Censor Board: क्या है सेंसर बोर्ड और उसकी शक्तियां, जानें फिल्मों के सर्टिफिकेशन की प्रकिया
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने फिल्म '72 हूरें' जो धर्मांतरण, आतंकी साजिश और लोगों के ब्रेनवॉश के बैकग्राउंड में बनी है, उसके ट्रेलर को सर्टिफिकेट देने से इंकार कर दिया है।
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने फिल्म '72 हूरें' जो धर्मांतरण, आतंकी साजिश और लोगों के ब्रेनवॉश के बैकग्राउंड में बनी है, उसके ट्रेलर को सर्टिफिकेट देने से इंकार कर दिया है। सीबीएफसी का यह फैसला हैरान करने वाला इसलिए है, क्योंकि पहले बोर्ड ने फिल्म को रिलीज के लिए हरी झंडी दी थी। अब उसी फिल्म के ट्रेलर को पास करने से इंकार कर दिया है।
दरअसल केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को सेंसर बोर्ड भी कहा जाता है। यह भारतीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का एक संवैधानिक निकाय है। यह संस्था 1952 के सिनेमेटोग्राफ एक्ट के तहत फिल्मों के प्रसारण पर नजर रखती है। भारत में सेंसर बोर्ड को दिखाये बिना कोई भी फिल्म आम दर्शकों के लिए रिलीज नहीं की जा सकती। फिल्म को रिलीज करने से पहले सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट लेना जरूरी होता है।
'आदिपुरूष' पर उठे थे सवाल?

हालांकि, 72 हूरें फिल्म के ट्रेलर को सर्टिफिकेट देने से इंकार पर सेंसर बोर्ड का कोई बयान तो सामने नहीं आया है लेकिन इस फिल्म के निर्माताओं ने बोर्ड पर जरूर सवाल उठाये हैं। इससे पहले 'आदिपुरूष' फिल्म के डॉयलॉग, सीन और कलाकारों के ड्रेस को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी खूब हंगामा किया गया, बावजूद इसके इस फिल्म को सेंसर बोर्ड की ओर से बिना किसी रोक-टोक के पास कर दिया गया।
अब यहां पर सवाल उठता है कि आखिर सेंसर बोर्ड क्या है और क्या है इसकी शक्तियां? यह कैसी फिल्मों पर कैंची चलाते हैं और फिल्मों को किस आधार पर ग्रेडिंग करते हैं?
क्या है सेंसर बोर्ड?
सीबीएफसी को साल 1983 तक सेंट्रल फिल्म सेंसर बोर्ड के नाम से जाना जाता था। देश में किसी फिल्म की जांच करने और कुछ आपत्तिजनक पाये जाने पर उसकी काट-छांट का जिम्मा सेंसर बोर्ड पर है। वहीं किसी भी फिल्म को देश में रिलीज करने से पहले सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट हासिल करना जरूरी होता है। इस सर्टिफिकेट के बिना देश में कहीं भी देशी या विदेशी फिल्म रिलीज नहीं की जा सकती है। हालांकि, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्म रिलीज करने के लिए यह जरूरी नहीं है।
इस बोर्ड में अध्यक्ष के अतिरिक्त 25 अन्य गैर सरकारी सदस्य भी होते हैं। बोर्ड का मुख्यालय मुंबई में है। इसके 9 क्षेत्रीय कार्यालय बैंगलूर, कोलकाता, चेन्नई, कटक, गुवाहाटी, हैदराबाद, मुंबई, नई दिल्ली और तिरुवंतपुरम हैं।
कैसे हुआ सेंसर बोर्ड का गठन
भारत में पहली फिल्म (राजा हरीशचंद्र) 1913 में बनी। इसके बाद इंडियन सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1920 में बना और तभी लागू हुआ था। तब मद्रास (चेन्नई), बॉम्बे (मुंबई), कलकत्ता (कोलकाता), लाहौर (पाकिस्तान में) और रंगून (यांगून, बर्मा में) सेंसर बोर्ड पुलिस चीफ के अंदर आता था।
पहले रीजनल सेंसर्स स्वतंत्र थे। देश की आजादी के बाद रीजनल सेंसर्स को बॉम्बे बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर्स के अधीन कर दिया गया। फिर सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952 लागू होने के बाद बोर्ड का 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर्स' के नाम से पुनर्गठन हुआ। इसके 31 सालों के बाद 1983 में फिल्म के प्रदर्शन और प्रकाशन से जुड़े एक्ट में कुछ बदलाव किये गये और इस संस्था का नाम 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन यानि सीबीएफसी' रखा गया।
सेंसर बोर्ड कैसे देता है फिल्म का सर्टिफिकेट?
