Supreme Court Judgements: जब सुप्रीम कोर्ट ने पलटे अपने ही आदेश, एक जैसे मामलों में अलग-अलग निर्णय
एक जैसे दो केस, मगर देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में दिया एक फैसला तो दूसरे में दिया उसके विपरीत निर्णय।

सुप्रीम कोर्ट देश की सर्वोच्च अदालत है। यहां आने वाले मामलें आमतौर पर वही होते हैं जिन्हें निचली अदालतों और हाईकोर्ट्स से कोई राहत नहीं मिलती। इसलिये सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षा की जाती है कि वह पूरी ईमानदारी के साथ निर्णय देगा। गौरतलब है कि इस अदालत के किसी भी फैसले के खिलाफ किसी और न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती। इस बीच यहां सवाल ये उठता है कि अगर सुप्रीम कोर्ट अपने एक फैसले के खिलाफ ही दूसरा फैसला दे तो न्याय व्यवस्था के लिए किसका दरवाजा खटखटाया जा सकता है? हम आपको कुछ ऐसे ही केस के बारे में बतायेंगे, जहां सुप्रीम कोर्ट का फैसला, अतीत में दिये अन्य फैसले को गलत साबित करता हो।
हल्द्वानी पर दया बाकी जगह 'खाली करो'
सबसे ताजा फैसला उत्तराखंड के हल्द्वानी का है। उत्तराखंड के हल्द्वानी के बनभूलपुरा में रेलवे की 78 एकड़ जमीन से लगभग 4,000 परिवारों को बेदखल करने के उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि यह एक मानवीय मामला है। हमें कोई व्यावहारिक समाधान ढूंढना होगा। समाधान का यह सही तरीका नहीं है। जमीन की प्रकृति, अधिकारों की प्रकृति, मालिकाना हक की प्रकृति आदि से पैदा होने वाले कई कोण हैं, जिनकी जांच होनी चाहिए।
वहीं, मुंबई में जनवरी 2022 में रेलवे की जमीन यानि पटरियों के किनारे कुल 13,000 अतिक्रमण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अवैध निर्माण के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं किए जाने को लेकर संबंधित मंत्रालय को जबरदस्त फटकार लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय शहरी निकायों के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए, जिनके कर्तव्य में लापरवाही के कारण सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जा हो गया था।
इसी तरह साल 2021 के दिसंबर में भी गुजरात और हरियाणा के कुछ इलाकों में रेलवे की जमीन पर हुए अतिक्रमण पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की थी। तब कोर्ट ने रेलवे को अपने संपत्तियों को लेने के लिए झुग्गीवासियों (अतिक्रमण) को वहां से हटाने की अनुमति दी थी।
जमीन अधिग्रहण पर जब SC बनाम SC हो गया था
साल 2014 में पुणे नगरपालिका द्वारा जमीन अधिग्रहण से संबंधित एक मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इस केस में 24 जनवरी 2014 को न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा, मदन लोकुर और कुरियन जोसफ की तीन-सदस्यीय पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि सिर्फ सरकारी खजाने में हर्जाने की राशि जमा कर देने भर को जमीन मालिकों को किया गया भुगतान नहीं माना सकता है। ऐसे में नगरपालिका द्वारा किया गया अधिग्रहण रद्द हो जायेगा।
वहीं 8 फरवरी 2018 को अन्य तीन जजों वाली पीठ के सामने एक और केस इंदौर विकास प्राधिकरण द्वारा जमीन अधिग्रहण का आया। तब न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, आदर्श गोयल और मोहन शान्तनागोदर वाली इस पीठ ने फैसला दिया कि राशि जमा नहीं होने से अधिग्रहण रद्द नहीं होगा। इसका मतलब ये था कि जब प्राधिकरण जमीन अधिग्रहण के पैसे लेकर जाती है और जमीन मालिक या तो पैसे लेने से इंकार कर देता है या गायब होता है तो ऐसे हालात में अधिग्रहण रद्द नहीं माना जायेगा। यानि यहां सुप्रीम कोर्ट ने पुणे नगरपालिका वाले फैसले से बिलकुल विपरीत फैसला सुनाया। साथ ही इस पीठ ने अपने फैसले में यह भी कहा कि उस मामले में फैसला देते वक्त सभी तथ्यों का ख्याल नहीं रखा गया था।
हालांकि, इन दोनों मामलों को साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने निरस्त कर दिया क्योंकि ये फैसले आपस में एक-दूसरे को काट रहे थे। तब इसके बाद भू-अधिग्रहण कानून की धारा 24 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से व्याख्या दी।
कश्मीरी पंडितों पर 'ना', गुजरात पीड़िता पर 'हां'
कश्मीरी पंडितों के 'नरसंहार' के मुद्दे पर दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से साफ इंकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 700 हत्याओं व बलात्कारों की जांच फिर से कराने से इंकार करते हुए याचिका ही खारिज कर दी थी। वहीं साल 2017 में भी 1989-90 के दौरान कश्मीरी पंडितों की सामूहिक हत्या की स्वतंत्र जांच की मांग को सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका था।
बता दें कि 2022 में भारत के न्यायाधीश धनंजय वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और एस अब्दुल नजीर की पीठ ने कश्मीरी पंडितों के समर्थन में दायर याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया था। जबकि 27 अप्रैल 2017 को तत्कालीन CJI जेएस खेहर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने सुनवाई करते हुए कहा कि हम भारत के संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत इस याचिका पर विचार करने से इंकार करते हैं। इस घटना को 27 साल हो गए, साक्ष्य उपलब्ध होने की संभावना नहीं है। जबकि दूसरी तरफ साल 2022 के ही दिसंबर महीने में गुजरात दंगे की पीड़िता की ओर से 11 दोषियों की रिहाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। तब चीफ जस्टिस के सामने यह मुद्दा उठाते हुए उनकी रिहाई और सजा में छूट को चुनौती दी गई। तब चीफ जस्टिस ने कहा कि इस मुद्दे पर फैसला लेंगे।
यहां गौर करने वाली बात ये है कि गुजरात दंगा भी तकरीबन 20 साल पहले हुआ था। अगर एक तरह से देखा जाए तो दोनों मामला दंगों में हत्या और रेप से ही जुड़ा है। एक और बात यहां बताते चले कि कश्मीर पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इंकार कर दिया लेकिन गुजरात दंगे के 9 में से 8 केस की सुनवाई पूरी होने के बाद बंद कर दी गई है। एक केस का मामला लंबित है। 9 मामलों में से केवल नारोदा गांव इलाके में हुई हिंसा का मामला अभी भी लंबित है।












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