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Share Swap: क्या होता है शेयर स्वैप, जानें इसके फायदे और नुकसान

Share Swap: एचडीएफसी बैंक में हाउसिंग फाइनेस कंपनी एचडीएफसी लिमिटेड का 1 जुलाई 2023 को विलय हो गया था। जिसके तहत एचडीएफसी बैंक ने एचडीएफसी लिमिटेड के शेयरधारकों को 311 करोड़ से भी ज्यादा (3,11,03,96,492) नये शेयर आवंटित किये। एचडीएफसी लिमिटेड के शेयरधारकों को 25 शेयर के बदले एचडीएफसी बैंक के 42 शेयर आवंटित किये गए यानि एचडीएफसी बैंक द्वारा एचडीएफसी लि. कंपनी के शेयरधारकों को 68% ज्यादा शेयर आंवटित किये गये। यह आवंटन शेयर स्वैप के तहत हुआ था।

इससे पहले, दिसंबर 2018 में हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल) ने ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन कंज्यूमर (जीएसके कंज्यूमर) के विलय की घोषणा की थी। इस सौदे में शेयर स्वैप द्वारा जीएसके कंज्यूमर के शेयरधारकों को एक शेयर के बदले 4.39 शेयर मिले थे। ऐसे ही साल 2020 में जिंदल स्टेनलेस स्टील हिसार लिमिटेड का एक शेयर के बदले 1.95 शेयर के अनुपात में जिंदल स्टेनलेस स्टील में विलय हुआ था।

What is share swap, know its advantages and disadvantages

शेयर स्वैप क्या होता है?

शेयर स्वैप का मतलब शेयर बदलना अर्थात शेयरों की अदला-बदली होता है। मान लीजिये जब कोई X कंपनी किसी Y कंपनी का अधिग्रहण या विलय करती है तो उनके शेयरों की भी अदला-बदली होती है। अधिग्रहण करने वाली X कंपनी अधिग्रहण के दौरान अधिकृत Y कंपनी के शेयरों के बदले में अपने शेयर जारी करती है। इस प्रक्रिया को ही शेयर स्वैप कहा जाता है।

इसको आसान शब्दों में इस प्रकार समझ सकते हैं कि जब किसी कंपनी का विलय होता है तो उस कंपनी के शेयरों का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। जिसके चलते उस कंपनी के शेयरधारकों को उनके शेयर के बदले अधिग्रहण करने वाली कंपनी अपने शेयर प्रदान करती है। यानि शेयर स्वैप वह प्रक्रिया है जिसमें नगद भुगतान न होकर कंपनियों के विलय की स्थिति में उनकी संपत्तियों व विनिमय अनुपात के आधार पर शेयरों का आदान-प्रदान होता है।

शेयर स्वैप कैसे काम करता है?

अधिग्रहण करने वाली कंपनी अधिकृत कंपनी के शेयर के बदले शेयर स्वैप के तहत नये शेयर जारी करती है। जिसके लिए सबसे पहले दोनों कंपनियों के वर्तमान बाजार मूल्य का आंकलन किया जाता है। उसके बाद अधिकृत होने वाली कंपनी के शेयरधारकों को स्वैप अनुपात के आधार पर शेयरों की संख्या निर्धारित होती है।

स्वैप अनुपात, वह दर होती है जो अधिग्रहण करने वाली कंपनी अधिकृत कंपनी के शेयरों के बदले में अपने शेयर जारी करती है। यह विभिन्न कारकों के माध्यम से निर्धारित होती है, जैसे ऋण स्तर, भुगतान किया गया लाभांश, प्रति शेयर आय और मुनाफा इत्यादि। जैसे एचडीएफसी बैंक ने अधिकृत कंपनी के शेयरधारकों को 25 शेयर के बदले 42 शेयर जारी किये हैं।इस प्रक्रिया के बाद अधिकृत कंपनी के शेयरधारकों का अधिग्रहण करने वाली कंपनी में हिस्सेदारी हो जाती है।

शेयर स्वैप के फायदे

शेयर स्वैप, विलय अथवा अधिग्रहण की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। इसके अंतर्गत दोनों कंपनियों की परिसंपत्तियों (इक्विटी) को मुद्रा के रूप में उपयोग किया जाता है। जिससे नकद आधारित लेनदेन की किसी भी लागत या जोखिम को समाप्त किया जा सके। गौरतलब है कि अधिकतर अधिग्रहण होने वाली कंपनी के शेयरधारकों के लिए यह बहुत लाभप्रद स्थिति होती है, क्योंकि उन्हें प्रीमियम मिलता है।

शेयर स्वैप का सबसे बड़ा फायदा ही नकद लेनदेन को सीमित करना है। इसके माध्यम से अधिकृत/विलय होने वाली कंपनी के शेयरधारक की भी हिस्सेदारी तय होती है तथा दोनों कंपनियों के जोखिम व लाभ भी साझा होते हैं। चूंकि इस प्रक्रिया में कोई नकद खर्च नहीं होता, तो इससे अधिग्रहणकर्ता की उधार लेने की लागत बच जाती है।

इसके साथ ही साथ अधिग्रहण करने वाली कंपनी अपनी नकदी अन्य व्यवसाय में निवेश के रूप में भी लगा सकती है। यदि किसी मामले में नकद लेनदेन शामिल होगा, तो अधिग्रहण करने वाली कंपनी ही उसका वहन करती है। इसलिए जबकि नकदी की कमी से जूझ रही कंपनियों के लिए शेयर स्वैप एक वरदान है, क्योंकि इससे उन्हें सौदे करने के लिये अपनी संपत्ति के मौजूदा बाजार मूल्य का उपयोग करने में मदद मिलती है।

जब कंपनियों/फर्मों का विलय या अधिग्रहण शेयर स्वैप के तहत होता है तो इसमें कोई खरीद-फरोस्त नहीं होती और न ही नगद राशि का प्रयोग होता है, जिस कारण से कंपनी को कोई टैक्स नहीं देना पड़़ता। इसके साथ-साथ नयी फर्म में शेयरधारकों और कर्मचारियों की संख्या बढ़ जाती है। नतीजतन कंपनी का नेटवर्क भी बढ़ जाता है। नेटवर्क बढ़ने के कारण कंपनी की योजनाएं व सेवाओं का कम लागत में अधिक प्रचार/प्रसार हो जाता है।

शेयर स्वैप के नुकसान

अधिग्रहण करने वाली कंपनी को अधिकृत कंपनी के शेयरधारकों के लिए नये शेयर जारी करने पड़ते हैं जिससे उस कंपनी के हिस्सेदारों के मुनाफे में कमी आ सकती है। वहीं कंपनी के विस्तार के कारण नये शेयरधारकों से संवाद व कंपनी के निणर्यों को क्रियान्वयन रूप देने में देरी हो सकती है। दूसरी ओर अगर कंपनी के पुराने व नये शेयरधारक अथवा कंपनी में काम करने वाले लोगों में किसी बात को लेकर असंतोष पैदा हो जाए तो यह कंपनी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

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