फिल्म बन जाने के बाद सेंसर बोर्ड से किसी भी फिल्म को सर्टिफिकेट लेने में कम से कम दो महीने का समय लग जाता है। क्योंकि सबसे पहले सेंसर बोर्ड के ज्यूरी मेंबर उस संबंधित फिल्म को देखते हैं। इस दौरान उस ज्यूरी मेंबर को फिल्म में कोई सीन या संवाद आपत्तिजनक (अश्लीलता, अपराध, हिंसा, अपशब्द और धार्मिक मुद्दों) लगता है तो उसे वह काटने का आदेश देते हैं। अगर निर्माता ऐसे नहीं करते हैं तो उनकी फिल्मों को सर्टिफिकेट नहीं दिया जाता है। वहीं अगर सेंसर बोर्ड की बात मान ली जाती है तो बोर्ड फिल्मों को चार कैटेगरी में सर्टिफिकेट देता है।
● यू सर्टिफिकेट - जिसका मतलब है कि इस फिल्म को किसी भी उम्र और वर्ग के लोग देख सकते हैं। इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है।
● यूए सर्टिफिकेट - इसका मतलब आने वाली फिल्मों को 12 साल से छोटे बच्चे अपने माता-पिता के साथ देख सकते हैं।
● ए सर्टिफिकेट - इस तरह की फिल्मों को 18 साल या ज्यादा उम्र के लोग ही देख सकते हैं।
● एस सर्टिफिकेट - ये फिल्में डॉक्टर, साइंटिस्ट जैसे पेशेवर लोगों को दिखाने के लिए होती है।
क्या फिल्मों को बैन कर सकता है सेंसर बोर्ड?
सेंसर बोर्ड सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952 और सिनेमैटोग्राफी रूल 1983 के तहत काम करता है। इसलिए सेंसर बोर्ड किसी भी फिल्म को बैन नहीं लगा सकता है लेकिन बोर्ड चाहे तो किसी फिल्म को सर्टिफिकेट देने से इंकार जरूर कर सकता है। इस स्थिति में वह फिल्म किसी भी थियेटर में रिलीज नहीं की जा सकती है। सीधे तौर पर कहें तो यह भी बैन जैसे ही हालात बन जाते हैं।
बता दें कि केंद्र सरकार ने इस मसले पर 31 मार्च 2022 को राज्यसभा में कहा था कि सेंसर बोर्ड किसी फिल्म को बैन नहीं कर सकता, लेकिन सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1952(B) के तहत दिशानिर्देशों के उल्लंघन पर सर्टिफिकेट देने से मना जरूर कर सकता है।
केंद्र सरकार कर सकती है फिल्म को बैन?
सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1952(5E) के तहत सेंसर बोर्ड के सर्टिफिकेट जारी करने के बाद भी किसी फिल्म को केंद्र सरकार बैन कर सकती है। साथ ही सेंसर बोर्ड द्वारा जारी सर्टिफिकेट को रद्द भी कर सकती है।
बता दें कि अक्टूबर 2022 में डीएनए में एक खबर प्रकाशित हुई थी। जिसमें एक आरटीआई के हवाले से लिखा गया है कि कि सेंसर बोर्ड ने 1 जनवरी 2000 से 31 मार्च 2016 तक 793 फिल्मों को सर्टिफिकेट नहीं दिया था। जिसमें कुछ दुनियाभर में चर्चा में रही फिल्में भी थी। जैसे 1996 में आई 'कामसूत्रा' को सेक्सुअल कंटेंट दिखाने के कारण रोका गया और बाद में कुछ सीन काटने के बाद ही ए सर्टिफिकेट दिया गया।
1994 में आयी फूलन देवी पर बनी 'बैंडिट क्वीन' को भी पहले सर्टिफिकेट नहीं दिया गया। बाद में इसके कुछ दृश्यों को हटाने के बाद सर्टिफिकेट दिया गया। अभिनेत्री शबाना आजमी और नंदिता दास की 1996 में आयी फिल्म 'फायर' को भी सर्टिफिकेट नहीं दिया गया था। यह भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म थी, जिसमें लेस्बियन रिलेशनशिप दिखाई गयी थी। लेकिन कोर्ट ने फिल्म निर्देशक दीपा मेहता की अपील पर इसे बिना कांट छांट के सर्टिफिकेट देने का आदेश दिया था। उसके बाद यह फिल्म रिलीज हुई और बहुत विवादास्पद रही।
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