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जब दूरदर्शन ने ‘द जंगल बुक’ के थीम सॉन्ग से 'चड्डी' शब्द हटाने को कहा और गुलजार ने मना कर दिया था!

उम्र जाया कर दी लोगों ने, औरों में नुक्स निकालते-निकालते, इतना खुद को तराशा होता, तो फरिश्ते बन जाते... ये पंक्तियां एक ऐसे शख्स की हैं जिसे हर कोई बखूबी जानता है।

हाल ही में गुलज़ार साहब को 58वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित करने का ऐलान किया गया है। ज्ञानपीठ चयन समिति ने उर्दू के लिए उन्हें यह सम्मान देने की घोषणा की है। जी हां हम बात कर रहे हैं सदी के बेहतरीन गीतकार, फिल्म निर्देशक गुलजार साहब की। बहुत से लोग नहीं जानते होंगे कि उनका वास्तविक नाम सम्पूर्ण सिंह कालरा है। आइए गुलजार साहब के बारे में ऐसी कुछ रोचक बातें जानते हैं।

gulzar

सम्पूर्ण सिंह कालरा ऐसे बने गुलजार

सम्पूर्ण सिंह कालरा के पिता और भाई नहीं चाहते थे कि वो राइटिंग का काम करें, लेकिन उन्हें बचपन से ही लिखने का बेहद शौक था। वो बचपन में जब घर पर कुछ लिखने की कोशिश करते तो उन्हें घरवालों से बहुत डांट पड़ती थी।

जब वे पढ़ाई करने के बाद मुंबई आए तो एक गैरेज में बतौर मैकेनिक का करना शुरू किया। साथ ही खाली समय में शौकिया तौर पर कविताएं लिखते थे। वैसे हर शायर अपना एक अलग नाम रखता है तो इन्होंने भी कुछ ऐसा ही किया और अपनी रचनाओं में अपना नाम सम्पूर्ण सिंह कालरा की जगह 'गुलजार दीनवी' कर लिया।

दीना के रहने वाले थे तो दीनवी लिखा और गुलजार का मतलब ऐसी जगह जहां फूलों का बाग होता है। बाद में दीनवी हटा दिया और सिर्फ गुलजार के नाम से अपनी रचनाएं लिखने लगे और 'गुलजार' नाम मशहूर हो गया। शुरुआत में हिंदी सिनेमा के मशहूर निर्देशक बिमल राय, हृषिकेश मुखर्जी और हेमंत कुमार के सहायक के रूप में काम करने लगे।

1963 में मिला गीतकार गुलजार को पहला मौका

1963 में आई फिल्म 'बंदिनी' के गीत 'मोरा गोरा अंग लइ ले, मोहे श्याम रंग दई दे' से गुलजार साहब ने फिल्मी दुनिया में बतौर गीतकार कदम रखा। ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों के स्क्रीन प्ले और गीतों ने गुलजार को बेहद कामयाब बनाया। इसमें आशीर्वाद, आनंद और गुड्डी जैसी बेहतरीन फिल्में शामिल हैं। आनंद के लिए गुलजार साहब को पहली बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था।

गुलजार बतौर निर्देशक भी काफी कामयाब हुए। उनकी फिल्मों में मेरे अपने, परिचय, कोशिश, अचानक, माचिस, और आंधी शामिल हैं। फिल्म माचिस के बाद उन्होंने अपना ध्यान सिर्फ लेखनी पर ही रखा। तुझसे नाराज़ नहीं जिन्दगी, मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने, तेरे बिना जिंदगी से कोई, नाम गुम जाएगा, बीड़ी जलइले, दिल तो बच्चा है जी जैसे सदाबहार गीत गुलजार के लिखे हजारों गीतों में शामिल हैं।

'जंगल-जंगल बात चली है' भी गुलजार साहब ने लिखा था

गुलजार साहब एक ऐसे फनकार रहे हैं जिन्होंने हर उम्र के लिए लिखा है। एनिमेटिड सीरीज "द जंगल बुक" में लिखा गया उनका थीम सॉन्ग 'जंगल-जंगल बात चली है, पता चला है, चड्डी पहन के फूल खिला है' दर्शकों को काफी पसंद आया था। इसके म्यूजिक कंपोजर थे विशाल भारद्वाज।

विशाल भारद्वाज ने एक इंटरव्यू में बताया था कि इस थीम सांग में गुलजार साहब द्वारा लिखा गया 'चड्डी' शब्द दूरदर्शन के अधिकारियों को ठीक नहीं लगा था और उन्होंने इसकी जगह कोई दूसरा शब्द लेने को कहा था। तब गुलजार साहब ने दूरदर्शन के अधिकारियों से कहा था कि गंदगी आपके दिमाग में है, इस शब्द में नहीं और आपको ये गाना लेना है तो ऐसे ही लेना होगा नहीं तो वे कुछ नहीं लिखेंगे। बाद में दूरदर्शन अधिकारी मान गये और गाना ऐसा लोकप्रिय हुआ कि बच्चे बच्चे की जुबान पर आ गया।

प्रेम विवाह और जुदाई पर रहे हमेशा साथ

इनकी बेटी और फिल्म निर्देशक मेघना गुलजार ने पिता के जीवन पर 'बिकॉज ही इज' नामक किताब लिखी है। इसमें उन्होंने अपने पिता की शादी के बारे में विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने किताब में लिखा कि 18 अप्रैल, 1973 को गुलजार साहब और राखी ने आपस में प्रेम विवाह किया। इस शादी में उस समय के तमाम दिग्गज शरीक हुए थे। अभिनेता सुनील दत्त राखी के भाई बने थे और एसडी बर्मन और जीपी सिप्पी परिवार की देखरेख में ये शादी संपन्न हुई थी।

एक साल बाद 1974 में राखी और गुलजार दोनों की राहें अलग हो गईं, लेकिन इसके बाद दोनों ने एक दूसरे का साथ हमेशा ऐसे निभाया है कि पता ही नहीं चलता कि दोनों अलग-अलग रह रहे हैं। अगस्त 2020 में एक मशहूर पत्रिका को दिए इंटरव्यू में राखी ने कहा था कि हम दोनों को अलग-अलग रहने वाले बेस्ट कपल का अवॉर्ड मिलना चाहिए। हम लोग अधिकांश शादीशुदा जोड़ों से कहीं अधिक तालमेल बिठाकर रहते आए हैं। गुलजार और मैं, एक दूसरे के लिए हमेशा उपलब्ध रहते हैं।

अब तक मिल चुके हैं ये पुरस्कार और सम्मान

गुलजार साहब को अब तक कुल 36 पुरस्कार और सम्मानों से नवाजा जा चुका है। जिसमें 5 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, 22 फिल्म फेयर अवार्ड, मध्य प्रदेश सरकार से राष्ट्रीय किशोर कुमार सम्मान, सर्वश्रेष्ठ मूल गीतों के लिए अकादमी पुरस्कार, ग्रैमी अवार्ड, उर्दू के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार शामिल हैं। अब इस लिस्ट में साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार ज्ञानपीठ भी शामिल हो गया है।

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