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Meo of Mewat: कौन हैं मेव, कहां से आए, क्या है उनका इतिहास?

Meo of Mewat: यदि कोई अचानक पूछ ले कि भारत का ईरान किस इलाके को कहते हैं तो बहुत ही कम लोग होंगे जिनके माथे पर बल नहीं पड़ेगा और वे तुरंत जवाब दे सकेंगे - मेवात। पश्चिमी यूपी के कुछ हिस्से, हरियाणा और पूर्वी राजस्थान यानी कथित अहीरवाल लैंड और दिल्ली के काफी नजदीक तक फैला इलाका जिसमें मेव समुदाय निवास करता है। मेव आबादी की वजह से ही इलाके को मेवात कहते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि मेवात इलाके की वजह से मेव समुदाय खुद को मेवाती भी कहता है। यह समुदाय इन दिनों फिर से सुर्खियों में है। हरियाणा के नूंह जिले में ब्रजमंडल जलाभिषेक यात्रा पर हमले के बाद कई इलाके में फैले सांप्रदायिक हिंसा के चलते मेव समुदाय ने देश और दुनिया की दिलचस्पी बटोरी है कि मेव कौन हैं, मेव कहां से आए और उनका इतिहास क्या है?

मेव कौन हैं, क्या है उनका सामाजिक ढांचा

भारत के सबसे बड़े राज्य रहे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक वक्त 'अजगर' शब्द और समीकरण ने विश्लेषकों को काफी बौद्धिक खुराकें मुहैया कराई थी। मेव समुदाय भी अपना इतिहास इसी से जोड़ता है, हालांकि इस समीकरण की पैदाइश से कई सौ साल पहले से। जानकार बताते हैं कि मेव समुदाय नहीं बल्कि संगठन है।

Who are Meo, where did they come from, what is their history?

चार प्रमुख युद्धप्रिय, लड़ाके या जुझारू कही जाने वाली जातियों अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत (अजगर) के प्रभाव इस समुदाय में पाए जाते हैं। ये चारों जातियां हिंदू हैं। इसलिए ऐतिहासिक तौर पर मेवों का इतिहास भी मूलत: हिंदू रहा है। बाद के दिनों में क्षेत्रीय पहचान पर मजहब हावी होता गया और इस समुदाय का मजहब हो गया इस्लाम।

मेव मुसलमानों का इतिहास, अनेक प्रकार की धारणाएं

अपने इतिहास पर चर्चा करते हुए मेव मुसलमानों की ओर से कई तरह की धारणाएं सामने आती हैं। सामाजिक और भौगोलिक इतिहास के अलावा मेव मुसलमान खुद को आर्यों के आक्रमण से जोड़ कर प्राचीन नस्ल साबित करने की कोशिश करते दिखते हैं। सैकड़ों साल पहले का असली क्षत्रिय बताते हुए कुछ मेव खुद को तोमर और कछवाहा वंश का बताते हैं। हालांकि इस्लाम से इनकी नजदीकी बढ़ने का इतिहास 19वीं सदी के आखिर के वर्षों का बताया जाता है। कुछ मेव मीणा और अन्य आदिवासी समुदायों से आने की थ्योरी भी देते हैं।

कैसे इस्लाम मानने लगे मेव, धर्मांतरण की प्रक्रिया

पंजाब यूनिवर्सिटी, पटियाला के पब्लिकेशन ब्यूरो से प्रकाशित 'पंजाब : पास्ट एंड प्रेजेंट' के अप्रैल 2007 के अंक में 'प्रोसेस ऑफ मेव्स कन्वर्जन टू इस्लाम' में वायएमडी कॉलेज, नूंह, मेवात में इतिहास के प्रोफेसर एजाज अहमद ने कई किताबों, रिसर्च जर्नल और इतिहासकारों के दावे के आधार पर मेद समुदाय का जिक्र किया है। उनके अनुसार इन लोगों को सिंध के देबल इलाके में दबदबा रखने वाला बताया गया है। प्रोफेसर अहमद ने इस समुदाय को कृषक, समुद्री लुटेरे, लड़ाके और विद्रोही साबित किया है। उनका कहना है कि इस्लाम के प्रभाव में आने के बाद यह समुदाय मेव कहलाने लगा। उनका मानना है कि खुद के लिए खतरा मानते हुए ब्रिटिश गवर्मेंट ने मेव के असर वाले मेवात को कई प्रशासनिक सूबों में बांट दिया।

