन से जुड़ी रोचक बातें-

अकबर की पत्नी ईसाई, बच्चे हिन्दू

अकबर की पत्नी ईसाई, बच्चे हिन्दू

अकबर मुसलमान हैं, उन्होंने ईसाई धर्म की मल्लिका जोसफ से शादी की और अपने बेटे-बेटी के हिन्दू नाम रखे- प्रयाग और मुकुलिका।

तब नेहरू के मुरीद थे अब मोदी के

तब नेहरू के मुरीद थे अब मोदी के

एमजे अकबर 1989 में राजनीति में आये। उनके कांग्रेस में शामिल होने का मुख्य कारण यह था कि वो पं. जवाहर लाल नेहरू के फैन हुआ करते थे। जब उनका लोगों ने विरोध किया तो अकबर ने कहा, "जिस आदमी का हर एक दिन इतिहास बनाता हो, उससे एक दिन गलतियां होती हैं तो वो भी इतिहास बनाती हैं इसलिये उन्हें क्षमा कर देना चाहिये।" तब नेहरू थे आज मोदी हैं, विचारधारा बदली या नहीं यह अकबर ही बता सकते हैं।

आडवाणी और अकबर की पसंद एक

आडवाणी और अकबर की पसंद एक

एमजे अकबर और लाल कृष्ण आडवाणी ने दो अलग-अलग इंटरव्यू बीबीसी को दिये, जिन पर दोनों ने अपनी पसंद एक ही बतायी। दोनों का पसंदीदा गीत है, "मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया...।" अब बात पसंद की आ ही गई है, तो हम आपको बता दें कि एमजे अकबर अंग्रेजी के विद्यार्थी रहे, लेकिन उनका पसंदीदा विषय हमेशा से इतिहास रहा।

बड़े अखबारों के स्तंभ बने

बड़े अखबारों के स्तंभ बने

1971 में टाइम्स ऑफ इंडिया से करियर की शुरुआत की। उसके बाद इलस्ट्रेडड वीकली ऑफ इंडिया, ऑनलुकर, संडे, आनंद बाजार पत्रिका, दि टेलीग्राफ के साथ उनका सफर जारी रहा। अकबर ने इंडिया टुडे के सर्कुलेशन को शीर्ष तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई। उससे पहले, एश‍ियन एज, संडे गार्जियन, डेक्कन क्रॉनिकल शामिल हैं।

राजीव गांधी के प्रवक्ता एवं केंद्र के सलाहकार

राजीव गांधी के प्रवक्ता एवं केंद्र के सलाहकार

अकबर 1991 में राजीव गांधी के प्रवक्ता बने और उसके बाद मानव संसाधन मंत्रालय में सलाहकार की भूमिका निभाई।

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