Amarmani Tripathi: कौन हैं अमरमणि त्रिपाठी, जिसे ‘लव और मर्डर’ केस में मिली उम्रकैद, अब रिहाई
Amarmani Tripathi: पूर्वांचल के डॉन कहे जाने वाले हरिशंकर तिवारी के राजनीतिक वारिस रहे अमरमणि त्रिपाठी का जलवा ऐसा था कि सरकार किसी भी हो, हर कैबिनेट में उनकी सीट होती थी। यूपी की राजनीति में वह कभी सपा, कभी बसपा और कभी भाजपा के साथ रहकर सत्ता में रहे। हालांकि, मधुमिता हत्याकांड के बाद उनके सितारे गर्दिश में चले गये।
साल 2003 में, लखनऊ की पेपर मिल कॉलोनी में 9 मई को कवयित्री मधुमिता शुक्ला की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। इस हत्याकांड का दोषी यूपी के पूर्व कैबिनेट मंत्री अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि को ठहराया गया था। ये दोनों कई सालों से गोरखपुर जेल में बंद है और आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं।

अब उनके अच्छे आचरण की वजह से उनकी शेष सजा समाप्त कर दी गयी है। उत्तर प्रदेश राज्यपाल की अनुमति से कारागार प्रशासन एवं सुधार विभाग ने इसका आदेश जारी किया है। दोनों को अब 20 साल बाद रिहा किया जायेगा।
आखिर कौन हैं अमरमणि त्रिपाठी
अमरमणि त्रिपाठी ने अपनी राजनीति की शुरुआत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) से की थी। इसके बाद वह कांग्रेस में आ गये। तब अमरमणि ने कांग्रेस के दिग्गज व पूर्वांचल के बाहुबली कहे जाने वाले नेता हरिशंकर तिवारी को अपना राजनीतिक गुरू माना। कहते है राजनीति का पाठ अमरमणि त्रिपाठी ने हरिशंकर तिवारी से सीखा था।
राजनीति में आने से पहले अमरमणि त्रिपाठी का नाम अपराध की दुनिया में चल पड़ा था। उन पर हत्या, लूट और मारपीट जैसे कई मामले दर्ज थे। तत्कालीन विधायक वीरेंद्र प्रताप की हत्या के बाद 1989 में कांग्रेस टिकट पर महाराजगंज की नौतनवा विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे और विधायक बने। लेकिन, एक साल बाद 1991 में हार गये। इसके बाद लगातार तीन चुनाव 1996 (कांग्रेस), 2002 (बसपा) और 2007 (सपा) के टिकट पर अमरमणि विधानसभा पहुंचे।
साल 1997 में कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में वह पहली बार मंत्री बने। लेकिन एक अपहरण मामले को लेकर अमरमणि को मंत्री पद से हटा दिया गया। साल 2002 में अमरमणि बसपा में चले गये। साल 2002 में मायावती की सरकार बनाने में सहयोग करके मंत्री बने लेकिन हत्याकांड में फंसने के बाद साल 2003 में सपा ज्वाइन करके मायावती की सरकार गिरवा दी।
क्या है मधुमिता हत्याकांड?
साल 2003 में जब बसपा की सरकार थी, तब अमरमणि त्रिपाठी मंत्री पद पर थे। उन दिनों मधुमिता नाम की एक वीर रस की ओजपूर्ण कवियत्री हुआ करती थीं। अपने तेज तर्रार अंदाज के लिए मशहूर मधुमिता प्रधानमंत्री समेत कई बड़े नेताओं को अपने निशाने पर रखती थी। इसी प्रसिद्धी के कारण उनकी मुलाकात अमरमणि त्रिपाठी से हुई। शादीशुदा अमरमणि को मधुमिता पसंद आ गई और दोनों के प्रेम संबंध बन गए।
तभी 9 मार्च 2003 को मधुमिता को घर में घुसकर दो लोगों (संतोष राय और प्रकाश पांडे) ने गोली मारकर हत्या कर दी। आरोप लगा कि यह हत्या अमरमणि ने करवाई थी। क्योंकि, मधुमिता की मौत के बाद उसके कमरे से एक खत मिला था। उसमें लिखा था, 4 महीने से मैं मां बनने का सपना देखती रही हूं, तुम इस बच्चे को स्वीकार करने से मना कर सकते हो पर मैं नहीं, क्या मैं महीनों इसे अपनी कोख में रखकर हत्या कर दूं? तुमने (अमरमणि त्रिपाठी) सिर्फ मुझे उपभोग की वस्तु समझा है।
मधुमिता की हत्या के बाद कोख में मर चुके बच्चे का डीएनए टेस्ट करवाया गया। उसका मिलान अमरमणि त्रिपाठी के डीएनए से हुआ तो दोनों एक ही मिले। इस हत्याकांड के बाद मायावती ने अमरमणि को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया।
देहरादून फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सुनाई सजा
इस हत्याकांड पर खूब हंगामा हुआ और तकरीबन 20 दिन बाद यह मामला सीबीआई को सौंपा गया। गवाहों से पूछताछ हुई तो कोई अमरमणि के खिलाफ बोलने को राजी नहीं हुआ। तभी मधुमिता की बड़ी बहन सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं। उन्होंने याचिका दायर करते हुए कहा कि इस केस को लखनऊ से दिल्ली या तमिलनाडु ट्रांसफर कर दी जाये। कोर्ट ने 2005 में केस उत्तराखंड ट्रांसफर कर दिया। इस मामले में देहरादून की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 24 अक्टूबर 2007 को अमरमणि और उनकी पत्नी मधुमणि समेत पांच लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके खिलाफ अमरमणि त्रिपाठी नैनीताल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट गये, लेकिन सजा बरकरार रही।
जेल से जीता चुनाव
अमरमणि त्रिपाठी का राजनीतिक आतंक इतना था कि आरोप लगने के बाद भी वह जेल में रहते हुए विधायक चुने गये। साल 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर अपने बेटे अमनमणि को प्रत्याशी बनाया। हालांकि, कौशल किशोर ने उन्हें 7,837 वोटों से हरा दिया। इसके बाद 2017 के चुनाव में सपा ने जब अमनमणि को टिकट नहीं दिया तो वह निर्दलीय मैदान में उतरे और इस बार कौशल किशोर को 32,256 वोटों से हरा दिया।
अपने प्रभाव के चलते अमरमणि ने हरिद्वार की रौशनाबाद जेल से अपना और अपनी पत्नी मधुमणि का गोरखपुर जेल में तबादला करा लिया था। 4 दिसंबर 2008 को मधुमणि और 13 मार्च 2012 को अमरमणि गोरखपुर जेल आ गये थे। वहीं इस दौरान वे जेल में कम रहे और गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में इलाज के नाम पर सालों से भर्ती थे। जब अमरमणि की बेटी की सगाई दिल्ली में थी, तब पैरोल पर जमानत नहीं मिली, तो 16 फरवरी 2019 को बीआरडी मेडिकल कॉलेज में तबीयत खराब होने का बहाना बनाया और दिल्ली एम्स में रेफर करवा लिया। जहां पर 17 फरवरी 2019 को उनकी बेटी की सगाई हुई थी। अब पति पत्नी दोनों की रिहाई के आदेश हो गए हैं।
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