सालार मसूद गाजी की वजह से हुआ धर्मांतरण

मेव स्कॉलर मौलाना हबीबुर्रहमान खान का दावा है कि दूसरी शताब्दी में मेद समुदाय ने सिंध से अरावली पर्वतीय क्षेत्र की ओर आकर ठिकाना बनाया और यह इलाका पहले मेद-पत और बाद में मेवात कहलाया। खान ने सिंध के मशहूर राजा दाहिर के पिता राजा चच की जीवनी 'चचनामा' के आधार पर उनके बुद्धिस्ट होने का दावा भी किया है। हालांकि इतिहासकार जेम्स टॉड और शम्सुद्दीन शम्स ने मेर, मेद या मेव को शुरुआत से हिंदू करार दिया है।

भारत में इस्लाम की शुरुआत हिजरी संवत 93 या ईस्वी 712 में मोहम्मद बिन कासिम के साथ हुई। सिंध के राजा दाहिर के मारे जाने के बाद वहां इस्लाम को कबूलने वालों में मेव समुदाय भी शामिल था। इसके बाद ईस्वी 1012 में मोहम्मद गजनवी के आक्रमण के बाद फिर इस्लाम को लागू किए जाने में तेजी आई। खलीफा की ओर से उसके साथ भेजे गए इस्लाम के प्रचारक शेख अबू शकूर और गजनवी का भांजा सालार मसूद गाजी ने भी इस्लाम अपनाने के लिए लोगों को प्रभावित किया। इसके बाद मोहम्मद गोरी, कुतुबुद्दीन ऐबक ओर इल्तुतमिश के दौरान भी बड़ी संख्या में मेव लोग मुसलमान बनते गये।

इसके अलावा मेवों के बड़े पैमाने पर इस्लामीकरण में सूफी ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर) की भी भूमिका है। दूसरी ओर मेव समुदाय पर सबसे अधिक जुल्म करने वालों में उलुग खान या बलबन का नाम इतिहास में दर्ज है। मेव समुदाय का मानना है कि औरंगजेब ने इस्लाम मानने वाले इस समुदाय को लगभग नजरअंदाज किए रखा था।

मेव क्या मुसलमान... कहने वाले कैसे हुए कट्टरपंथ के शिकार

इस्लामीकरण के इतिहास के हजार साल तक मेव क्या मुसलमान वाला जुमला बीसवीं सदी की शुरुआत में बदलने लग गया। यह दौर था आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानंद के शुद्धि अभियान के जवाब में मेवात इलाके में कट्टर तबलीगी जमात सक्रिय होकर मेव लोगों को सच्चा और पक्का मुसलमान बनाने के मिशन में लग गया। 19वीं सदी के अंत यानी 1896 में अलवर में गठित अंजुमन ए इस्लाम ने बीसवीं सदी की शुरुआत में पूरे इलाके में मजहबी तालिम शुरू की।

1923 में स्थापित किए गए अंजुमन-ए-खादिम-उल-इस्लाम ने उर्दू का खूब प्रचार प्रसार करना तेज कर दिया। इसी साल यानी 1923 में ही गुड़गांव के डिप्टी कमिश्नर फ्रैंक लुगार्ड ब्रायन ने मेयो हाई स्कूल की स्थापना की और अंग्रेजों के 'डिवाइड एंड रूल' एजेंडा ने मेव को और ज्यादा मुसलमान बना दिया। इसके चलते ही शायद 1932 में इलाके में दो बड़े दंगे हुए। पहला मई महीने की 17 तारीख को मुहर्रम के जुलूस के दौरान। इसकी वजह तबलीगी जमात को बताया गया। दूसरी बार दिसंबर में जब दिलावर खान ने हिंदुओं को घेर लिया और अलवर स्टेट को सेना भेजनी पड़ी। इसके बाद बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक अगले ही साल 1933 में मेव मुसलमानों द्वारा बंधक बनाए गए बनिया जाति के कई लोगों को छुड़ाने के लिए ब्रिटिश आर्मी को बल प्रयोग करना पड़ा और उसमें 100 लोगों की जान चली गई थी ।

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